भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 773

अध्याय २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७१७ उनके उस व्यापक रूपसे विलक्षण किंतु उस (व्यापक रूप) से अभिन्न, तथा अपरिच्छिन्न होते हुए भी अपनी मूर्तिके आकारके, देवता सर्वत्र सुने जाते हैं—अर्थात् जैसे पृथिवी आदिके अधिष्ठाता देवता अपने पृथिवीरूपी भौतिक शरीर एव देव- शरीर दोनोंसे युक्त हैं, वैसे ही सर्वात्मक परब्रह्ममें साकार एवं निराकारका भेद होनेपर भी विरोध नहीं है। विविध प्रकारकी अनन्त विचित्र शक्तियोंसे सम्पन्न परब्रह्मके स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर विरोध नहीं रह जाता। अर्थात् जब जान लिया जाता है कि परब्रह्ममें विविध प्रकारकी अनन्त विचित्र शक्तियाँ हैं, तब विरोधी धर्मोंका विरोध असङ्गत नहीं लगता। इस (ज्ञान) के अभावमें ही अनन्त विरोध प्रतीत होते हैं ॥ ११-१२ ॥ 'और जब श्रीराम-श्रीकृष्णादि अवतारस्वरूपोंमें अद्वैत परमानन्दस्वरूप परब्रह्मके परमतत्त्व एव परमेश्वरत्वकी स्मृति सर्वत्र स्वाभाविक रूपसे ही विद्यमान सुनी जाती है, तब अद्वैत परमानन्दस्वरूप, सब प्रकारसे परिपूर्ण परब्रह्मके विषयमें क्या कहा जाय। अन्यथा यदि सर्वपरिपूर्ण परब्रह्मका साकार- रहित केवल निराकार स्वरूप ही वास्तवमें अभिप्रेत हो, तब तो केवल निराकार आकाशके समान परब्रह्ममें भी जड़ता आ जायगी । इसलिये परमार्थतः परब्रह्मके साकार एव निराकार दोनों रूप स्वभावतः सिद्ध हैं ॥ १३ ॥ 'इस प्रकारके अद्वैत परमानन्दस्वरूप आदिनारायणके पलक उठाने और गिरानेसे मूल अविद्याकी उत्पत्ति, स्थिति एव लय हुआ करते हैं। आत्माराम, अखिल-परिपूर्ण आदि- नारायणकी अपनी इच्छासे जब कभी उनका उन्मेष होता है (पलक उठते हैं), तब उस (उन्मेष) से परब्रह्मके निचले पादमें, जो सब (अभिव्यक्तियों) का कारण है, मूलकारणरूप अव्यक्त (प्रकृति) का आविर्भाव होता है। अव्यक्तसे मूल (संस्कार) का एव मूल-अविद्याका आविर्भाव होता है। उसी (अव्यक्त) से 'सत्'-शब्दसे वाच्य अविद्यामिश्रित ब्रह्म (जीव) व्यक्त होता है। उस (अव्यक्त-प्रकृति) से महत्तत्त्व, महत्से अहङ्कार, अहङ्कारसे (शब्दादि) पाँचों तन्मात्राएँ, पाँचों तन्मात्राओंसे (आकाशादि) पञ्चमहाभूत और पाँचों महाभूतोंसे ब्रह्मके एक पादसे व्याप्त एक अविद्यात्मक अण्ड उत्पन्न होता है ॥ १४ ॥ 'उस (अविद्याण्ड) में तत्त्वतः गुणातीत, शुद्ध सत्त्वमय तथा लीला (क्रीड़ा) के लिये निरतिशय आनन्दरूप धारण किये मायोपाधियुक्त नारायण होते हैं। तात्पर्य यह कि अविद्याण्ड गुणातीत शुद्ध सत्त्वमय नारायणका ही लीलाके लिये धारण किया हुआ निरतिशय आनन्दरूप मायोपाधिक स्वरूप ही है। ये वही नित्य परिपूर्ण पादविभूतिस्वरूप वैकुण्ठवासी नारायण हैं। वे अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयादि समस्त कार्य एव कारणसमूहोंके (प्रकृतिरूप) परम कारणके भी कारणरूप महामायातीत तुरीयरूप परमेश्वर विराजित हैं। उनसे स्थूल विराट्स्वरूप उत्पन्न होता है। वही विराट्-स्वरूप समस्त कारणोंका मूल है। वह (विराट्) अनन्त मस्तकों तथा अनन्त नेत्रों, हाथों और पैरोंसे युक्त पुरुष है। वह अनन्त कानोंवाला सबको घेरकर (व्याप्त करके) स्थित है। वह सर्वव्यापक है। वह सगुण एव निर्गुणस्वरूप है। वह ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, शक्ति तथा तेजःस्वरूप है। नाना प्रकारके अनन्त विचित्र जगत्‌के आकारमें वही स्थित है। वही निरतिशय आनन्दमय अनन्त परमविभूतिके समुदायसे सम्पन्न विश्वरूप परमात्मा है। वह निरतिशय निरङ्कुशता (परम- स्वतन्त्रता) सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता सर्व-नियन्तृत्व आदि अनन्त कल्याणकारी गुणोंका आकर है। वह अवर्णनीय अनन्त दिव्य तेजोराशिके रूपमें स्थित है। वह अविद्याके पूरे अण्डमें व्यापक है। वह महामायाके अनन्त विलासोंका अधिष्ठानविशेष एव निरतिशय अद्वैत परमानन्दस्वरूप परब्रह्मका विलास- विग्रह है ॥ १५ ॥ 'इस (विराट्-पुरुष) के एक-एक रोमकूप-छिद्रमें अनन्त- कोटि ब्रह्माण्ड और (उनके) स्थावर भी उत्पन्न होते हैं। उन सब अण्डोंमेंसे प्रत्येकमें नारायणका एक-एक अवतार होता है। उन्हीं नारायणसे हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) उत्पन्न होते हैं। नारायणसे ही उस अण्डका विराट्स्वरूप उत्पन्न होता है, नारायणसे ही सब लोकोंके स्रष्टा प्रजापति उत्पन्न होते हैं। नारायणसे ही एकादश रुद्र भी उत्पन्न होते हैं। नारायणसे ही अखिल लोक उत्पन्न होते है। नारायणसे इन्द्र उत्पन्न होते हैं। नारायणसे समस्त देवता उत्पन्न होते हैं। नारायणसे बारह आदित्य उत्पन्न होते हैं। सब (आठों) वसुनामक देवता, सभी ऋषि, सम्पूर्ण प्राणी तथा समस्त छन्द नारायणसे ही उत्पन्न होते हैं। नारायणसे ही प्रवृत्त होते (क्रियाशील बनते) हैं। नारायणमें ही सब लीन हो जाते हैं। अतः (ये ही) नित्य, अविनाशी, सर्वश्रेष्ठ एव स्वयंप्रकाश हैं। नारायण ही ब्रह्मा हैं। नारायण ही शिव हैं। नारायण ही इन्द्र हैं। नारायण ही दिशाएँ हैं। नारायण ही विदिशारूप (कोण) हैं। नारायण ही काल हैं। नारायण ही समस्त कर्म हैं। नारायण ही मूर्त एव अमूर्तरूप हैं। नारायण ही समस्त कारणरूप तथा सम्पूर्ण कार्यस्वरूप हैं। इन दोनों (कारण तथा