भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 772

७१६ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ अध्याय २

शब्दोंके वाच्य, अद्वैत परमानन्दरूप, विभु (सर्वव्यापक), प्रकार जानता है, वह पुरुष उन (श्रीनारायणभगवान्) की नित्य, निष्कलङ्क, निर्विकल्प, निरञ्जन, संङ्गारहित, शुद्ध उपासनासे उनके सायुज्यको प्राप्त करता है—यह संशयरहित देवता एकमात्र नारायण ही हैं; दूसरा कोई नहीं है। जो इस बात है' ॥ ६-११ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय
साकार-निराकार परब्रह्मके स्वरूपका निरूपण
तत्र (प्रथमाध्यायके उपदेशको सुनकर) शिष्यने अपने और मुक्तसाकार। नित्यसाकार तो आदि-अन्तहीन सनातन
भगवत्स्वरूप गुरुदेवसे कहा—'भगवन् ! वैकुण्ठ एवं (शाश्वत) है। जो उपासनाद्वारा मुक्तिपदको प्राप्त हुए हैं,
श्रीमन्नारायणको भी आपने नित्य बतलाया है। वे ही उनका साकार देह मुक्तसाकार है। उस (मुक्त पुरुषके आकार)
(वैकुण्ठ एवं श्रीनारायण) तुरीयतत्त्व हैं, यह भी कहा ही का आविर्भाव अखण्ड ज्ञानसे होता है। अर्थात् भगवद्धाममें
है। श्रीवैकुण्ठधाम साकार है और श्रीमन्नारायण भी साकार स्थित मुक्तात्माओंका शरीर ज्ञानघन है। वह (मुक्तात्माओं-
हैं; किंतु तुरीयतत्त्व निराकार है। साकारतत्त्व अवयवयुक्त का साकार शरीर) भी शाश्वत होता है; परंतु वह मुक्त-
होता है और निराकार अवयवरहित। अतः श्रुति यह कहती साकार ऐच्छिक (इच्छाधीन) होता है। दूसरे कहते हैं
है कि साकार अनित्य होता है और निराकार नित्य होता है। (ऐसी स्थितिमें) उसका शाश्वतपना (नित्यत्व) कैसे होगा ?
जो-जो (पदार्थ) अवयववाले हैं, वे सब अनित्य हैं—अनुमान- (इसपर कहते हैं—) ॥ २-७ ॥
प्रमाणसे यही सिद्ध होता है तथा प्रत्यक्ष भी देखा जाता है। अतः “अद्वैत, अखण्ड, परिपूर्ण, निरतिशय परमानन्दरूप, शुद्ध,
उन दोनों (वैकुण्ठ एव नारायण) की अनित्यता बतलाना ही ज्ञानस्वरूप, मुक्त, सत्यस्वरूप ब्रह्मकी चैतन्यरूप साकारता होनेसे
उचित है। आपने उनका नित्यत्व किस प्रकार बतलाया है ? उपाधिहीन साकारका नित्यत्व सिद्ध ही है। इसीलिये
तुरीयतत्त्व अक्षर (अविनाशी) है—यह श्रुति कहती है; अतः निरुपाधिक साकारके निरवयव होनेके कारण उससे कोई
तुरीयतत्त्वका नित्यत्व प्रसिद्ध है। नित्य एव अनित्य—ये परस्पर- अधिक (महान्) होगा, ऐसी शङ्का दूरसे ही निवृत्त हो
विरोधी धर्म हैं। इन दोनों विरोधी धर्मोंका एक ही ब्रह्ममें जाती है। सभी उपनिषदोंमें, समस्त शास्त्र सिद्धान्तोंमें 'ब्रह्म
होना अत्यन्त विरोधी (असंगत) है। इसलिये श्रीवैकुण्ठ- निरवयव चैतन्य है' यही सुना जाता है। और विद्या, आनन्द
धाम एव श्रीमन्नारायणकी भी अनित्यता ही बतलाना उचित तथा तुरीयका सर्वत्र अभेद ही सुना जाता है।'
है।' (शिष्य यह शङ्का करता है।) ॥ १ ॥ '(तब) विद्या आदि साकारका भेद किस प्रकार है ?'
गुरु शङ्काका निवारण करते हुए कहते हैं—' (तुम जो शिष्यकी इस शङ्काका समाधान करते हुए गुरु कहते हैं—
कहते हो, वह) ठीक ही है; (किंतु) साकार-तत्त्व दो प्रकारका '(तुमने) सत्य कहा है—विद्याकी प्रधानतासे विद्यासाकार,
होता है—उपाधिसहित तथा उपाधिरहित। इनमें उपाधि- आनन्दकी प्रधानतासे आनन्दमाकार तथा (विद्या, आनन्द)
सहित साकार किस प्रकारका है ? अविद्यासे उत्पन्न समस्त दोनोंकी प्रधानतासे उभयात्मक साकार कहे जाते हैं। यहाँ
कार्य एव कारण अविद्यापादमें ही हैं, और कहीं नहीं। प्रधानताको लेकर ही भेद है, वह भेद वस्तुतः अभेद
इसलिये समस्त अविद्योपाधिसे युक्त साकार-तत्त्व (पदार्थ) ही है' ॥ ८-१० ॥
अवयवयुक्त ही है। अवयवयुक्त होनेसे (वे) अवश्य 'भगवन् ! अखण्ड अद्वैत परमानन्दस्वरूप ब्रह्मके लिये साकार
अनित्य होंगे ही। (इस प्रकार) उपाधियुक्त साकारका और निराकार—ये दो विरोधी धर्म प्रतीत होते हैं। दो विरोधी
वर्णन हो चुका। धर्म उनमें किस प्रकार रह सकते हैं ?' इस शङ्काका निवारण
"तब उपाधिहीन साकार किस प्रकारका है ? निरुपाधिक करते हुए गुरु कहते हैं—'यह ठीक है। जैसे सर्वव्यापी निराकार
साकार तीन प्रकारका है—ब्रह्मविद्यासाकार, आनन्दसाकार महावायुका और उसीके स्वरूपभूत त्वक्-इन्द्रियके अधिष्ठाता-
तथा उभयात्मक (ब्रह्मविद्यानन्दात्मक) साकार। (यह) रूपमें प्रसिद्ध साकार महावायु-देवताका अभेद ही सब कहीं सुना
त्रिविध साकार भी फिर दो प्रकारका होता है—नित्यसाकार जाता है, जैसे पृथिवी आदि व्यापक शरीरवाले देवविशेषोंके