भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 774, कुल 832 में से

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पृष्ठ 774

७१८ - त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ अध्याय कार्य) से विलक्षण भी नारायण ही हैं। परमज्योति, स्वयं- प्रकाशमय, ब्रह्मानन्दमय, नित्य, निर्विकल्प, निरञ्जन, अवर्ण- नीय, शुद्ध एकमात्र देवता नारायण ही हैं; दूसरा कोई नहीं है। न वे (किसीके) समान हैं और न (किसीसे) अधिक हैं (उनके सिवा कोई दूसरा है ही नहीं)। 'संशयरहित होकर परमार्थतः जो इस प्रकार जानता है, वह सम्पूर्ण बन्धनोंको छेदन करके, मृत्युको पार करके मुक्त हो जाता है, मुक्त हो जाता है। जो इस प्रकार जानकर सर्वदा उन (श्रीनारायण) की उपासना करता है, वह पुरुष नारायण- स्वरूप हो जाता है; वह नारायणस्वरूप हो जाता है' ॥ १६ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय अध्याय मूलाविद्या और प्रलयके स्वरूपका निरूपण शिष्यने 'ठीक है' कहकर फिर पूछा- 'भगवन् ! परम- तत्त्वज्ञ गुरुदेव ! आपने विलासके सहित महाभूत- अविद्याके उदयक्रमका वर्णन किया। उस (मूलाविद्या) से प्रपञ्चकी उत्पत्तिका क्रम किस प्रकार है, इसे विशेषतः वर्णन करें। मैं उसका तत्त्व जानना चाहता हूँ' ॥ १ ॥ 'ऐसा ही हो' यह कहकर गुरु बोले- 'यह अनादि प्रपञ्च जैसा दिखायी पड़ता है, वह नित्य है या अनित्य-इस प्रकारका संशय उत्पन्न होता है। प्रपञ्च भी दो प्रकारका है-विद्या- प्रपञ्च और अविद्या प्रपञ्च । विद्या प्रपञ्चकी नित्यता तो इसीसे सिद्ध है कि वह नित्यानन्दमय चैतन्यांश विलास तथा शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्य एवं आनन्दस्वरूप है। अविद्याप्रपञ्च नित्य है या अनित्य ? - कुछ लोग प्रवाहरूपसे उसकी नित्यता बतलाते हैं। शास्त्रोंमें प्रलयादिका वर्णन सुना जाता है, इस कारणसे दूसरे उसकी अनित्यता बतलाते हैं। वस्तुत दोनों ही (बातें) नहीं है। फिर है किस प्रकार ? समस्त अविद्या-प्रपञ्च महामायाका सङ्कोच एवं विकासरूप विलास ही है। क्षण- क्षणमें शून्य (तिरोहित) होनेवाला अनादि मूल-अविद्याका विगम होनेके कारण परमार्थत कुछ भी नहीं है। अर्थात् समस्त अविद्याप्रपञ्च प्रतिक्षण विलीन होनेवाला है, अतः उसकी पारमार्थिक सत्ता नहीं है। वह किस प्रकार ? एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म ही है। यहाँ नाना (अनेक) नामकी वस्तु कुछ भी नहीं है (-ऐसी श्रुति है)। अतएव ब्रह्मसे भिन्न सब बाधित (प्रतीतिमात्र, सत्ताहीन) ही है। सत्य ही परब्रह्म है। ब्रह्म सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप एवं अन्तहीन हैं' ॥ २॥ 'तब विलास (अभिव्यक्ति) सहित मूल-अविद्याके उपसंहारका क्रम किस प्रकार है ?' (यों शिष्यके पूछनेपर) अत्यन्त आदरपूर्वक बड़ी प्रसन्नतासे गुरु उपदेश करते हैं- 'सहस्र चतुर्युगोंका ब्रह्माजीका एक दिवस होता है। इतने ही समयकी फिर उनकी रात्रि होती है। रात और दिवस दोनोंका सम्मिलित रूप एक दिन होता है। उस एक दिनमें सत्यलोकतकके समस्त लोकोंकी उत्पत्ति, स्थिति एवं लय हो जाते हैं। (ऐसे) पंद्रह दिनोंका (ब्रह्माजीका) पक्ष (पखवाड़ा) होता है। दो पक्षोंका महीना होता है। दो महीनोंका ऋतु होता है। तीन ऋतुओंका अयन होता है। दो अयनोंका वर्ष होता है। ब्रह्माके वर्षोंके प्रमाणसे सौ वर्षकी ब्रह्माजीकी परमायु (पूर्ण आयु) होती है। इतने समयतक उन (ब्रह्माजी) की स्थिति कही जाती है। स्थितिके अन्तमे अण्डगत विराट्पुरुष अपने अशी हिरण्यगर्भको प्राप्त होते (उनमें लीन हो जाते) हैं। हिरण्यगर्भके कारण परमात्मा अण्डपरिपालक नारायणको वे हिरण्यगर्भ प्राप्त होते हैं। फिर सौ वर्षोंतक उनकी प्रलय होती है। उस समय सब जीव प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं। प्रलयके समय सब शून्य (अभावरूप) हो जाता है ॥ ३-४ ॥ 'उन ब्रह्माजीकी स्थिति एवं प्रलय आदि-नारायणके अंशसे अवतीर्ण इन अण्ड-परिपालक महाविष्णुके दिवस एवं रात्रि कहे जाते हैं। इन दिवस एव रात्रिका (अर्थात् ब्रह्माके सौ वर्षोंके जीवन एव सौ वर्षोंकी प्रलयका) महाविष्णुका एक दिन होता है। इसी प्रमाणसे दिन, पक्ष, मास, सवत्सर आदि भेदसे उनके सौ करोड़ (एक अरब) वर्षोंतक उनकी स्थिति कही जाती है। स्थितिके अन्तमें (वे) अपने कारण महा- विराट् पुरुषको प्राप्त होते (उनमें लीन हो जाते) हैं। तब आवरणके साथ ब्रह्माण्ड विनष्ट हो जाता है। ब्रह्माण्डका आवरण विनष्ट होता है, वही (आवरण) विष्णुका स्वरूप है। उनकी (श्रीमहाविष्णुकी) उतनी ही (उनके एक अरब वर्षकी) प्रलय होती है। प्रलयके समय सब शून्य हो जाता है ॥ ५ ॥ 'अण्डपरिपालक महाविष्णुकी स्थिति एव प्रलय (उनके दो अरब वर्ष) आदिविराट् पुरुषके दिवस-रात्रि कहे जाते हैं। उन-