भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 768, कुल 832 में से

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पृष्ठ 768

७१२ * शुकरहस्योपनिषद् * [ खण्ड ३ [ उसी 'तत्त्वमसि' महावाक्यके 'त्वम्' पदके ऋषि [ अन्तमें महावाक्यके अन्तिम तीसरे 'असि' पदके ऋषि आदिका जप निम्न प्रकारसे करके उसका न्यास करना चाहिये ।] आदिका एव न्यास-मन्त्रोंका उल्लेख किया जाता है ।] त्वंपदमहामन्त्रस्य विष्णुर्ऋषि । गायत्री छन्द । 'असि'पदमहामन्त्रस्य मन ऋषि' । गायत्री छन्द. । परमात्मा देवता । ऐं बीजम् । क्लीं शक्ति । सौ. कीलकम् । अर्धनारीश्वरो देवता । अव्यक्तादिर्बीजम् । नृसिंह. शक्तिः । मम मुक्त्यर्थे जपे विनियोग. । परमात्मा कीलकम् । जीवब्रह्मैक्यार्थे जपे विनियोगः । 'वासुदेवाय' अङ्गुष्ठाभ्या नम. । 'पृथ्विद्व्यणुकाय' अङ्गुष्ठाभ्या नम. । 'सङ्कर्षणाय' तर्जनीभ्या स्वाहा । 'अब्द् व्यणुकाय' तर्जनीभ्या स्वाहा । 'प्रद्युम्नाय' मध्यमाभ्या वषट् । 'तेजोद्व्यणुकाय' मध्यमाभ्या वषट् । 'अनिरुद्धाय' अनामिकाभ्या हुम् । 'वायुद्व्यणुकाय' अनामिकाभ्या हुम् । 'वासुदेवाय' कनिष्ठिकाभ्या वौषट् । 'आकाशद्व्यणुकाय' कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । 'वासुदेवसकर्षणप्रद्युम्नानिरुद्धेभ्य ' करतलकर- 'पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशद्व्यणुकेभ्य.' पृष्ठाभ्या फट् । करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । [ यह करन्यास करके ] इसी मन्त्रसे हृदयादिन्यास [ इस मन्त्रसे करन्यास करके इसी प्रकार हृदयादि- करना चाहिये । 'भूर्भुव सुवरोम्' इस मन्त्रसे दिग्वन्ध करना न्यास करे । ] 'भूर्भुव. सुवरोम्' इस मन्त्रसे दिग्रन्ध कर ले । चाहिये । ध्यान ध्यान जीवो ब्रह्मेति वाक्यार्थं यावदस्ति मन.स्थिति । जीवत्त्व सर्वभूताना सर्वत्राखण्डविग्रहम् । ऐक्यं तत्त्वं लये कुर्वन्ध्यायेदसिपदं सदा ॥† चित्ताहङ्कारयन्तार जीवाख्य त्वपद भजे ॥* इस प्रकार महावाक्यके पडङ्ग (-न्यास ) बतलाये गये । , ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय खण्ड चारों महावाक्योंकी पदविन्यासपूर्वक व्याख्या अब रहस्योपनिषद्के विभागके अनुसार वाक्योंका अर्थ देहमे परिपूर्ण परमात्मा बुद्धिके साक्षिरूपसे अवस्थित होकर बतलानेवाले श्लोक कहे जाते हैं । [ वाक्यार्थ श्लोकोंमे है, स्फुरित होनेपर 'अह' कहे जाते हे । स्वतः पूर्ण परात्मा यहाँ और श्लोकोंका भाव इस प्रकार है-] जिसके द्वारा ( प्राणी ) 'ब्रह्म' शब्दसे वर्णित है, तथा 'अस्मि' ( मैं हूँ ) यह पद उनके देखता है, इस जगत्के विषयोंको सुनता है, सूँघता है, वाणी- साथ अपनी एकताका बोध कराता है, अतः मे ब्रह्मस्वरूप द्वारा कहता है और स्वादिष्ट या अस्वादिष्टको पहचानता है ही हूँ ॥ ३-४ ॥ ( रसज्ञान करता है ), उसे 'प्रज्ञान' कहा गया है । चतुर्मुख [ 'तत्त्वमसि' वाक्यमे ] सृष्टिके पूर्व एकमात्र द्वैतकी सत्ता- ब्रह्माजी, देवराज इन्द्र, देवगण, मनुष्य एव घोड़े, गाय प्रभृति से रहित, नाम-रूपहीन सत्ता थी और अब भी वह सत्ता वैसी पशुओंमे एक ही चेतनतत्त्व ब्रह्म है । वही प्रज्ञान ( ज्ञानरूप ) ही है- 'तत्' पदसे यह प्रतिपादित होता है । उपदेश श्रवण ब्रह्म मुझमें भी है ॥ १-२ ॥ करनेवाले शिष्यका जो देह और इन्द्रियोंसे अतीतस्वरूप है, ब्रह्मादिचारो प्राप्त करनेके अधिकारी इस ( मानव ) वही यहाँ महावाक्यके 'त्व' पदसे वर्णित है तथा महावाक्यके

  • जो सम्पूर्ण प्राणियोंके जीव-तत्त्वका बोधक है, जिसकी मूर्ति सर्वत्र अखण्डित है और जो चित्त तथा अहङ्कारका नियन्त्रणकर्ता है, उस 'त्वम्' पदके द्वारा बोध्य जीव-नामक परमेश्वरका हम स्मरण करते हैं। † जबतक मनकी स्थिति है ( जबतक मनोनाश नहीं हो जाता ), तबतक 'जीव ब्रह्म ही ह', इस वाक्यार्थके रूपमें 'असि' पदका चिन्तन करे, अर्थात् 'असि' पद जीव और ब्रह्मकी एकता बतला रहा है- इस भावका मनन करता रहे । फिर यों करते-करते जब मनका लय हो जाय, तब जीव और ब्रह्म दोनोंकी एकतारूप तत्त्वका अनुभव करते हुए 'असि' पदके तात्पर्यको सदा ध्यानके द्वारा प्रत्यक्ष करता रहे ।
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