भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 770, कुल 832 में से

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पृष्ठ 770

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय त्रिपाद्विभूतिमहा नारायणोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यो॑ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! पूर्वकाण्ड प्रथम अध्याय पाद-चतुष्टयके स्वरूपका निर्णय परमतत्त्वके रहस्यको जाननेकी इच्छासे श्रीब्रह्माजीने देवताओंके वर्षोसे सहस्र वर्षांतक तपस्या की । सहस्र देववर्ष व्यतीत होनेपर ब्रह्माजीकी अत्यन्त उग्र एव तीव्र तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान् महाविष्णु प्रकट हुए । ब्रह्माजीने उनसे कहा—'भगवन् ! मुझे परमतत्त्वका रहस्य बतलाइये, क्योंकि परमतत्त्वके रहस्यको बतलानेवाले एकमात्र आप ही हैं, दूसरा कोई नहीं है। यह किस प्रकार ? ( यदि आप यह पूछें तो ) वही बतलाता हूँ । आप ही सर्वज्ञ हैं। आप ही सर्वशक्तिमान् हैं। आप ही सबके आधार हैं। आप ही सब कुछ बने हुए हैं। आप ही सबके स्वामी हैं। आप ही समस्त कार्योंके प्रवर्तक हैं। आप ही सबके पालनकर्ता हैं। आप ही सबके निवर्तक (विनाशक) हैं। आप ही सत् एव असत्स्वरूप हैं। आप ही सत् एव असत्से विलक्षण हैं। आप ही भीतर और बाहर—सर्वत्र व्यापक हैं। आप ही अत्यन्त सूक्ष्मतर हैं। आप ही महान्‌से भी अत्यन्त महान् हैं। आप ही सबकी मूल-अविद्याके विनाशक हैं। आप ही अविद्यामें विहार करनेवाले भी हैं। आप ही अविद्या- को धारण करनेवाले अधिष्ठान हैं। आप ही विद्या (ज्ञान) द्वारा जाने जाते हैं। आप ही विद्यास्वरूप हैं। आप ही विद्यासे परे भी हैं। आप ही समस्त कारणोंके कारण हैं। आप ही समस्त कारणोंकी समष्टि (समुदाय) हैं। आप ही समस्त कारणोंकी व्यष्टि (पृथक्-पृथक् कारण) हैं। आप ही अखण्ड आनन्द- रूप हैं। आप ही पूर्णानन्द हैं। आप ही निरतिशय आनन्द- स्वरूप हैं। आप ही तुरीय-तुरीय (तुरीयावस्थाके तुरीय) हैं। आप ही तुरीयातीत हैं। अनन्त उपनिषदोंद्वारा आप ही अन्वेषणीय हैं। निखिल शास्त्रोंके द्वारा आप ही ढूँढने योग्य हैं। आप ही ब्रह्मा (मै), शङ्करजी, इन्द्र आदि सब देवताओं तथा समस्त तन्त्रशास्त्रोंद्वारा अन्वेषण करने योग्य हैं। सभी मुमुक्षुओंद्धारा आप ही ढूँढे जाने योग्य हैं। सभी अमृतमय (मुक्त) पुरुषोंद्वारा आप ही खोजने योग्य हैं। आप ही अमृतमय हैं, आप ही अमृतमय हैं, आप ही अमृतमय हैं। आप ही सर्वरूप हैं, आप ही सर्वरूप हैं, आप ही सर्वरूप हैं। आप ही मोक्षस्वरूप है, आप ही मोक्षदाता हैं तथा मोक्षके सम्पूर्ण साधनस्वरूप भी आप ही हैं। आपके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। आपके अतिरिक्त जो कुछ भी प्रतीत होता है, वह सब (बुद्धिद्वारा ) बाधित (अतत्त्व—मिथ्या) है—यह निश्चित है। इसलिये आप ही वक्ता हैं, आप ही गुरु हैं, आप ही पिता हैं, आप ही सबके नियन्ता हैं, आप ही सर्वस्वरूप हैं और आप ही सदा ध्यान करने योग्य हैं'—यह सुनिश्चित है' ॥ १ ॥ परमतत्त्वरूप भगवान् महाविष्णु 'साधु-साधु' कहकर प्रशंसा