कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 771, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ]
* महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
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[बायाँ स्तम्भ]
करते हुए (साधुवाद देते हुए) अत्यन्त प्रसन्न होकर ब्रह्माजीसे बोले—"सम्पूर्ण परमतत्त्वका रहस्य तुम्हें बतलाता हूँ। सावधान होकर सुनो। ब्रह्माजी ! अथर्ववेदकी देवदर्शी नामक शाखामें परमतत्त्वरहस्य नामक अथर्ववेदीय महानारायणोपनिषद्में प्राचीन कालसे गुरु-शिष्य-संवाद अत्यन्त सुप्रसिद्ध होनेसे सर्वज्ञात है। पहले (अतीत कल्पमें) उसके स्वरूपको जाननेसे सभी महत्तम पुरुष ब्रह्मभावको प्राप्त हुए हैं। जिसके सुननेसे सभी बन्धन समूल नष्ट हो जाते हैं, जिसके जानने सभी रहस्य ज्ञात हो जाते हैं, उसका स्वरूप कैसा है, यह बतलाते हैं—॥ २-३ ॥
"शान्त, अप्रमत्त, अत्यन्त विरक्त, अत्यन्त पवित्र, गुरु- भक्त, तपस्वी शिष्यने ब्रह्मनिष्ठ गुरुको प्राप्तकर, उनकी प्रदक्षिणा की, भूमिपर लेटकर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और दोनों हाथोंकी अञ्जलि बाँधकर, विनयपूर्वक समीप जाकर कहा—'भगवन् ! गुरुदेव ! मुझे परमतत्त्वके रहस्यको खोलकर बतलाइये।' अत्यन्त आदरपूर्वक हर्षसे शिष्यकी बहुत प्रशंसा करके गुरु बोले—'परमतत्त्व-रहस्योपनिषद्का क्रम बतला रहा हूँ, सावधानीसे सुनो—
'ब्रह्म कैसा है ? (भूत, भविष्य, वर्तमान) तीनों कालोंसे जो अबाधित है—किसी भी कालमें जिसका अभाव नहीं होता, वह ब्रह्म है। समस्त कालोंसे अबाधित (अनवच्छिन्न) तत्त्व ब्रह्म है। ब्रह्म सगुण एवं निर्गुण दोनों है। ब्रह्म आदि, मध्य एवं अन्तसे रहित है। यह सब (दृश्यादृश्य जगत्) ब्रह्म है। ब्रह्म मायातीत है और गुणातीत है। ब्रह्म अनन्त, प्रमाणोंसे अज्ञेय, अखण्ड और परिपूर्ण है। अद्वितीयरूप, परमानन्द, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वरूप, व्यापक, भेदहीन एव अपरिच्छिन्न है। ब्रह्म सच्चिदानन्दस्वरूप एव स्वतःप्रकाश है। ब्रह्म मन-वाणीसे अतीत है। ब्रह्म सम्पूर्ण प्रमाणोंसे परे है। अगणित वेदान्तों (उपनिषदों) द्वारा ब्रह्म ही जानने योग्य है। देशसे, कालसे तथा वस्तुसे ब्रह्म परिच्छेदहीन (असीमित) है। ब्रह्म सब प्रकार परिपूर्ण है। ब्रह्म तुरीयस्वरूप, निराकार एवं अद्वितीय है। ब्रह्म द्वैतके साथ अवर्णनीय है। ब्रह्म प्रणवस्वरूप है। ब्रह्म प्रणवात्मारूपसे कहा गया है। प्रणवप्रभृति समस्त मन्त्रोंका स्वरूपभूत ब्रह्म है। ब्रह्मके चार पाद हैं ॥ ४-५ ॥
