कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
उपदेश ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७६१ आदिकी त्रिपुटीसे भी वह मुक्त हो जाता है। समस्त संसार- 'सोऽहम्' (वह ब्रह्म मैं हूँ)-इस महावाक्यके उपदेशमें को त्यागकर वह कभी उसके दुःखसे मोहित नहीं होता। उसकी सहज स्थिति हो जाती है। वह परब्रह्म ही भगवान् परिव्राजक कैसा हो ? वह लौकिक धनसे रहित होनेपर ही विष्णुका परमधाम है; जहाँ जाकर योगी पुरुष वहाँसे सुखी होता है। वह ब्रह्मात्मज्ञानरूप धनसे सम्पन्न हो ज्ञान- इस संसारमें नहीं लौटते । वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता अज्ञान दोनोंसे ऊपर उठ जाता है। सुख-दुःख दोनोंके पार है और न चन्द्रमा ही प्रकाश फैलाता है। उस परम पदको पहुँच जाता है। वह आत्मज्योतिसे ही प्रकाश ग्रहण करता प्राप्त होनेवाला वह महात्मा इस संसारमे नहीं लौटता, है। सब ज्ञातव्य पदार्थ उसे ज्ञात हो जाते हैं। वह सर्वज्ञ, इस संसारमें नहीं लौटता। वही कैवल्यपद है। इतना ही यह -सब सिद्धियोंका दाता और सर्वेश्वर हो जाता है। क्योंकि उपनिषद् है ॥ २३ ॥ ॥ नवम उपदेश समाप्त ॥ ९ ॥ ॥ अथर्ववेदीय नारदपरिव्राजकोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! अमृतत्वकी प्राप्तिका साधन तपोविजितचित्तस्तु निःशब्दं देशमास्थितः । निःसङ्गतत्त्वयोगज्ञो निरपेक्षः शनैः शनैः ॥ पाशं छित्त्वा यथा हंसो निर्विशङ्कं खमुत्क्रमेत् । छिन्नपाशस्तथा जीवः संसारं तरते सदा ॥ यथा निर्वाणकाले तु दीपो दग्ध्वा लयं व्रजेत् । तथा सर्वाणि कर्माणि योगी दग्ध्वा लयं व्रजेत् ॥ अमृतत्त्वं समाप्नोति यदा कामात्स मुच्यते । सर्वैषणाविनिर्मुक्तश्छित्त्वा तं तु न बध्यते ॥ (क्षुरिकोपनिषद्) तपके द्वारा जिसने चित्तको जीत लिया है, उसे शब्दरहित एकान्त स्थानमें स्थित होकर सङ्गशून्य तत्त्वके लिये योगका ज्ञाता बनना और धीरे-धीरे अपेक्षारहित बनना चाहिये । जैसे बन्धनको काटकर हंस आकाशमें विशङ्क उड़ जाता है, वैसे ही जिसके बन्धन कट गये हैं, वह जीव संसारसे सदाके लिये तर जाता है। जैसे दीपक बुझनेके समय सारे तैलको जलाकर बुझ जाता है, वैसे ही योगी समस्त कर्मोंको जलाकर ब्रह्ममें लीन हो जाता है। साधक जब समस्त कामनाओंसे छूट जाता है और सारी तृष्णाओंसे रहित हो जाता है, तब वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। यों संसार-बन्धनको काट डालनेके बाद वह बँधता नहीं। उ० अ० १६—
ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ सामवेदीय आरुणि उपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! संन्यासग्रहणकी विधि तथा संन्यासके नियम
ॐ—प्रजापतिके उपासक अरुणके पुत्र आरुणि ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके पास गये । वहाँ जाकर बोले— 'भगवन् ! किस प्रकार मैं समस्त कर्मोंका त्याग कर सकता हूँ?' ब्रह्माजीने उनसे कहा—'अपने पुत्र, भाई-बन्धु आदिको, शिखा, यज्ञोपवीत, यज्ञ एव स्वाध्यायको तथा भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक एवं अतल, तलातल, वितल, सुतल, रसातल, महातल और पातालको—इस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका त्याग कर दे । केवल दण्ड, आच्छादनके लिये वस्त्र तथा कौपीन धारण करे । शेष सब कुछ त्याग दे ॥ १ ॥ आरण्यकोंकी [आवृत्ति ( पाठ एव मनन ) करे, उपनिषदोंकी आवृत्ति करे । उपनिषदोंकी आवृत्ति करे ॥ २ ॥ 'निश्चय ही ब्रह्मको सूचित करनेवाला सूत्र—ब्रह्मसूत्र मैं ही हूँ, यों समझकर त्रिवृत्सूत्र अर्थात् उपवीतका त्याग करे । इस प्रकार समझनेवाला विद्वान् 'मया सन्यस्तम्, मया सन्यस्तम्, मया संन्यस्तम्' (मैंने सन्यास लिया, मैंने सर्वत्याग कर दिया, मैंने सब कुछ छोड़ दिया )—यों तीन बार कहकर—
अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । सखा मा गोपायौजः सखा योऽसीन्द्रस्य वज्रोऽसि वार्त्रघ्नः शर्म मे भव यत्पापं तन्निवारय ॥*
'गृहस्थ हो, ब्रह्मचारी हो या वानप्रस्थ हो, यज्ञोपवीतको भूमिपर अथवा जलमें छोड़ दे । लौकिक अग्नियोंको अर्थात् अग्निहोत्रकी तीनों अग्नियोंको अपनी जठराग्निमें लीन करे तथा गायत्रीको अपनी वाणीरूपी अग्निमें स्थापित करे । कुटीमें रहनेवाला ब्रह्मचारी अपने कुटुम्बको छोड़ दे; पात्रका त्याग कर दे, पवित्री ( कुशा ) को त्याग दे । दण्डों और लोकोंका त्याग करे—इस प्रकार उन्होंने कहा । इसके बाद मन्त्रहीनके समान आचरण करे । ऊर्ध्वगमन अर्थात् ऊर्ध्वलोकोंमें जानेकी इच्छा भी न करे । औषधकी भाँति ( स्वाद-बुद्धि न रखकर, केवल शरीर-रक्षाके लिये ) अन्न ग्रहण करे; तीनों सन्ध्याओंके पूर्व स्नान करे । सन्ध्याकालमें समाधिमें स्थित होकर परमात्माका अनुसन्धान करे । सब वेदोंमें —इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित बाँसका दण्ड और कौपीन धारण करे; ओषधिकी भाँति भोजन करे; ओषधिकी भाँति अल्पमात्रामें भोजन करे, जो कुछ मिल जाय वही खा ले । आरुणि ! ब्रह्मचर्य, अहिंसा, अपरिग्रह तथा सत्यकी यत्नपूर्वक रक्षा करो, रक्षा करो, रक्षा करो ॥ ३ ॥
- सब (हिंस्र तथा अहिंस्र) प्राणियोंको अभय प्राप्त हो—किसीको भी मुझसे भय न हो, क्योंकि मुझसे ही सारा विश्व प्रवर्तित होता है। दण्ड ! तुम मेरे मित्र हो, मेरे ओजकी रक्षा करो । तुम मेरे मित्र हो, वृत्रासुरको मारनेवाले इन्द्रके वज्र हो। वज्र ! मुझे सुख प्रदान करो। मुझे सन्यास-धर्मसे गिरानेवाला जो भी पाप हो, उसका निवारण करो।
