भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 769, कुल 832 में से

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पृष्ठ 769

खण्ड ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७१३ 'असि' पदके द्वारा उन 'तत्' एव 'त्वम्' पदोंके बोध्य ब्रह्म और जीवकी एकताका ग्रहण कराया गया है । उस एकत्वका अनुभव करो । [ 'अयमात्मा ब्रह्म' इस महावाक्यमें ] 'अयम्' पदके द्वारा स्वतःप्रकाश अपरोक्ष—नित्य प्रत्यक्ष स्वरूपका वर्णन हुआ है । अहंकारसे लेकर शरीरपर्यन्तको प्रत्यगात्मा बताया गया है । दिखायी पड़नेवाले सम्पूर्ण जगत्में जो व्यापक तत्त्व है, वही 'ब्रह्म' शब्दसे वर्णित है । वह ब्रह्म स्वतःप्रकाश, आत्मस्वरूप है ॥ ५-८ ॥ "अनात्मामें आत्मदृष्टि करनेसे मैं अज्ञानकी निद्रामें पड़कर 'मैं' और 'मेरे' की प्रतीति करानेवाली स्वप्नावस्थामें आ पहुँचा था। श्रीगुरुदेवके द्वारा महावाक्यके पदोंका स्पष्ट उपदेश दिये जानेपर स्वरूपरूपी सूर्यके उदित होनेसे मैं जग गया हूँ । [ऐसा अनुभव करके शुकदेवजी मनन आरम्भ करते हैं—] महावाक्यके अर्थको समझनेके लिये वाच्य और लक्ष्य—इन दोनों ही अर्थोंकी प्रणालीका अनुसरण करना चाहिये । वाच्य-सरणीके अनुसार भौतिक इन्द्रिय आदि भी 'त्वं' पदके वाच्य होते हैं, किंतु लक्ष्यार्थ वही है, जो इन्द्रियादिसे अतीत विशुद्ध चेतन है। इसी प्रकार 'तत्' पदका वाच्य तो ईश्वरत्व, सर्वज्ञत्व आदि गुणोंसे विशिष्ट परमात्मा है, किंतु लक्ष्यार्थ है—केवल सच्चिदानन्दमय ब्रह्म । अतः यहाँ भाग-त्याग लक्षणासे 'असि' पदके द्वारा उक्त दोनों पदोंके लक्ष्यार्थको ही लेकर जीव और ब्रह्मकी एकता बतायी जाती है। 'त्वं' और 'तत्'—ये कार्य (शरीर) तथा कारण (माया) रूप उपाधिके द्वारा ही दो हैं । उपाधि न रहनेपर दोनों ही एकमात्र सच्चिदानन्दस्वरूप हैं । जगत्में भी 'यह वही देवदत्त है (जो अमुक स्थानपर अमुक समयमें मिला था )—इस वाक्यमें 'यह' और 'वह' इन दोनों वचनोंके हेतुभूत देश और कालका अन्तर छोड़ देनेपर देवदत्त एक ही निश्चित होता है । यह जीव कार्य ( शरीर ) की उपाधिसे युक्त है और ईश्वर कारण ( माया ) की उपाधिसहित है । कार्य एव कारणरूपको छोड़ देनेपर पूर्ण ज्ञानस्वरूप बच रहता है ॥९-१२॥ पहले गुरुके द्वारा श्रवण करे । अनन्तर मनन किया जाय । फिर निदिध्यासन करे । यह पूर्णबोधका कारण होता है। दूसरी विद्याओंका सम्यक् ज्ञान भी निश्चय ही नश्वर है, किंतु ब्रह्मविद्याका सम्यक् ज्ञान स्थिर ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है । भगवान् ब्रह्माजीकी आज्ञा है कि गुरु 'षडङ्ग' सहित महावाक्योंका उपदेश करे । केवल महावाक्योंका उपदेश न करे ॥ १३-१५ ॥ भगवान् शङ्कर बोले—'मुनिश्रेष्ठ शुकदेव ! तुम्हारे ब्रह्मवेत्ता पिता व्यासजीकी प्रार्थनासे प्रसन्न होकर मैंने तुम्हें इस रहस्योपनिषद्का उपदेश किया है । इसमें सच्चिदानन्द- स्वरूप ब्रह्मका उपदेश है। तुम उसका नित्य ध्यान करते हुए जीवन्मुक्त होकर विचरण करोगे । जो स्वर ( प्रणव ) वेदके प्रारम्भमें उच्चारण किया जाता है और जो वेदान्तमें ( ज्ञानकाण्डमें ) प्रतिष्ठित है, उसकी प्रकृति ( त्रिमात्रा ) में लीन होनेपर जो उससे परे ( अर्धमात्रास्वरूप ) अवस्थित है, वही महेश्वर ( परब्रह्मका स्वरूप ) है' ॥ १६-१८ ॥ भगवान् शङ्करके द्वारा इस प्रकार उपदेश दिये जानेपर शुकदेवजी सम्पूर्ण जगत्के साथ तन्मयताकाको प्राप्त हो गये । फिर उठकर भगवान् शङ्करको प्रणाम करके सम्पूर्ण परिग्रहको छोड़कर वे मानो परब्रह्मके समुद्रमे तैर रहे हों—इस प्रकार आनन्दमग्न होकर वहाँसे चल पड़े । पुत्रको जाते देखकर महामुनि कृष्णद्वैपायन व्यासजीने उनके पीछे चलते हुए पुत्र-वियोगसे कातर होकर उन्हें पुकारा । उस समय जगत्के समस्त जड-चेतन पदार्थोंने ( व्यासजीकी पुकारका ) प्रत्युत्तर दिया । सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यासने उस उत्तरको सुनकर पुत्रको सकल—जगदात्माकार देखकर अपने पुत्र शुकदेवजीके साथ ( समान ) परमानन्द प्राप्त किया ( उन्हें परम प्रसन्नता हुई ) ॥ १९-२२ ॥ जो गुरुकी कृपासे इस रहस्योपनिषद्का अध्ययन करता है—इसे समझ लेता है, वह सभी पापोंसे छूटकर साक्षात् कैवल्यपदका उपभोग करता है, साक्षात् कैवल्यपदका उपभोग करता है ॥ २३ ॥ ॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय शुकरहस्योपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

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