भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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उपदेश ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७६१ आदिकी त्रिपुटीसे भी वह मुक्त हो जाता है। समस्त संसार- 'सोऽहम्' (वह ब्रह्म मैं हूँ)-इस महावाक्यके उपदेशमें को त्यागकर वह कभी उसके दुःखसे मोहित नहीं होता। उसकी सहज स्थिति हो जाती है। वह परब्रह्म ही भगवान् परिव्राजक कैसा हो ? वह लौकिक धनसे रहित होनेपर ही विष्णुका परमधाम है; जहाँ जाकर योगी पुरुष वहाँसे सुखी होता है। वह ब्रह्मात्मज्ञानरूप धनसे सम्पन्न हो ज्ञान- इस संसारमें नहीं लौटते । वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता अज्ञान दोनोंसे ऊपर उठ जाता है। सुख-दुःख दोनोंके पार है और न चन्द्रमा ही प्रकाश फैलाता है। उस परम पदको पहुँच जाता है। वह आत्मज्योतिसे ही प्रकाश ग्रहण करता प्राप्त होनेवाला वह महात्मा इस संसारमे नहीं लौटता, है। सब ज्ञातव्य पदार्थ उसे ज्ञात हो जाते हैं। वह सर्वज्ञ, इस संसारमें नहीं लौटता। वही कैवल्यपद है। इतना ही यह -सब सिद्धियोंका दाता और सर्वेश्वर हो जाता है। क्योंकि उपनिषद् है ॥ २३ ॥ ॥ नवम उपदेश समाप्त ॥ ९ ॥ ॥ अथर्ववेदीय नारदपरिव्राजकोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! अमृतत्वकी प्राप्तिका साधन तपोविजितचित्तस्तु निःशब्दं देशमास्थितः । निःसङ्गतत्त्वयोगज्ञो निरपेक्षः शनैः शनैः ॥ पाशं छित्त्वा यथा हंसो निर्विशङ्कं खमुत्क्रमेत् । छिन्नपाशस्तथा जीवः संसारं तरते सदा ॥ यथा निर्वाणकाले तु दीपो दग्ध्वा लयं व्रजेत् । तथा सर्वाणि कर्माणि योगी दग्ध्वा लयं व्रजेत् ॥ अमृतत्त्वं समाप्नोति यदा कामात्स मुच्यते । सर्वैषणाविनिर्मुक्तश्छित्त्वा तं तु न बध्यते ॥ (क्षुरिकोपनिषद्) तपके द्वारा जिसने चित्तको जीत लिया है, उसे शब्दरहित एकान्त स्थानमें स्थित होकर सङ्गशून्य तत्त्वके लिये योगका ज्ञाता बनना और धीरे-धीरे अपेक्षारहित बनना चाहिये । जैसे बन्धनको काटकर हंस आकाशमें विशङ्क उड़ जाता है, वैसे ही जिसके बन्धन कट गये हैं, वह जीव संसारसे सदाके लिये तर जाता है। जैसे दीपक बुझनेके समय सारे तैलको जलाकर बुझ जाता है, वैसे ही योगी समस्त कर्मोंको जलाकर ब्रह्ममें लीन हो जाता है। साधक जब समस्त कामनाओंसे छूट जाता है और सारी तृष्णाओंसे रहित हो जाता है, तब वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। यों संसार-बन्धनको काट डालनेके बाद वह बँधता नहीं। उ० अ० १६—