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७६३ 'इसके पश्चात् परमहंस परिव्राजकोंके लिये भूमिपर ही आसन और शयन आदिका, ब्रह्मचर्यपूर्वक रहनेका तथा मिट्टी- का पात्र, तूंबी अथवा काष्ठका कमण्डलु रखनेका विधान है। संन्यासियोंको काम, क्रोध, हर्ष, रोष, लोभ, मोह, दम्भ, दर्प, इच्छा, परनिन्दा, ममता, अहङ्कार आदिका भी परित्याग कर देना चाहिये । वर्षा ऋतुमें एक स्थानमें स्थिर होकर रहे; शेष आठ महीने अकेला विचरण करे, अथवा -एक और साथी लेकर, दो होकर विचरे, दो होकर विचरे ॥ ४ ॥ 'इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् ( संन्यासी होना चाहे ) वह उपनयनके अनन्तर अथवा पहले भी उपर्युक्त विधिसे अपने माता-पिता, पुत्र, अग्नि, उपवीत, कर्म, पत्नी अथवा अन्य जो कुछ भी हो—सबका परित्याग कर दे। संन्यासियोंको चाहिये कि हाथोंको ही पात्र बनाकर अथवा उदरको ही पात्रके रूपमें लेकर भिक्षाके लिये गाँवमें प्रवेश करे । उस समय 'ॐ हि ॐ हि ॐ हि' इस उपनिषद्- मन्त्रका उच्चारण करे । यह उपनिषद् है; जो इस उपनिषद्को निश्चयपूर्वक यों जानता है, वही विद्वान् है । पलाश, बेल, पीपल अथवा गूलरके दण्ड, मूँजकी मेखला तथा यज्ञोपवीत ( अर्थात् द्विजत्वके बाह्य उपकरणों ) को त्यागकर जो इस प्रकार जानता है, वही शूरवीर है । जो आकाशमें तेजोमय सूर्यमण्डलकी भाँति, परम व्योममें चिन्मय प्रकाशद्वारा सब ओर व्याप्त है, भगवान् विष्णुके उस परम धामको विद्वान् उपासक सदा ही देखते हैं। साधनामें सदा जाग्रत् रहनेवाले निष्काम उपासक ब्राह्मण वहाँ पहुँचकर उस परमधामको और भी उद्दीप्त किये रहते हैं, जिसे विष्णुका परम पद कहते हैं । वह परम पद निष्काम उपासकको प्राप्त होता है । जो इस प्रकार जानता है, वह उक्त फलका भागी होता है । यह महा उपनिषद् है' ॥ ५ ॥ ॥ सामवेदीय आरुणिकोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! दो विद्याएँ द्वे विद्ये वेदितव्ये तु शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ग्रन्थमभ्यस्य मेधावी ज्ञानविज्ञानतत्त्वतः । पलालमिव धान्यार्थी त्यजेद् ग्रन्थमशेषतः ॥ ( ब्रह्मविन्दूपनिषद् १७-१८ ) दो विद्याएँ जाननेकी हैं—'शब्दब्रह्म' और 'परब्रह्म'—शास्त्रज्ञान और भगवान्का यथार्थ स्वरूपज्ञान । 'शास्त्रज्ञानमें निपुण हो जानेपर मनुष्य भगवान्को भी जान लेता है । बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह ग्रन्थका अभ्यास करके उसके ज्ञान-विज्ञानरूप तत्त्वको प्राप्त कर ले, फिर उस ग्रन्थको वैसे ही त्याग दे, जैसे धान चाहनेवाला मनुष्य धानको लेकर पुआल- को खलिहानमें छोड़ देता है ।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ सामवेदीय जाबालोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! पाशुपत-मतके अनुसार तत्त्वविचार; भस्म-धारणकी विधि तथा माहात्म्य; त्रिपुण्ड्रकी तीन रेखाओंका अर्थ
हरिः ॐ । एक बार भगवान् जाबालिके पास पिप्पलादके पुत्र पैप्पलादि मुनि गये और उनसे बोले—'भगवन् ! मुझे परमतत्त्वका रहस्य बतलाइये। क्या तत्त्व है, कौन जीव है, कौन पशु है, कौन ईश्वर है और मोक्षका उपाय क्या है ?' भगवान् जाबालिने उनसे कहा—'तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है, जैसा मुझे ज्ञात है, वह सब निवेदन करूँगा।' फिर पैप्पलादि मुनि- ने उनसे पूछा—'आपको यह किसके द्वारा ज्ञात हुआ ?' वे पुनः उनसे बोले—'श्रीकार्तिकेयजीसे।' पैप्पलादिने फिर पूछा— 'षडाननको किससे ज्ञात हुआ ?' वे बोले—'श्रीमहादेवजीसे।' पैप्पलादिने फिर उनसे पूछा—'महादेवजीसे उन्होंने किस प्रकार जाना ?' तब जाबालिने उत्तर दिया—'महादेवजीकी उपासनाके द्वारा।' फिर पैप्पलादिने जाबालिसे कहा—'भगवन् ! कृपापूर्वक हमें यह सब कुछ रहस्यसहित बतलाइये।' उनके द्वारा पूछे जानेपर जाबालिने सब तत्त्व बतलाया—'पशुपति ही अहङ्कार- से युक्त होकर जब सासारिक जीव बनते हैं, तब पशु कहलाते हैं। पाँच कृत्योंसे सम्पन्न सर्वज्ञ, सर्वेश्वर महेश्वर ही पशुपति हैं।' 'पशु कौन हैं ?' यह पूछनेपर उन्होंने बतलाया कि 'जीव ही पशु कहलाते हैं।' उनके पति होनेके कारण महेश्वर पशुपति हैं। पैप्पलादिने फिर पूछा—'जीव कैसे पशु कहलाते हैं और महेश्वर कैसे पशुपति ?' भगवान् जाबालिने उनसे कहा—'जिस प्रकार घास-चारा खानेवाले, अविवेकी—जड़, दूसरोंके द्वारा हाँके जानेवाले, खेती आदिके काममें नियुक्त, सब दुःखोंको सहनेवाले तथा अपने स्वामी- के द्वारा बाँधे जानेवाले गौ आदि पशु होते हैं, वैसे ही जीव भी पशु कहलाते हैं। तथा उनके स्वामीके समान होनेके कारण सर्वज्ञ ईश्वर ही पशुपति हैं।' 'उनका ज्ञान किस उपायसे होता है ?' तब भगवान् जाबालिने उत्तर दिया 'विभूति धारण करनेसे।' 'उसकी क्या विधि है ? कहाँ-कहाँ उसे धारण करना चाहिये ?' भगवान् जाबालि पुनः उनसे कहने लगे—'सद्योजातादि' पाँच ब्रह्मसंज्ञक मन्त्रोंसे भस्म ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवे भवेनातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ ॐ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ ॐ ईशान सर्वविद्यानाम् ईश्वर सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणो ऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मेऽस्तु सदाशिवोम् ॥
-
- विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७६५ संग्रह करे। 'अग्निरिति भस्म' * ॐ इस मन्त्रसे भस्मको अभिमन्त्रित करे, 'मा नस्तोके०'† इस मन्त्रसे उठाकर जलसे मले, 'त्र्यायुषम्०'‡ इत्यादि मन्त्रसे मस्तक, ललाट, वक्षःस्थल और कन्धोंपर त्रिपुण्ड्र करे। 'त्र्यायुषम्०' तथा 'त्र्यम्बकम्०'§ इन दोनों मन्त्रोंको तीन-तीन बार पढते हुए तीन रेखाएँ खींचे। यह 'शाम्भव' व्रत है, सम्पूर्ण वेदोंमें वेदज्ञोंद्वारा कहा गया है। मुमुक्षु आवागमनसे बचनेके लिये इसका सम्यक् आचरण करे।' तदनन्तर सनत्कुमारने इन रेखाओंका परिमाण पूछा। त्रिपुण्ड्र- धारणकी तीन रेखाएँ ललाटभरमें चक्षु और भ्रुवोंके मध्यतक होती हैं। इनमें जो प्रथमा रेखा है, वह गार्हपत्य-अग्निका प्रतीक, प्रणवका अकार, रजोगुणस्वरूप, भूर्लोक, देहात्मा, क्रियाशक्ति, ऋग्वेद, प्रातःकालीन सवन और ब्रह्मादेवताका स्वरूप है। इसकी जो द्वितीय रेखा है, वह दक्षिणाग्निका प्रतीक, उकार, सत्त्वगुण, अन्तरिक्ष, अन्तरात्मा, इच्छाशक्ति, यजुर्वेद, माध्यन्दिन सवन और विष्णुदेवताका स्वरूप है। जो इसकी तृतीय रेखा है, वह आहवनीय अग्निका प्रतीक, मकार, तमोगुण, द्युलोक, परमात्मा, ज्ञानशक्ति, सामवेद, तृतीय सवन और महादेवदेवताका स्वरूप है। यों समझकर जो भस्मका त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह विद्वान्, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्न्यासी—जो भी कोई हो, महापातक और उपपातकोंसे मुक्त हो जाता है। सब देवताओंके ध्यानका फल उसको मिलता है। उसे सब तीर्थोंके स्नानका फल प्राप्त हो जाता है। वह समस्त रुद्रमन्त्रोंके जापका फल प्राप्त कर लेता है। वह पुनः आवागमनमें नहीं पड़ता, पुनः आवागमनमें नहीं पड़ता। ॐ सत्यम्—यह उपनिषद् है। ॥ सामवेदीय जावाल्युपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! शिवका उपासक धन्य है सर्गादिकाले भगवान् विरिश्विरुपास्त्यैनं सर्गसामर्थ्यमाप्य । तुतोष चित्ते वाञ्छितार्थांश्च लब्ध्वा धन्यः सोपास्योपासको भवति धाता ॥ (दक्षिणामूर्ति० २०) सृष्टिके आदिकालमें भगवान् ब्रह्मा इन (शिव) की उपासना करनेसे सामर्थ्य प्राप्तकर और मनोऽभिलषित अर्थको पाकर सन्तुष्ट होते हैं। इन उपास्य (शिव) का उपासक धन्य है, क्योंकि वह भी धाता (सबका धारण-पोषण करने- वाला) हो जाता है।
