भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 819
  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७६३ 'इसके पश्चात् परमहंस परिव्राजकोंके लिये भूमिपर ही आसन और शयन आदिका, ब्रह्मचर्यपूर्वक रहनेका तथा मिट्टी- का पात्र, तूंबी अथवा काष्ठका कमण्डलु रखनेका विधान है। संन्यासियोंको काम, क्रोध, हर्ष, रोष, लोभ, मोह, दम्भ, दर्प, इच्छा, परनिन्दा, ममता, अहङ्कार आदिका भी परित्याग कर देना चाहिये । वर्षा ऋतुमें एक स्थानमें स्थिर होकर रहे; शेष आठ महीने अकेला विचरण करे, अथवा -एक और साथी लेकर, दो होकर विचरे, दो होकर विचरे ॥ ४ ॥ 'इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् ( संन्यासी होना चाहे ) वह उपनयनके अनन्तर अथवा पहले भी उपर्युक्त विधिसे अपने माता-पिता, पुत्र, अग्नि, उपवीत, कर्म, पत्नी अथवा अन्य जो कुछ भी हो—सबका परित्याग कर दे। संन्यासियोंको चाहिये कि हाथोंको ही पात्र बनाकर अथवा उदरको ही पात्रके रूपमें लेकर भिक्षाके लिये गाँवमें प्रवेश करे । उस समय 'ॐ हि ॐ हि ॐ हि' इस उपनिषद्- मन्त्रका उच्चारण करे । यह उपनिषद् है; जो इस उपनिषद्को निश्चयपूर्वक यों जानता है, वही विद्वान् है । पलाश, बेल, पीपल अथवा गूलरके दण्ड, मूँजकी मेखला तथा यज्ञोपवीत ( अर्थात् द्विजत्वके बाह्य उपकरणों ) को त्यागकर जो इस प्रकार जानता है, वही शूरवीर है । जो आकाशमें तेजोमय सूर्यमण्डलकी भाँति, परम व्योममें चिन्मय प्रकाशद्वारा सब ओर व्याप्त है, भगवान् विष्णुके उस परम धामको विद्वान् उपासक सदा ही देखते हैं। साधनामें सदा जाग्रत् रहनेवाले निष्काम उपासक ब्राह्मण वहाँ पहुँचकर उस परमधामको और भी उद्दीप्त किये रहते हैं, जिसे विष्णुका परम पद कहते हैं । वह परम पद निष्काम उपासकको प्राप्त होता है । जो इस प्रकार जानता है, वह उक्त फलका भागी होता है । यह महा उपनिषद् है' ॥ ५ ॥ ॥ सामवेदीय आरुणिकोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! दो विद्याएँ द्वे विद्ये वेदितव्ये तु शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ग्रन्थमभ्यस्य मेधावी ज्ञानविज्ञानतत्त्वतः । पलालमिव धान्यार्थी त्यजेद् ग्रन्थमशेषतः ॥ ( ब्रह्मविन्दूपनिषद् १७-१८ ) दो विद्याएँ जाननेकी हैं—'शब्दब्रह्म' और 'परब्रह्म'—शास्त्रज्ञान और भगवान्‌का यथार्थ स्वरूपज्ञान । 'शास्त्रज्ञानमें निपुण हो जानेपर मनुष्य भगवान्‌को भी जान लेता है । बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह ग्रन्थका अभ्यास करके उसके ज्ञान-विज्ञानरूप तत्त्वको प्राप्त कर ले, फिर उस ग्रन्थको वैसे ही त्याग दे, जैसे धान चाहनेवाला मनुष्य धानको लेकर पुआल- को खलिहानमें छोड़ देता है ।