भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 818, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 818

ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ सामवेदीय आरुणि उपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! संन्यासग्रहणकी विधि तथा संन्यासके नियम

ॐ—प्रजापतिके उपासक अरुणके पुत्र आरुणि ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके पास गये । वहाँ जाकर बोले— 'भगवन् ! किस प्रकार मैं समस्त कर्मोंका त्याग कर सकता हूँ?' ब्रह्माजीने उनसे कहा—'अपने पुत्र, भाई-बन्धु आदिको, शिखा, यज्ञोपवीत, यज्ञ एव स्वाध्यायको तथा भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक एवं अतल, तलातल, वितल, सुतल, रसातल, महातल और पातालको—इस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका त्याग कर दे । केवल दण्ड, आच्छादनके लिये वस्त्र तथा कौपीन धारण करे । शेष सब कुछ त्याग दे ॥ १ ॥ आरण्यकोंकी [आवृत्ति ( पाठ एव मनन ) करे, उपनिषदोंकी आवृत्ति करे । उपनिषदोंकी आवृत्ति करे ॥ २ ॥ 'निश्चय ही ब्रह्मको सूचित करनेवाला सूत्र—ब्रह्मसूत्र मैं ही हूँ, यों समझकर त्रिवृत्सूत्र अर्थात् उपवीतका त्याग करे । इस प्रकार समझनेवाला विद्वान् 'मया सन्यस्तम्, मया सन्यस्तम्, मया संन्यस्तम्' (मैंने सन्यास लिया, मैंने सर्वत्याग कर दिया, मैंने सब कुछ छोड़ दिया )—यों तीन बार कहकर—

अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । सखा मा गोपायौजः सखा योऽसीन्द्रस्य वज्रोऽसि वार्त्रघ्नः शर्म मे भव यत्पापं तन्निवारय ॥*

'गृहस्थ हो, ब्रह्मचारी हो या वानप्रस्थ हो, यज्ञोपवीतको भूमिपर अथवा जलमें छोड़ दे । लौकिक अग्नियोंको अर्थात् अग्निहोत्रकी तीनों अग्नियोंको अपनी जठराग्निमें लीन करे तथा गायत्रीको अपनी वाणीरूपी अग्निमें स्थापित करे । कुटीमें रहनेवाला ब्रह्मचारी अपने कुटुम्बको छोड़ दे; पात्रका त्याग कर दे, पवित्री ( कुशा ) को त्याग दे । दण्डों और लोकोंका त्याग करे—इस प्रकार उन्होंने कहा । इसके बाद मन्त्रहीनके समान आचरण करे । ऊर्ध्वगमन अर्थात् ऊर्ध्वलोकोंमें जानेकी इच्छा भी न करे । औषधकी भाँति ( स्वाद-बुद्धि न रखकर, केवल शरीर-रक्षाके लिये ) अन्न ग्रहण करे; तीनों सन्ध्याओंके पूर्व स्नान करे । सन्ध्याकालमें समाधिमें स्थित होकर परमात्माका अनुसन्धान करे । सब वेदोंमें —इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित बाँसका दण्ड और कौपीन धारण करे; ओषधिकी भाँति भोजन करे; ओषधिकी भाँति अल्पमात्रामें भोजन करे, जो कुछ मिल जाय वही खा ले । आरुणि ! ब्रह्मचर्य, अहिंसा, अपरिग्रह तथा सत्यकी यत्नपूर्वक रक्षा करो, रक्षा करो, रक्षा करो ॥ ३ ॥


  • सब (हिंस्र तथा अहिंस्र) प्राणियोंको अभय प्राप्त हो—किसीको भी मुझसे भय न हो, क्योंकि मुझसे ही सारा विश्व प्रवर्तित होता है। दण्ड ! तुम मेरे मित्र हो, मेरे ओजकी रक्षा करो । तुम मेरे मित्र हो, वृत्रासुरको मारनेवाले इन्द्रके वज्र हो। वज्र ! मुझे सुख प्रदान करो। मुझे सन्यास-धर्मसे गिरानेवाला जो भी पाप हो, उसका निवारण करो।