- ॐ अग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म व्योमेति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म ॥ † मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । मा नो वीरान्रुद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्त सदमित्त्वा हवामहे ॥ (यजुर्वेद १६ । १६) ‡ त्र्यायुषं जमदग्ने कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यद्देवेषु त्र्यायुष तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम् ॥ (यजुर्वेद ३ । ६२) § त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ (यजुर्वेद ३ । ६०)
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ सामवेदीय वासुदेवोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! गोपीचन्दनका महत्त्व, उसके धारणकी विधि और फल
[बायाँ स्तम्भ]
देवर्षि नारदने सर्वेश्वर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करके उनसे पूछा—भगवन् ! द्रव्य, मन्त्र, स्थान आदि (देवता, रेखा, रंग एव परिमाण) के साथ मुझे ऊर्ध्वपुण्ड्रकी विधि बतलाइये । तब देवर्षि नारदसे भगवान् वासुदेव बोले—'जिसे ब्रह्मादि मेरे भक्त धारण करते हैं, वह वैकुण्ठधाममें उत्पन्न, मुझे प्रसन्न करनेवाला विष्णुचन्दन मैने वैकुण्ठधामसे लाकर द्वारकामें प्रतिष्ठित किया है । कुङ्कुमादिसहित विष्णुचन्दन ही चन्दन है । मेरे अङ्गोंमें वह चन्दन गोपियोंद्वारा उपलेपित और प्रक्षालित होनेसे गोपीचन्दन कहा जाता है । मेरे अङ्गका वह पवित्र उपलेपन्नु चक्रतीर्थमें स्थित है । चक्र (गोमतीचक्र) सहित तथा पीले रंगका वह मुक्ति देनेवाला है । [चक्रतीर्थमें जहाँ गोमती-चक्रशिला हो, उस शिलासे लगा पीला चन्दन ही गोपी-चन्दन है । शिलासे पृथक् तथा दूसरे रंगका नहीं ।] पहले गोपीचन्दनको नमस्कार करके उठा ले, फिर इस मन्त्रसे प्रार्थना करे— गोपीचन्दन पापघ्न विष्णुदेहसमुद्भव । चक्राङ्कित नमस्तुभ्यं धारणान्मुक्तिदो भव ॥ 'हे विष्णुभगवान्के देहसे समुत्पन्न पापनाशक गोपी-चन्दन ! हे चक्राङ्कित ! आपको नमस्कार है । धारण करनेसे मेरे लिये मुक्ति देनेवाले होइये ।'
[दायाँ स्तम्भ]
इस प्रकार प्रार्थना करके 'इमं मे गङ्गे०'¹ इस मन्त्रसे जल लेकर 'विष्णोर्नु कम्०'² इस मन्त्रसे (उस चन्दनको) रगड़े । फिर 'अतो देवा अवन्तु नो०'³, आदि ऋग्वेदके मन्त्रोंसे तथा १ 'इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्ण्या । असिक्न्या मरुद्वृधे वितस्तयाऽऽर्जीकीये शृणुह्या सुषोमया ॥' (ऋक्० १०।७५।५) इस मन्त्रके सिन्धुद्वीप ऋषि हैं, मन्त्रोक्त सब नदियाँ देवता हैं, जगती छन्द है, जलदानमें इसका विनियोग है ।' इन ऋषि आदिका न्यास करना चाहिये । २ 'विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्र वोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो अस्कभायद॒त्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः ॥' (ऋक्० १।१५४।१) इस मन्त्रका 'विष्णोर्नु कमिति मन्त्रस्य दीर्घतमा ऋषिः नारायणो देवता त्रिष्टुप् छन्द मर्दने विनियोगः।' इस प्रकार विनियोग है । इन ऋषि आदिका न्यास करना चाहिये । ३. 'अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे । पृथिव्याः सप्त धामभिः ॥' 'तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् । तद्विप्रासो विपन्धवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् ।' (ऋक्० १।२२।१६, २०-२१) इन तीनों मन्त्रोंको पढ़े। इनका विनियोग वाक्य यह है—'अतो देवा
- महांन्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७६७
विष्णुगायत्री^१ से तीन बार अभिमन्त्रित करे। तदनन्तर— शङ्खचक्रगदापाणे द्वारकानिलयाच्युत । गोविन्द पुण्डरीकाक्ष मा पाहि शरणागतम् ॥ 'हाथोंमें शङ्ख, चक्र तथा गदा धारण किये, द्वारका- धाममें रहनेवाले हे अच्युत ! हे कमललोचन गोविन्द ! मै आप- की शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा करो।' इस प्रकार मेरा ध्यान करके गृहस्थ अनामिका अगुलि- द्वारा ललाट आदि ( ललाट, उदर, हृदय, कण्ठ, दोनों भुजाएँ, दोनों कुक्षि, कान, पीठका (पेटके पीछेका) भाग, गर्दनके पीछे तथा मस्तक—इन ) बारह स्थानोंपर विष्णु- गायत्रीसे अथवा केशव आदि बारह नामों^२ से ( चन्दन ) धारण करे। ब्रह्मचारी अथवा वानप्रस्थ (अनामिकासे ही) ललाट, कण्ठ, हृदय तथा बाहुमूल (कन्धोंके पास बाहुके कूल्हों) पर विष्णुगायत्रीके द्वारा अथवा कृष्णादि पाँच नामों^३ से (चन्दन) धारण करे। सन्यासी तर्जनी अँगुलिसे सिर, ललाट तथा हृदयपर प्रणवके द्वारा (चन्दन) धारण करे। इति ऋचस्य कण्वो मेधातिथि ऋषि विष्णु देवता गायत्री छन्द अभिमन्त्रणे विनियोग ।' पूर्ववत् न्यास करे । १. (विष्णुगायत्री)—नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् । २ ललाटे केशव विद्यान्नारायणमथोदरे । माधव हृदये न्यस्य गोविन्द कण्ठकूपके ॥ विष्णुश्च दक्षिणे कुक्षौ तद्भुजे मधुसूदनम् । त्रिविक्रम कर्णदेशे वामे कुक्षौ तु वामनम् ॥ श्रीधर तु सदा न्यस्येद् वामबाहौ नर सदा । पद्मनाम पृष्ठदेशे ककुद्दामोदर स्मरेत् ॥ वासुदेव स्मरेन्मूर्ध्नि तिलक कारयेत् क्रमात् । ललाटमें केशव, उदरमें नारायण, हृदयमें माधव, कण्ठकूपमें गोविन्द, दाहिनी कुक्षिमें विष्णु, दाहिनी भुजामें मधुसूदन, कानोंमें त्रिविक्रम, बायीं कुक्षिमें वामन, वामबाहुमें श्रीधर, पीठमें पद्मनाभ, ककुत् (गर्दनके पीछे) में दामोदर, मस्तकपर वासुदेव—इस प्रकार भगवन्नामका न्यास करते हुए तिलक करे। ३ 'कृष्ण. सत्य. सात्वत. स्याच्छौरि शूरो जनार्दन. ।' अथवा— कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च। नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नम ॥ कृष्ण, सत्य, सात्वत, शौरि एव जनार्दन अथवा कृष्ण, वासुदेव, देवकीनन्दन, नन्दगोपकुमार और गोविन्द—इन नामोंसे तिलक करे। ब्रह्मादि (ब्रह्मा, विष्णु, शिव), तीनों मूर्तियाँ, तीनों (भू. भुव स्व.) व्याहृतियाँ, तीन (गण-छन्द, मात्रा- छन्द तथा अक्षर-छन्द) छन्द, तीनों (ऋक्, यजुः एव साम) वेद, तीनों (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) स्वर, तीनों (आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि) अग्नियों, तीनों (चन्द्र, सूर्य, अग्नि) ज्योतिष्मान्, तीनो (भूत, वर्तमान, भविष्य) काल, तीनों (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) अवस्थाएँ, तीनों (क्षर, अक्षर, परमात्मा) आत्मा, तीनों पुण्ड्र (अकार, उकार, मकार—प्रणवकी ये तीन मात्राएँ)—ये सब प्रणवात्मक तीनों ऊर्ध्वपुण्ड्रके स्वरूप हैं। अतः ये तीन रेखाएँ एकत्रित होकर ॐके रूपमें एक हो जाती हैं (अर्थात् तीनों पुण्ड्र मिलकर प्रणवरूप होते हैं)। अथवा परमहंस प्रणवद्वारा एक ही ऊर्ध्वपुण्ड्र ललाटपर धारण करे। वहाँ (ललाटमें) दीपके प्रकाशके समान अपने आत्माको देखता हुआ तथा 'मैं ब्रह्म ही हूँ' ऐसी भावना करता हुआ योगी मेरा सायुज्य (मोक्ष) प्राप्त करता है और दूसरे (परमहंसके अतिरिक्त) कुटीचक, त्रिदण्डी, बहूदक आदि सन्यासी हृदयपरके ऊर्ध्वपुण्ड्रके मध्यमें या हृदयकमलके मध्यमें अपने आत्मतत्त्वकी भावना (ध्यान) करें । उस हृदयकमलके मध्यमें नीले बादलके मध्यमें प्रकाशमान विद्युल्लताकी भाँति अत्यन्त सूक्ष्म ऊर्ध्वमुखी अग्निशिखा स्थित है। वह नीवारके शूक (सिके—कोंपलमूल) की भाँति पतली, पीतवर्ण तथा प्रकाशमय अणुके समान है। उसी अग्नि- शिखाके मध्यमें परमात्मा स्थित हैं। पहले हृदयके ऊपरके ऊर्ध्वपुण्ड्रमें (अग्निशिखाके मध्य परमात्माकी भावनाका) अभ्यास करे। उसके पश्चात् हृदय-कमलमें (उसी ध्यानका) अभ्यास करे। इस प्रकार क्रमशः अपने आत्मरूपकी मुझ परम हरिरूपसे भावना करे । जो एकाग्र मनसे मुझ अद्वैतरूप (जिसके अतिरिक्त और कोई सत्ता नहीं, उस) हरिका हृदय-कमलमें अपने आत्म- रूपसे ध्यान करता है, वह मुक्त है, इसमें सन्देह नहीं। अथवा जो भक्तिद्वारा मेरे अव्यय, ब्रह्म (व्यापक), आदि- मध्य एवं अन्तसे रहित, स्वयंप्रकाश, सच्चिदानन्दस्वरूपको जानता है (वह भी मुक्त है, इसमें सन्देह नहीं)। मैं एक ही विष्णु अनेक रूपवाले जङ्गमों तथा स्थावर भूतोंमें भी ओतप्रोत होकर उनके आत्मरूपसे
७६८ * वासुदेवोपनिषद् * निवास करता हूँ। जैसे तिलोंमें तेल, लकड़ीमें अग्नि, दूधमें घी तथा पुष्पमें गन्ध (व्याप्त है), वैसे ही भूतोंमें उनके आत्मरूपसे मैं अवस्थित हूँ। जगत्- में जो कुछ भी दिखायी पड़ता है अथवा सुना भी जाता है, उस सबको बाहर और भीतरसे भी व्याप्त करके मैं नारायण स्थित हूँ। मैं देहादिसे रहित, सूक्ष्म, चित्प्रकाश (ज्ञानस्वरूप), निर्मल, सबमें ओतप्रोत, अद्वैत परम ब्रह्मस्वरूप हूँ। ब्रह्मरन्ध्रमें, दोनों भौंहोंके मध्यमें तथा हृदयमें चेतनाको प्रकाशित करनेवाले श्रीहरिका चिन्तन करे। इन स्थानोंको गोपीचन्दनसे उपलिप्त करके (वहाँ गोपीचन्दनका तिलक करके) तथा ध्यान करके साधक परमतत्त्वको प्राप्त करता है। ऊर्ध्वदण्डी, ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी), ऊर्ध्वपुण्ड्र (धारी) तथा ऊर्ध्वयोग (उत्तम गति देनेवाले योग) को जानने- वाला-इस ऊर्ध्व-चतुष्टयसे सम्पन्न सन्यासी ऊर्ध्वपद (दिव्यधाम) को प्राप्त करता है। इस प्रकार यह निश्चित ज्ञान है। यह मेरी भक्तिसे स्वयं सिद्ध हो जाता है। नित्य गोपीचन्दन धारण करनेसे एकाग्र भक्ति प्राप्त होती है। वैदिक ज्ञानसम्पन्न सर्वश्रेष्ठ सभी ब्राह्मणोंके लिये पानीके साथ घिसकर गोपीचन्दनके ऊर्ध्वपुण्ड्र (करने) का विधान है। जो मुमुक्षु (मोक्षकी इच्छा रखनेवाला) है, वह अपरोक्ष आत्मदर्शनकी सिद्धिके लिये गोपीचन्दनके अभावमे (गोपीचन्दन न हो, तब) तुलसीके जड़की मिट्टी (से) नित्य (तिलक) धारण करे। जिसका शरीर गोपीचन्दनसे लिप्त रहता है, उसके शरीरकी हड्डियाँ निश्चय ही (दधीचिकी हड्डियोंके समान) दिनोंदिन चक्र (वज्रके समान सुदृढ) होती जाती हैं। (दिनमें तो गोपीचन्दनका ऊर्ध्वपुण्ड्र करे) और रात्रि- को अग्निहोत्रकी भस्मसे 'अग्नेर्भस्मासि०' आदिसे (भस्म लेकर) 'इदं विष्णुं०' आदि मन्त्रसे मलकर तथा 'त्रीणि पदाँ०' आदि मन्त्रसे, विष्णुगायत्रीसे तथा (यदि साधु हो तो) प्रणवसे उद्धूलन करे (सम्पूर्ण शरीरको मले)। जो इस विधिसे गोपीचन्दन धारण करता है, अथवा जो इस (उपनिषद्) का अध्ययन करता है, वह समस्त महापातकोंसे पवित्र हो जाता है। उसे पाप-बुद्धि उत्पन्न नहीं होती। वह सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर चुकता है। (सब तीर्थोंके स्नानका पुण्य प्राप्त कर लेता है।) सम्पूर्ण यज्ञोंका यजन करनेवाला (उनके यजनके फलको प्राप्त) होता है। सम्पूर्ण देवताओंसे पूजनीय हो जाता है। उसकी मुझ नारायणमें अचला भक्ति वृद्धिको प्राप्त होती है। वह सम्यक् ज्ञान प्राप्त करके भगवान् विष्णुका सायुज्य (मोक्ष) प्राप्त करता है। फिर (संसारमें) लौटकर नहीं आता, नहीं आता। आकाशमें व्याप्त हुए सूर्यकी भाँति भगवान् विष्णुके उस परमपदको सूक्ष्मदर्शी (ज्ञानी) सदा अपने हृदयाकाशमें देखते (साक्षात् करते) हैं। भगवान् विष्णुका वह जो परम पद है, उसे लोक व्यवहारमें अनासक्त एव साधनके लिये सदा जाग्रत् रहनेवाले विप्रगण ध्यानमें प्रकाशित करते हैं। (ध्यानमें उसका साक्षात् दर्शन करते हैं।) ॥ सामवेदीय वासुदेवोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! १. 'अग्नेर्भस्मासन्ने पुरीषमसि चित स्थ परिचित्त ऊर्ध्वचित अध्वश्वम्।' (वाजसनेयिसंहिता १२।४६) २. 'इद विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे ॥' (ऋक्० १।२२।१७) ३. 'त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन्।' (ऋक्० १।२२।१८)
