भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 766, कुल 832 में से

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पृष्ठ 766

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय शुकरहस्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः .!! शान्तिः. !!! प्रथम खण्ड भगवान् शंकरका शुकदेवजीको उपदेश 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके षडङ्गन्यास

अब हम रहस्योपनिषद्की व्याख्या करते हैं। एक समय देवर्षिगणोंने पितामह ब्रह्माजीकी पूजा की और प्रणाम करके उनसे पूछा-‘भगवन् ! हमें गूढ उपनिषत्तत्त्व बतलायें।' तब ब्रह्माजीने कहा—पहले एक समय महातेजस्वी, समस्त वेदोंके ज्ञाता तपोनिधि वेदव्यासने पार्वतीके साथ भगवान् शङ्करको दण्डवत् प्रणाम करके, हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना की थी—॥ १॥ श्रीवेदव्यासजीने कहा—‘देव-देव, महाप्राज्ञ, जीवके बन्धनको काटनेका दृढ व्रत धारण करनेवाले प्रभो ! मेरे पुत्र शुकदेवके वेदाध्ययनके लिये किये जानेवाले उपनयन-संस्कार- कर्ममें यह प्रणव एवं गायत्री-मन्त्रके उपदेशका समय आ गया है। अतः हे जगद्गुरो ! आप उन्हें ब्रह्म-प्रणव एवं परमात्म-तत्त्वका उपदेश करें' ॥ २-३ ॥ भगवान् शङ्करने कहा—'मेरे द्वारा कैवल्यस्वरूप साक्षात् सनातन परब्रह्मका उपदेश दिये जानेपर तुम्हारा पुत्र वैराग्य- पूर्वक सब कुछ छोड़कर स्वतः प्रकाशस्वरूपको प्राप्त कर लेगा। तात्पर्य यह कि मेरे द्वारा पुत्रको ब्रह्मज्ञानका उपदेश करानेका आग्रह करोगे तो पुत्र विरक्त हो जायगा' ॥ ४ ॥ श्रीवेदव्यासजीने प्रार्थना की—'महेश्वर ! मेरे पुत्रका जो भी होना हो, सो हो किंतु इस उपनयन-कर्मके समय आपकी कृपासे, आपके द्वारा ब्रह्मज्ञानका उपदेश पाकर मेरा पुत्र शीघ्र ही सर्वज्ञ हो जाय । आपकी कृपासे वह चारो प्रकारके ( सायुज्य, सामीप्य, सारूप्य एवं सालोक्य ) मोक्षोंको प्राप्त करे' ॥ ५-६ ॥

श्रीवेदव्यासजीकी ऐसी प्रार्थना सुनकर भगवान् शङ्कर प्रसन्न होकर सम्पूर्ण देवर्षियोंकी सभामें उपदेश देनेके लिये भगवती पार्वतीके साथ दिव्य आसनपर विराजमान हुए । तब कृत कृत्य ( सफलमनोरथ ) श्रीशुकदेवजीने आकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक उन ( भगवान् शिव ) से प्रणवकी दीक्षा ग्रहण की और फिर उन भगवान् शङ्करसे यह प्रार्थना की— ‘देवाधिदेव, सर्वज्ञ, सच्चिदानन्दस्वरूप, उमारमण, भूत- नाथ, दयानिधे ! आप प्रसन्न हों। आपने मुझे प्रणवके अन्तर्गत ( प्रत्यगात्मारूप ) एवं उससे परे स्थित परम ब्रह्मका उपदेश तो कर दिया अब मैं विशेषतः 'तत्त्वमसि', 'प्रज्ञानं ब्रह्म' प्रभृति चारो महावाक्योंका षडङ्गन्यास क्रमपूर्वक सुनना चाहता हूँ। सदाशिव प्रभो ! अब कृपा करके आप उनका रहस्य बतलायें' ॥ ७-१६ ॥ भगवान् सदाशिव बोले—'हे ज्ञाननिधि शुकदेवजी ! मुने ! तुम अत्यन्त बुद्धिमान् हो। तुम्हें अनेको साधुवाद । तुमने वेदोंमें छिपे हुए, पूछने योग्य रहस्यको ही पूछा है; अतः रहस्योपनिषद् नामसे प्रसिद्ध इस गूढ रहस्यमय उपदेशका षडङ्गन्यास सहित वर्णन किया जाता है, जिसके भली प्रकार जान लेने मात्रसे साक्षात् मोक्ष प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं। फिर ( नियम यह है कि ) गुरु अङ्गहीन वाक्योंका उपदेश न करे । सभी महावाक्योंका उपदेश उनके षडङ्गके साथ ही करे। जैसे चारों वेदोंमें उपनिषद्भाग (ज्ञानकाण्ड) शिरःस्थानीय ( सर्वोत्तम ) है, वैसे ही समस्त उपनिषदोंमें यह रहस्यो-

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