कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 820, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ सामवेदीय जाबालोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! पाशुपत-मतके अनुसार तत्त्वविचार; भस्म-धारणकी विधि तथा माहात्म्य; त्रिपुण्ड्रकी तीन रेखाओंका अर्थ
हरिः ॐ । एक बार भगवान् जाबालिके पास पिप्पलादके पुत्र पैप्पलादि मुनि गये और उनसे बोले—'भगवन् ! मुझे परमतत्त्वका रहस्य बतलाइये। क्या तत्त्व है, कौन जीव है, कौन पशु है, कौन ईश्वर है और मोक्षका उपाय क्या है ?' भगवान् जाबालिने उनसे कहा—'तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है, जैसा मुझे ज्ञात है, वह सब निवेदन करूँगा।' फिर पैप्पलादि मुनि- ने उनसे पूछा—'आपको यह किसके द्वारा ज्ञात हुआ ?' वे पुनः उनसे बोले—'श्रीकार्तिकेयजीसे।' पैप्पलादिने फिर पूछा— 'षडाननको किससे ज्ञात हुआ ?' वे बोले—'श्रीमहादेवजीसे।' पैप्पलादिने फिर उनसे पूछा—'महादेवजीसे उन्होंने किस प्रकार जाना ?' तब जाबालिने उत्तर दिया—'महादेवजीकी उपासनाके द्वारा।' फिर पैप्पलादिने जाबालिसे कहा—'भगवन् ! कृपापूर्वक हमें यह सब कुछ रहस्यसहित बतलाइये।' उनके द्वारा पूछे जानेपर जाबालिने सब तत्त्व बतलाया—'पशुपति ही अहङ्कार- से युक्त होकर जब सासारिक जीव बनते हैं, तब पशु कहलाते हैं। पाँच कृत्योंसे सम्पन्न सर्वज्ञ, सर्वेश्वर महेश्वर ही पशुपति हैं।' 'पशु कौन हैं ?' यह पूछनेपर उन्होंने बतलाया कि 'जीव ही पशु कहलाते हैं।' उनके पति होनेके कारण महेश्वर पशुपति हैं। पैप्पलादिने फिर पूछा—'जीव कैसे पशु कहलाते हैं और महेश्वर कैसे पशुपति ?' भगवान् जाबालिने उनसे कहा—'जिस प्रकार घास-चारा खानेवाले, अविवेकी—जड़, दूसरोंके द्वारा हाँके जानेवाले, खेती आदिके काममें नियुक्त, सब दुःखोंको सहनेवाले तथा अपने स्वामी- के द्वारा बाँधे जानेवाले गौ आदि पशु होते हैं, वैसे ही जीव भी पशु कहलाते हैं। तथा उनके स्वामीके समान होनेके कारण सर्वज्ञ ईश्वर ही पशुपति हैं।' 'उनका ज्ञान किस उपायसे होता है ?' तब भगवान् जाबालिने उत्तर दिया 'विभूति धारण करनेसे।' 'उसकी क्या विधि है ? कहाँ-कहाँ उसे धारण करना चाहिये ?' भगवान् जाबालि पुनः उनसे कहने लगे—'सद्योजातादि' पाँच ब्रह्मसंज्ञक मन्त्रोंसे भस्म ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवे भवेनातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ ॐ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ ॐ ईशान सर्वविद्यानाम् ईश्वर सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणो ऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मेऽस्तु सदाशिवोम् ॥