उपनिषदोंमें श्रीसर्वेश्वर (लेखक—विद्याभूषण, साख्य-साहित्य-वेदान्ततीर्थ श्रीव्रजवल्लभशरणजी वेदान्ताचार्य) वेदेषु यत्किमपि गुप्तमनन्ततत्त्वं ब्रह्मात्ममत्पुरुषशब्दमुखैर्विनीतम् । नत्वेह निर्गुणमशेषगुणाश्रयं तं सर्वेश्वरं श्रुतिगिरा सुविभावयामि ॥ अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक विश्वम्भर परमपिता परमेश्वर-तत्त्वकी वेद एव उपनिषदोंमें जो मीमासा की गयी है वह ब्रह्म, आत्मा, विष्णु, रुद्र, शिव, केवल, सर्वज्ञ इन्द्र, उपेन्द्र, नारायण, नृसिंह, कृष्ण, गोपाल, गोविन्द, परमात्मा, परमेश्वर, पुरुषोत्तम, वासुदेव, राम, यम, काल, ईश्वर प्राण, आकाश, क, ख, ॐ, सत्, असत्, चित्, आनन्द और अक्षर आदि अनेकों नामोंसे की गयी है। उपर्युक्त सभी नाम सार्थक हे। इन सभीमे श्रीसर्वेश्वरके ही स्वरूप गुणोंकी झाँकी होती है, क्योकि शब्द और अर्थका तादात्म्य-सम्बन्ध माना जाता है। अतः शब्दके उच्चारण होते ही उसका अर्थ भाषित हो जाता है, परतु जो व्यक्ति शब्दकी शक्तिसे अनभिज्ञ हों, उनको बारयार उच्चारण करनेपर भी इन शब्दोंका अर्थ ज्ञात नहीं हो पाता। जबतक शब्दशक्ति- को द्योतन करनेवाले साधनोंकी प्राप्ति नहीं होती, तबतक अर्थ चाहे म्वय मूर्तिमान् बनकर भी किसीके सामने उपस्थित हो जाय, अबोध व्यक्तिको यह पता नहीं चल सकता कि यह कौन वस्तु है, इसका क्या महत्त्व है एवं यह किस उपयोगमे आती है। जैसे नवजात शिशुको उसके माता पिता, भाई आदि तत्तद्व्यक्तियोंको दिखलाकर जबतक बारबार उनके नाम नहीं सुनाये जाते, तबतक वह शिशु अपने जनक-जननी आदि परमहितैषी आत्मीयोंको भी नहीं जान पाता। परतु उनका ज्ञान हो जानेपर वह अपने उन माता-पिता-भ्राता आदिको उन उन नामोंसे पुकारने लगता है और उनमे आत्मरक्षाका अभिनिवेश बना लेता है। अतएव जब कभी कोई भी आपत्ति आती दीखती है, तो वह तत्क्षण तल्लीन होकर रोता है और अपने उन पोषक रक्षक माता पिता आदिको पुकारता है और वे अपने कर्तव्यानुसार यथाशक्ति उसकी रक्षा करते हैं। अवस्था बढ जानेपर भी जबतक उस व्यक्ति- को किसी विशिष्ट शक्तिशाली सरक्षकका ज्ञान नहीं होता, तबतक वह उन्हीं भौतिकविग्रही माता पिता आदिपर निर्भर रहता है। यही कारण है कि कुछ लोग वृद्ध हो जानेपर भी दु खके अवसरपर अरी मैया ! अरे बाप ! आदि शब्दोंके वाच्यार्थको ही अपना सरक्षक मानते हैं। अतः ईश्वर आदि शब्दोसे पुकार न करके अरी मा ! आदि-आदि सम्बोधनोंके साथ साथ ही रुदन करते देखे जाते हैं। यह लौकिक ज्ञानका उदाहरण शास्त्रीय ज्ञानके साथ भी घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है। जैसे माता-पिता शब्दोंके प्रतिपाद्य व्यक्ति अपने पालनीयोंकी जहाँतक जितनी रक्षा करते हैं, वैसे ही उस सर्वाधार सर्वनियन्ता सर्वेश्वर प्रभुके ब्रह्म आत्मा आदि अन्यान्य नाम एव उन नामोंके द्वारा अभिव्यक्त होनेवाला तत्तद्गुणशक्ति विशिष्ट परमात्म तत्त्व भी वहींतक उतनी ही रक्षा करता है, जितनी मात्रामे कि उन-उन नामोंमें परमात्म- शक्तिमा आविर्भाव होता है, क्योंकि 'सर्वे शब्दा ब्रह्म- वाचका' इस उक्तिके अनुसार माता-पिता, भैया आदि सभी शब्द ब्रह्म (परमेश्वर) के ही वाचक होनेपर भी उनसे परिसीमित त्राणरूप ही फल मिलता है। अतः असीम रक्षाके लिये माता पिता आदि शब्दोंके अतिरिक्त किसी दूसरे ही शब्दका अवलम्ब लिया जाता है, किंतु परमात्माके नाम अनन्त है। क्रमशः एक एक नामकी उपासना करते करते सहस्रों मानवजन्म व्यतीत हो जायें तब भी, निर्हेतुक असीम कृपाकारक सर्वोच परमात्मतत्त्व-प्रतिपादक नामका प्राप्त होना कठिन है। अतः उपनिषदोंमे उस अनन्त ब्रह्माण्डनायक सर्वाधार सर्वेश्वर प्रभुके कुछ ऐसे विशिष्ट नामोंका उल्लेख है कि जिनका क्रम पूर्ण होकर एक ही जन्ममें मनुष्यको सर्वोच्च नामकी प्राप्ति हो सकती है, जिसके प्रयोगसे असीम रक्षा सुलभ हो जाती है और फिर अन्य नामादिका अन्वेषण भी अवशिष्ट नहीं रहता। वेद, उपनिषद् आदि समस्त निगमागममे ऐसा एक महान् शब्द 'श्रीसर्वेश्वर' है, जिसका उच्चारण करते ही साधकको सर्वोच्च परमात्मतत्त्वकी झाँकी हो जाती है। किंतु यह शब्द, इस शब्दकी महिमा, इस नामकी प्रतिमा और उसकी उपासना—ये सब प्राचीन कालसे ही बड़ी गोपनीय वस्तु मानी गयी है। यही कारण है कि जैसे लोकमें विशेष गोप्यवस्तु, जो अत्यन्त अभीष्ट हो उसका अत्यन्त गोपन (छिपाव) किया जाता है, वैसे ही वेद और उपनिषदोंमें 'श्रीसर्वेश्वर' शब्दका अत्यन्त गोपन किया गया है। अर्थात् उ० अं० ९७—
७७० - महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति - ब्रह्म, आत्मा आदि अन्यान्य परमात्मवाचक शब्दोंकी अपेक्षा 'सर्वेश्वर' शब्दका प्रयोग अत्यन्त स्वल्प संख्यामे ही हुआ है। दूसरा हेतु यह भी माना जा सकता है कि ब्रह्म, आत्मा आदि शब्द अनेकार्थ-द्योतक है और सर्वेश्वर शब्द केवल एक ही सर्वोच्च पारमार्थिक पदार्थका प्रतिपादक है। अतएव उनका प्रयोग विभिन्न अर्थोंमे होनेके कारण अधिक स्थलोंमें एव अधिक रूपेण हुआ है और 'सर्वेश्वर' शब्दका प्रयोग उसी स्थलमें हुआ है, जहाँ कि एक सर्वोच्च पारमार्थिक परमात्मतत्त्वके प्रतिपादनकी आवश्यकता हुई। इसलिये अन्यान्य उपनिषदोंमें प्रयुक्त 'सर्वेश्वर' शब्दकी चर्चा न करके केवल माण्डूक्य और बृहदारण्यक उपनिषदमें पठित सर्वेश्वर शब्दका ही पाठकोंको दिग्दर्शनमात्र करा दिया जाता है। 'एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनि सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्।' (माण्डूक्य० १।