भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 767

खण्ड २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७११


पनिषद् शिरःस्थानीय ( सर्वोत्तम ) है। जिस विचारवान्ने रहस्योपनिषद्में उपदिष्ट ब्रह्मका ध्यान किया है, उसे पुण्यके हेतुभूत तीर्थ-स्नान, मन्त्रजप, वेद-पाठ तथा जपादिसे क्या प्रयोजन है। महावाक्योंके अर्थको सौ वर्षोंतक विचार करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह उनके ऋष्यादि-स्मरण तथा ध्यानपूर्वक एक बारके जपसे ही प्राप्त हो जाता है ॥ १२-१७॥

[ ऋष्यादि षडङ्गका पाठ करके पुनः उनका मस्तकादिमे न्यास करना चाहिये। वह इस प्रकार है — ]

ॐ अस्य श्रीमहावाक्यमहामन्त्रस्य हस ऋषि । अव्यक्तगायत्री छन्दः। परमहंसो देवता । हं बीजम् । स शक्तिः । सोऽह कीलकम्। मम परमहंसप्रीत्यर्थे महावाक्यजपे विनियोग ।

[ निम्न प्रकारसे दोनों हाथोंकी निर्दिष्ट अंगुलियोंका स्पर्श करते हुए न्यास करना चाहिये—]

‘सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ अङ्गुष्ठाभ्या नम । ‘नित्यानन्दो ब्रह्म’ तर्जनीभ्या स्वाहा। ‘नित्यानन्दमय ब्रह्म’ मध्यमाभ्या वषट् । ‘यो वै भूमा’ अनामिकाभ्या हुम् । ‘यो वै भूमाधिपतिः’ कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । ‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म’ करतलकरपृष्ठाभ्या फट् ।

[ फिर नीचेकी रीतिसे हृदयादिको स्पर्श करते हुए न्यास करना चाहिये । ]

‘सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ हृदयाय नम । ‘नित्यानन्दो ब्रह्म’ शिरसे स्वाहा। ‘नित्यानन्दमय ब्रह्म’ शिखायै वषट् । ‘यो वै भूमा’ कवचाय हुम् । ‘यो वै भूमाधिपति.’ नेत्रत्रयाय वौषट् । ‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म’ अस्त्राय फट् । ‘भूर्भुव सुवरोम्’ इस मन्त्रसे दिगवन्ध करना चाहिये।

ध्यान नित्यानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् । एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरु तं नमामि ॥*

॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥


द्वितीय खण्ड

‘तत्त्वमसि’ महावाक्यके प्रत्येक पदके पृथक्-पृथक् षडङ्गन्यास

महावाक्य चार हैं— १—‘ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म’ । २—‘ॐ अहं ब्रह्मास्मि’ । ३-‘ॐ तत्त्वमसि’ और ४-‘ॐ अयमात्मा ब्रह्म’। इनमेंसे ‘तत्त्वमसि’ इस अभेदवाचक (जीवब्रह्मके अभेदके प्रतिपादक) महावाक्यका जो लोग जप करते हैं, वे भगवान् शङ्करकी सायुज्यमुक्तिके अधिकारी होते हैं।

[‘तत्त्वमसि’ महावाक्यके ‘तत्’ पदरूप महामन्त्रके ऋषि आदिका स्मरण निम्नरूपसे करके उनका यथास्थान न्यास करना चाहिये---]

तत्पदमहामन्त्रस्य परमहस ऋषि । अव्यक्तगायत्री छन्द । परमहसो देवता । ह बीजम् । स शक्ति । सोऽहं कीलकम् । मम सायुज्यमुक्त्यर्थे जपे विनियोग ।

[ करन्यास ] ‘तत्पुरुषाय’ अङ्गुष्ठाभ्या नमः। ‘ईशानाय’ तर्जनीभ्या स्वाहा। ‘अघोराय’ मध्यमाभ्या वषट् । ‘सद्योजाताय’ अनामिकाभ्या हुम् । ‘वामदेवाय’ कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । ‘तत्पुरुषेशानाघोरसद्योजातवामदेवेभ्यो नम’ करतलकरपृष्ठाभ्या फट् ।

इन्हीं करन्यासके मन्त्रोंसे हृदयादिन्यास करके ‘भूर्भुव. सुवरोम्’ इस मन्त्रसे दिग्वन्ध करना चाहिये।

ध्यान ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यादतीतं शुद्ध बुद्धं मुक्तमप्यव्ययं च। सत्यं ज्ञानं सच्चिदानन्दरूपं ध्यायद्वेदं तन्महो भ्राजमानम् ॥†


* नित्यानन्दरूप, परमसुखदायी, कैवल्यरूप, ज्ञानमूर्ति, द्वन्द्वोंसे परे, आकाशके समान व्यापक एव निर्लेप, ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्योंके लक्ष्य, एक, नित्य, निर्मल, स्थिर, सम्पूर्ण बुद्धियोंके साक्षिरूपमें अवस्थित, षड्भावविकारोंसे अतीत, त्रिगुणोंसे रहित, उन परमब्रह्मस्वरूप सद्गुरुदेवको हम नमस्कार करते हैं। † ज्ञानके साधन एव ज्ञानके विषय, तथा साथ ही ज्ञानकी गम्यतासे परे, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, अव्यय, सत्यस्वरूप, ज्ञान-स्वरूप एव सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशमय रूपमें उस दिव्य प्रकाशका ध्यान करे ।

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