'ब्रह्मके वे चार पाद कौन-कौन हैं?—अविद्यापाद, सुविद्या- पाद, आनन्दपाद और तुरीयपाद—ये ही वे चार पाद हैं। तुरीयपाद तुरीयावस्थाका भी तुरीय तथा तुरीयातीत है। इन
[दायाँ स्तम्भ]
चारों पादोंमें भेद क्या है? अविद्यापाद प्रथम पाद है, विद्यापाद दूसरा है, आनन्दपाद तीसरा है और तुरीयपाद चौथा है। मूल-अविद्या प्रथम पादमे ही है, दूसरोंमें नहीं। विद्या, आनन्द एव तुरीयके अंश सभी पादोंमें व्याप्त होकर रहते हैं। यदि ऐसी बात है तो विद्यादि पादोंमें भेद किस प्रकार है?—उन विद्यादिकी प्रधानताके कारण उनके द्वारा नामोंका निर्देश होता है। वस्तुतः तो अभेद ही है। उन चार पादोंमें एक नीचेका पाद ही अविद्यामिश्रित होता है। ऊपरके तीनों पाद शुद्ध ज्ञान एव आनन्दस्वरूप तथा अमृत (शाश्वत) रहते हैं। वे तीनों पाद अलौकिक परमानन्दस्वरूप अखण्ड अमित तेजोराशि- के रूपमें प्रकाशित रहते हैं। और वे अनिर्वचनीय, अनिर्देश्य, अखण्ड आनन्दैकरूपात्मक हैं। उनमेसे मध्यम अर्थात् आनन्द- पादके मध्यप्रदेशमें अमित तेजके प्रवाहरूपमें नित्य वैकुण्ठसे विराजमान है और वह निरतिशय आनन्द एव अखण्ड ब्रह्मा- नन्दस्वरूप अपनी मूर्तिसे प्रकाशित है। जैसे अनन्त मण्डल दिखायी पड़ते हैं, उसी प्रकार अखण्ड आनन्दमय भगवान् विष्णुकी अमित दिव्य तेजोराशिके अन्तर्गत सुशोभित श्रीमहान् विष्णुका श्रेष्ठ स्थान विराजमान है। भगवान् विष्णुका यह परमधाम क्षीरसमुद्रके मध्यमें स्थित अविनाशी अमृतके कलशके समान दिखायी पड़ता है। सुदर्शनचक्रके दिव्य तेजके मध्यमें जैसे सुदर्शनके अभिमानी देवपुरुष रहते हैं, जैसे सूर्यमण्डलमें सूर्यनारायण हैं, वैसे ही अमित, अपरिच्छिन्न, अद्वैत परमानन्दरूप तेजोराशिमे आदिनारायण दिखलायी पड़ते हैं।
'वेही (आदिनारायण) तुरीय ब्रह्म हैं। वे ही तुरीयातीत हैं। वे ही विष्णु (व्यापक) हैं। वे ही समस्त ब्रह्मवाचक शब्दोंके वाच्य हैं। वे ही परम ज्योति हैं। वे ही मायातीत हैं। वे ही गुणातीत हैं। वे ही कालातीत हैं। वे ही समस्त कर्मों- से परे हैं। वे ही सत्य एव उपाधिरहित हैं। वे ही परमेश्वर (सर्वसंचालक) हैं। वे ही पुराणपुरुष हैं। प्रणवादि समस्त मन्त्ररूप वाचकोंके वाच्य, आदि-अन्तरहित, आदि-देश काल- वस्तु तथा तुरीय सजावाले (इन सबके वाच्य) एवं नित्य परिपूर्ण, सब प्रकारसे पूर्ण, सत्यसङ्कल्प, आत्माराम, तीनों कालोंसे अबाधित स्वरूपवाले, स्वयञ्ज्योति, स्वयंप्रकाशमय, अपने समान वस्तुसे रहित अर्थात् सर्वथा अद्वितीय, जिनके समान भी कोई नहीं है, फिर अधिककी तो बात ही क्या, जिनमें दिन-रात्रिके विभाग नहीं हैं, जिनमें संवत्सरादि काल- विभाग नहीं हैं, निजानन्दमय अनन्त-अचिन्त्य ऐश्वर्यवाले, आत्माके भी अन्तरात्मा, परमात्मा, ज्ञानात्मा, तुरीयात्मा आदि