५) 'यही सर्वेश्वर प्रभु हैं, जो चराचरके शासक और भूत भविष्यत्-वर्तमान कालत्रयमे बाहर-भीतरकी समस्त वस्तु और भावोंके ज्ञाता हैं। अतएव ये ही अन्तर्यामी है और ये ही प्रभु समस्त चराचरके उपादान और समस्त भूत प्राणियोंके निमित्तकारण तथा संहारक भी ये ही हैं।' यद्यपि कुछ महानुभाव इस श्रुतिकी व्याख्या करते हुए यहाँके 'सर्वेश्वर' शब्दको वैसे ही परब्रह्मका प्रतिपादक नहीं मानते हैं, जैसा कि उन्होंने परब्रह्म मान रखा है, तथापि उपक्रमोपसंहारादिपर विचार करनेसे उनकी वह व्याख्या असंगत-सी हो जाती है। क्योंकि इस उपनिषद्के आरम्भमें ही ॐकारपदवाच्य परब्रह्मकी प्रस्तावना की गयी है, फिर उस परब्रह्मको सुगमरूपसे जाननेके लिये उसी परब्रह्मके चार पादोंकी गणना की गयी है। यद्यपि वह परमात्मतत्त्व एक ही है। किसी प्रकारसे विभक्त नहीं होता तथापि स्थानादिके विभेदसे विश्व, तैजस, प्राज्ञ, तुरीय आदि उसकी अनेकों संज्ञाएँ हो जाती हैं। उपर्युक्त सभी संज्ञाएँ सापेक्ष हैं, इनमे अन्तर्यामिता एव सर्वेश्वरता सर्वत्र निरपेक्षरूपेण विद्यमान रहती है। जाग्रत् अवस्थामें आत्मा, इन्द्रिय, शरीर-ये सब सञ्चरित रहते हैं। अतः इस अवस्थामे वह अन्तर्यामी 'विश्व' कहलाता है। जब सब इन्द्रियोंकी शक्ति मनमें लीन हो जाती है, तब उस स्वावस्थामे वह अन्तर्यामी प्रभु 'तैजस' कहलाता है, क्योंकि वहाँ मनका ही अन्तर्नियमन करता है। जब वह मन भी आत्मामें लीन हो जाता है, तब उस सुषुप्ति-अवस्थामें केवल जीवात्माका ही अन्तर्नियमन करनेसे वह अन्तर्यामी प्रभु 'प्राज्ञ' कहलाता है। जब वह प्रभु जाग्रत् आदि समस्त भेदोको अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे अपनेमें लीन करके योगनिद्रास्थ होता है—तब वही 'तुरीय' कहलाता है। यद्यपि जाग्रदादि अवस्थाएँ बदलती रहती हैं, किंतु परब्रह्मका सच्चिदानन्दात्मक वास्तविक स्वरूप चारों पादों (अवस्थाओं) में अनुस्यूत रहता है। अतः सभी पादों (अवस्थाओं) के अन्तर्यामीमें सर्वेश्वरत्व भी निर्बाध है ही। यदि इस उपनिषद्में स्वप्रतिपाद्य चतुर्थ पादमात्र ही परब्रह्मात्त्वेन अभीष्ट होता तो आरम्भमे 'सर्वं हि एतद्ब्रह्म' ऐसी प्रतिज्ञा न करके 'चतुर्थपाद एव ब्रह्म' ऐसी प्रतिज्ञा की जाती। अतः तृतीय पादके पश्चात् और चतुर्थ पादके पूर्वपठित 'सर्वेश्वर' शब्द देहली-दीपकन्यायसे दोनों पादोंके साथ ही अन्वित हो सकता है-यह नहीं, अपितु चारो पादोंके साथ ही अन्वित समझना चाहिये । उपनिषदोंमे जहाँ कहीं किमी श्रुतिके शब्दार्थमें सन्देह प्रतीत होता है, वह अन्यत्र दूसरी श्रुतिमे स्पष्ट हो जाता है, अतएव यही 'सर्वेश्वर' शब्द बृहदारण्यक उपनिषद्में स्पष्टतया उसी परात्पर ब्रह्मका प्रतिपादन करता हुआ दृष्टिगत होता है, जैसा कि समस्त व्याख्याकारोंने उच्च- से-उच्च परात्मतत्त्व मान रक्खा है। क्योंकि इसके अतिरिक्त फिर और कोई उपनिषत्-प्रतिपाद्य सर्वोच्च तत्त्व है ही नही। 'स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशान सर्वस्याधिपति स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयान् एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसम्मेदाय तमेत वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेनैनमेव विदित्वा मुनिर्भवति।' (बृहदारण्यक० ४।४।२२) 'वह यही परमपिता परमेश्वर महान् अज है, जिसक शास्त्रोंमें अनेकों नामोसे उल्लेख मिलता है। यही प्रभु शरीर इन्द्रिय, मन, प्राणादिमें विज्ञान (प्रकाश) मयरूपसे विराजमान् है, अन्तर्यामीरूपसे हृदयन्तर्वर्ति-आकाशमें सदा स्थित रहता है। अतएव समस्त प्राणी इसीके वशमें हैं, इसीर्क प्रेरणासे प्रवृत्त होते हैं, क्योंकि यही प्रभु सबके शासक है एवं चराचरके अधिपति हैं। यद्यपि प्रत्येक जीव और समस्त सदसद् वस्तुओके भीतर यह प्रभु विराजमान है तथापि उनके गुण दोषोंसे एव भले-बुरे कर्मोंसे लिप्त नहीं होता पक्षपातरहित, न्यायकर्ता और सर्वत्र समान दयालु होनेवे कारण यही सर्वेश्वर है, यही सर्वेश्वर प्रभु समस्त भूतप्राणियोंक अधिपति, पालक और सेतुरूप सर्वोधार है। इसीके आभ्रित
- उपनिषदोंमें श्रीसर्वेश्वर * ७७१ रहनेके कारण अत्यन्त सूक्ष्म जीवसमूह और परमाणु आदि वस्तुओंका साङ्कर्य नहीं होता। विद्वान् भक्त वेदादि सच्छास्त्रों- द्वारा एव यज्ञ-दान-तप आदि साधनोंसे इसी सर्वेश्वर प्रभुको जानने एव प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं, क्योंकि इसी सर्वेश्वर प्रभुको जानने एव प्राप्त करनेमें जीवनकी परम सफलता है।' प्राचीन समयमें सभी मुनिजन 'श्रीसर्वेश्वर' नाम और श्रीसर्वेश्वरकी ही उपासना करते थे। श्रीसर्वेश्वर-प्राप्तिके लिये लौकिक प्रपञ्चको त्यागकर विरक्तिका अवलम्ब लेते थे । श्रीसनकादि-जैसे मुनिजनोंने पुत्रादि लौकिक एषणाओ- को छोड़कर श्रीसर्वेश्वरको ही अपना परमाराध्य एव परम प्राप्य माना है, क्योंकि श्रुतियोंमें 'नेति-नेति' कहकर जिस तत्त्वको सर्वोच्च बतलानेका संकेत किया है, वह यही सर्वेश्वर- तत्त्व है। अतएव इसी तत्त्वके उपासक प्राचीन ऋषि मुनि सर्वेश्वरवादी कहलाते थे। श्रीहंसभगवान्ने श्रीसनकादिको इसी सर्वेश्वर-तत्त्वका उपदेश किया था। फिर सनकादिने श्रीनारदजीको इसी तत्त्वकी उपासनाका उपदेश दिया—जो छान्दोग्य-उपनिषद्में भूमाविद्याके नामसे वर्णित है। बृहदारण्यक उपनिषद्में वही भूमाविद्या सर्वेश्वरविद्याके रूपसे उपदिष्ट हुई है। देवर्षि श्रीनारदजीने श्रीनिम्बार्क आदि मुनिवरोंको इसी सर्वेश्वर-उपासना (विद्या) का उपदेश किया । इस प्रकार परम्पराके रूपमें यह विद्या चली आ रही है। श्रीनिम्बार्काचार्य के परवर्ती सभी आचार्योंने इसे अपनी परम गोप्य विद्या मानकर केवल उत्तमोत्तम अधिकारियों को ही इसका उपदेश किया, जिससे उत्तरोत्तर यह विद्या विरलप्रचार बनती गयी। अन्यान्य नामोंसे इस विद्याका विशेष विस्तार हुआ। श्रीभगवान्के सभी नाम सर्वविधि कल्याणप्रद एवं समान ही हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं। तथापि नामोंमें प्रकृति- प्रत्ययात्मक विशेषता कुछ-न-कुछ अवश्य माननी पड़ती है। क्योंकि जिन-जिन नामोंमें जैसा-जैसा प्रकृति प्रत्ययका योग है, उन-उन नामोंसे वैसे ही शक्तिविशेषका विकास होता है। इसलिये उन-उन नामोंसे उपासना करनेवाले साधकोंको उन्हीं अर्थोंके अनुसार फल प्राप्ति होती है। अतएव वेद, ब्राह्मण, उपनिषद्, आरण्यक, इतिहास, पुराण आदि शास्त्रोंमें ध्यान, यजन, पूजन, कीर्तन आदि विभिन्न-विभिन्न युगोंके विशेष साधनोंकी भाँति परमात्माके नामोंकी उपासनाका भी क्रम देखा जाता है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि किस-किस अवसरपर किन-किन ऋषि-मुनियोंने किन-किन नामोंसे परमात्माकी उपासना की। जिस प्रकार 'ब्रह्म' 'विष्णु' आदि व्यापकत्व-प्रतिपादक शब्द प्रकृति-प्रत्ययके तात्पर्यानुसार उस परमात्म-तत्त्वकी व्यापकताको सूचित करते हैं। 'आत्म' शब्द निरन्तर स्थिति और 'सत्' शब्द अस्मिता, 'पुरुष' शब्द पुरीरूप समस्त क्षेत्रोंमें स्थिति और 'असत्' शब्द सूक्ष्म-कारणत्व प्रदर्शित करता है। 'अक्षर' शब्द अविनाशिता एव 'राम' शब्द योगियोंके रमण स्थलका द्योतन करता है। तथा 'कृष्ण' शब्द अपनी ओर आकर्षित कर संसारसे निवृत्तिकारिता प्रकटित करता है। 'रुद्र' शब्द भयप्रदर्शकत्व, 'शिव' शब्द मङ्गलमयता, 'शङ्कर' शब्द कल्याण कारकता, 'इन्द्र' शब्द आह्लादकत्व, 'सूर्य' शब्द प्रकाशकत्व, 'काल' शब्द गणनात्मकता, 'यम' शब्द नियामकता, 'प्रजापति' शब्द प्रजापालकता, 'गणपति' शब्द गणोंका आधिपत्य द्योतित करता है। 'महादेव' शब्द एक बड़े प्रकाशात्मक स्वरूपका निर्देश करता है और 'ईश्वर' शब्द शासकता प्रकटित करता है। 'विश्वेश्वर' शब्द प्राकृत विश्वकी शासकता प्रदर्शित करता है। 'पुरुषोत्तम' और 'परमात्म' शब्द भी सदा स्थित रहनेवालोंमें सर्वोच्च आत्मत्व- का प्रदर्शन कराते है। उसी प्रकार 'सर्वेश्वर' शब्द समस्त प्राकृत-अप्राकृत वस्तुजातकी शासकता एव नित्य निरतिशय ऐश्वर्य आदि सर्वोपरि शक्तिका प्रकाश करता है। यद्यपि 'ईश्वर' शब्दके साथ अखिल और निखिल शब्दोंके योगसे भी उपर्युक्त अर्थ सम्भावित हो सकता है, किंतु उपनिषदोंमें ऐसे विशेषणविशिष्ट शब्द सर्वोच्च-तत्त्व प्रतिपादनके अवसरपर कहीं नहीं अपनाये गये। इसलिये यही निश्चित होता है कि उपनिषदोंमें 'सर्वेश्वर' शब्द सर्वोच्च परमात्मतत्त्वका प्रतिपादक है। क्योंकि 'ब्रह्म' 'विष्णु' 'रुद्र' आदि जितने भी परमात्मतत्त्वके वाचक शब्द हैं, उन सभीकी शक्ति एक 'सर्वेश्वर' शब्दमें समाविष्ट है। इसलिये प्रभुको प्रसन्न कर अपनी समस्त आपत्तियोंको मिटाने एव नित्य निरतिशय आनन्दकी प्राप्तिके लिये, किस अवसरपर प्रभुके किस नामसे किस स्वरूपकी उपासना (प्रार्थना) करनी चाहिये—यह समझकर इस महान् धार्मिक सङ्कटके समय, उपनिषदोंके सर्वस्वरूप रहस्यात्मक इसी 'सर्वेश्वर' मन्त्रका उपयोग करना विशेष हितकर है। श्रीसर्वेश्वर प्रभुमें अपनी रक्षाके लिये ऐसा घनिष्ट अभिनिवेश कर लेना चाहिये कि—
An exact transcription of the page is provided below:
७७२ -:- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति : मा चेन्न पास्यसि ततो भगवन्ममैव तो आप यह न समझे कि उससे केवल मेरी ही हानि हानिर्भवेदिति तु नो मननीयमीश। होगी, किंतु 'अहा देखो, सर्वेश्वरका सेवक होकर भी दुःख सर्वेश्वरस्य करुणादिगुणाम्बुतान्धे- पा रहा है' यह कहकर जनता आपको भी उलाहना दिये र्दासो हि सीदति जना इति वै क्षिपेयु ॥ बिना नहीं रहेगी। हे भगवन् ! हे ईश ! आप यदि मेरी रक्षा न करेंगे ऐसे विश्वासी भक्तोंपर ही सर्वेश्वर प्रभु शीघ्रातिशीघ्र द्रवित होते हैं। उपनिषदोंमें आत्मानुभव ( लेखक—श्रीबाबूलालजी गुप्त 'श्याम' ) सृष्टिके पूर्व जो जगत्की अनिर्वचनीय अव्याकृत अवस्था है, उसीको 'अव्यक्त' कहते है। यह 'अव्यक्त' ही परमेश्वर- की 'माया' नामक शक्ति है। सृष्टिके प्रारम्भमे परमात्माद्वारा जो सृष्टिविषयक ईक्षण³ ( आलोचन ) होता है, उसका नाम समष्टि 'बुद्धि' ( महत्तत्त्व ) है। अथवा यों कहिये कि सृष्टि रचनाविषयक परमेश्वरका ज्ञान ही 'ईक्षण' है। ईक्षणके अनन्तर 'अह बहु स्याम्' ( मै बहुत रूपोंमे प्रकट हो जाऊँ)—इस प्रकारका जो परमेश्वरीय सङ्कल्प है, वही 'अहङ्कार' कहलाता है। उस अहङ्कारसे ही आकाशादि क्रमसे पञ्चमहाभूतोकी उत्पत्ति हुई है५। ये पञ्चमहाभूत तम प्रधान प्रकृतिसे उत्पन्न हुए है। इन सबके जो पृथक् पृथक् सत्त्व अश ह, उनसे श्रोत्र आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियोंका प्रादुर्भाव हुआ है। इन पाँचों सत्त्वांशोंका संघात ही अन्तःकरण है। इसी प्रकार आकाश आदि पाँचों भूतोंके जो पृथक् पृथक् राजस अश हैं, उनसे क्रमशः वाक्, पाणि, पाद, गुदा तथा उपस्थ-ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं। उक्त पाँचों राजस अगोंके मेलसे प्राणका प्रादुर्भाव हुआ, जो वृत्तिभेदसे मुख्यतः पाँच प्रकारका माना गया है। पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, मन तथा बुद्धि- इन सत्रह तत्त्वोका समुदाय ही सूक्ष्म शरीर है। पिण्ड और ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिके लिये पाँचो भूतोका पञ्चीकरण हुआ। पञ्चीकृत भूतोंसे बना हुआ यह स्थूल शरीर 'अन्नमय कोष' कहलाता है। सूक्ष्म शरीरके रजोमय अश—पाँच प्राण एव पाँच कर्मेन्द्रियोका समुदाय मिलकर 'प्राणमय कोष' है। मन तथा सात्त्विक अशभूत ज्ञानेन्द्रियाँ 'मनोमय कोष'के अन्तर्गत है। निश्चयात्मिका बुद्धि एव ज्ञानेन्द्रियाँ 'विज्ञानमय कोष' हैं। कारण शरीर ही 'आनन्दमय कोष' है। यही सक्षेपसे सृष्टिकी प्रक्रिया है ( पञ्चदशी तत्त्व विवेक १७। ३६ )। पञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न विषयोंका ही दर्शन स्पर्श आदि होता है। प्रत्येक इन्द्रिय अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले केवल एक ही विषयको ग्रहण करती है, इसलिये सम्पूर्ण इन्द्रियग्राह्य विषय पाञ्चभौतिक होनेके कारण विनश्वर है । उनकी उत्पत्ति होती है, अतः विनाश भी अवश्यम्भावी है । आत्मा नित्य- सिद्ध चेतन है, इन विनाशशील जड वस्तुओसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। वह इनसे सर्वथा पृथक् एव विलक्षण है। इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेकसे आत्माको इन भूतोंसे पृथक् और अपना ही स्वरूप जानकर उसमे स्थिति प्राप्त की जा सकती है। आत्मस्थिति प्राप्त होनेपर ही जीव कृतकृत्य होता है। श्रीगुरुदेवकी कृपासे इस शरीरके रहते हुए ही आत्माका अनुभव होता है; और प्रयत्न करनेपर सबको हो सकता १ 'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' ( उन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमात्माकी अपनी ही शक्तिका, जो अपने गुणोंसे आच्छादित ( अव्यक्त ) है, साक्षात्कार किया)— श्वेताश्वतर० १।३। यह श्रुतिप्रतिपादित अव्यक्त है। २ 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' (श्वेता० ४। ९) यह श्रुति परमेश्वरकी शक्तिका नाम 'माया' बतलाती है। ३ 'तदैक्षत' इति ईक्षणरूपा बुद्धिः । ४ 'बहु स्या प्रजायेय' ( छान्दो० ४।९ ) इति बहुभवन सङ्कल्परूप अहङ्कार । ५ तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाश सम्भूत , आकाशाद् वायु , वायोरग्नि , अग्नेराप., अद्द्भ्य पृथिवी' ( तैत्ति० ३।१ ) इति पञ्चभूतानि श्रौतानि ।
ॐ उपनिषदोंमें आत्मानुभव ॐ ७७३
है। अतः प्रस्तुत लेखमें इसी विषयका दिग्दर्शन कराया जाता है। गीतोपनिषद्मे आत्माको 'ज्योति' कहा गया है— 'ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः' (गीता १३। १७)। 'ज्योति' शब्द- का अर्थ है—अवभासक, प्रकाशक अथवा चैतन्य। आत्मा सर्वत्र विद्यमान होनेपर भी मन तथा बुद्धिके द्वारा गम्य नहीं है। उसे 'अस्ति' या 'नास्ति' भावसे बुद्धिका विषय नहीं बनाया जा सकता। वह अप्रमेय है, बुद्धि उसे माप नहीं सकती। लौकिक बुद्धिसे आत्माका रहना और न रहना— दोनों समान जान पड़ते हैं, क्योंकि बुद्धिकी पहुँच वहाँतक है ही नहीं। आत्मा सबका आश्रय है, किंतु वह आश्रय- आश्रित-सम्बन्धसे लिप्त नहीं है। उसका आश्रय-भाव भी कल्पित ही है। आत्मा एक सर्वविलक्षण वस्तु है। भेद- अभेद, विभक्त अविभक्त किसी भी लक्षणद्वारा उसे यथार्थतः व्यक्त नहीं किया जा सकता। श्रीगुरुके मुखसे आत्मतत्त्वका इस प्रकार प्रतिपादन सुनकर शिष्य चकित हो उठता है और पूछता है—'भगवन् ! यदि सर्वत्र विद्यमान होनेपर भी आत्माकी उपलब्धि सम्भव नहीं है, तब तो वह परमाणु आदिकी भाँति जडरूप ही हो जायगा ?' इस शङ्काका समाधान करते हुए श्रीगुरुदेव कहते हैं— ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ (गीता १३। १७) बुद्धि अथवा इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध न होनेसे ही आत्माको 'जड़' नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह उन बुद्धि आदिकी पहुँचसे परे है। इन्द्रियोंद्वारा जिन रूप आदि विषयोंका ग्रहण होता है, उन सबसे रहित होनेके कारण ही आत्माकी उनके द्वारा उपलब्धि नहीं होती। अतः उसका इन्द्रियाग्राह्यत्व उचित ही है। 'तत्' वह ज्ञेय ब्रह्म 'ज्योतिषामपि ज्योतिः' प्रकाशकोंको भी प्रकाश देनेवाला है। सूर्य आदि बाह्य ज्योति हैं और बुद्धि आदि आन्तरिक ज्योति हैं—इन सबका वह प्रकाशक है। चैतन्य ज्योति ही जड़-ज्योतिकी प्रकाशिका है—चैतन्यसे ही जड़का प्रकाश होता है। यदि ऐसा न हो तो जड़ निःसाक्षिक होकर अप्रकाशित ही रह जाय। 'येन सूर्य्यस्तपति तेजमेद्ध' 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' —इत्यादि श्रुतियोंमें तथा—
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ (गीता १५। १२) —इत्यादि भगवद्वाक्योंसे भी यही बात सिद्ध होती है। यदि कहें, आत्मा स्वरूपतः चैतन्य होते हुए भी जड़में संसर्ग- युक्त तो है ही, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि वह 'तमसः परम्' है—अविद्याकल्पित जड़वर्गसे परे है। जड़ अविद्याका कार्य होनेसे असत् है और आत्मा नित्य सत् है; अतः उसमें उसका संसर्ग नहीं है। तात्त्विक दृष्टिसे सत् और असत्का सम्बन्ध हो ही नहीं सकता। सम्बन्धकी प्रतीति भी अज्ञानके ही कारण होती है। 'उच्यते'—यह बात श्रुतियों और स्मृतियोंद्वारा वर्णित है। यथा— 'अक्षरात् परतः परः' (मुण्डक० २। १। २) निःसङ्गस्य ह्यसङ्गेन कूटस्थस्य विकारिणा । आत्मनोऽनात्मना योगो वास्तवो नोपपद्यते ॥३ 'आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्' (श्वेताश्वतरोपनिषद् ३। ८) अर्थात् आत्मा आदित्यवर्ण और तमसे परे है। यहाँ 'आदित्यवर्ण'का अर्थ है---आदित्य (सूर्य) जिस प्रकार अपने प्रकाशके लिये अन्य किसीकी भी अपेक्षा नहीं करता, उसी प्रकार ब्रह्म भी अपने प्रकाशके लिये किसीकी अपेक्षा नहीं रखता अर्थात् वह सर्वप्रकाशक तथा स्वयंप्रकाश है। वह आत्मा 'स्वयंज्योतिः' अर्थात् जड़वर्गके साथ अस्पृष्ट होनेसे 'ज्ञानम्'—ज्ञानस्वरूप है । तात्पर्य यह कि प्रमाणजन्य जो चित्तवृत्ति है अर्थात् वेदान्त श्रवणादि रूप शब्द प्रमाणजन्य जो चित्तवृत्ति विशेष उत्पन्न होती है, उस अविद्या साच्छादित चित्तवृत्तिमे जो संवित् (चेतना या ज्ञान) अभिव्यक्त होती है वह आत्मा (ब्रह्म) की ही एक झलक है, वह आत्मा संवित्- स्वरूप है और इसीलिये वह चेतन ही 'ज्ञेयम्'—ज्ञेय है, क्योंकि वही अविद्यामें आवृत रहनेके कारण अज्ञात है। जड़ वस्तुकी अज्ञातता न रहनेसे वह ज्ञेय नहीं कही जा सकती ।।
७९४ -: महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति :- अत्र प्रश्न होता है यदि वह ज्ञानके योग्य है तो सभी लोग उसे क्यों नहीं जान सकते ? इसके उत्तरमें कहते हैं— 'ज्ञानगम्यम्'—वह ज्ञानगम्य है अर्थात् 'अमानित्व' से लेकर 'तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्' (गीता १३ । ७—११) पर्यन्त जिस साधन-कलापको ज्ञानका हेतु कहा है, ज्ञानशब्दवाच्य उन साधन-समूहोंसे ही आत्मा गम्य ( प्राप्य ) है; अन्यथा उसे नहीं प्राप्त किया जा सकता। फिर प्रश्न होता है कि यदि आत्मा साधनोंसे ही गम्य होता है तो क्या वह किसी दूर स्थानमे मिलेगा ? इसका उत्तर है—नहीं 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्'—वह सबके हृदयमें अर्थात् निखिल प्राणियोंकी बुद्धिरूप हृदय-गुहा- मे ही स्थित है। सूर्यके प्रकाशके सर्वत्र सामान्यभावसे रहने- पर भी जैसे वह दर्पण किंवा सूर्यकान्तमणि आदिमें विशेष रूपसे अभिव्यक्त होता है, उसी प्रकार वह आत्मा भी सर्वत्र सामान्यभावसे रहनेपर भी उस हृदयकन्दरारूप बुद्धि-गुहामे विशेष रूपसे प्रकाशित होता है। वह वस्तुतः व्यवधानरहित है. परन्तु भ्रान्ति ( अविद्या ) के कारण व्यवहित प्रतीत होता है तथा सब प्रकारके भ्रमका कारण जो अज्ञान है, उसकी निवृत्ति होनेपर प्राप्त हुआ-सा ज्ञात होता है। ज्ञानक्रियाका कर्म, जो ज्ञेय वस्तुका जानना है, उस प्रकार ज्ञानके फलरूप- से ज्ञेय न होनेपर भी वह आत्मा सबके हृदयमें अधिष्ठित है तथा स्वयं साक्षात् ज्ञानस्वरूप है। अमानित्वादि साधनोंसे प्रतिबन्ध दूर होकर इसका प्रकाश होनेके कारण इसे 'ज्ञेय' कहा गया है। आत्मा स्वप्रकाशस्वरूप स्वयंसिद्ध है, अतएव वह आवरण-भङ्गरूप वृत्तिव्याप्तिका ही विषय है, उसमें फलव्याप्ति कैसे हो सकती ? स्वप्रकाशस्वरूपत्वात् सिद्धत्वाच्च चिदात्मनः । वृत्तिव्याप्यत्वमेवास्तु फलव्याप्ति कथं भवेत् ॥ (सदाचार० ५) अर्थात् उसमे फलव्याप्ति नहीं हो सकती। अस्तु, जाग्रदादि सभी अवस्थाओंमे एक अद्वितीय निर्मल ज्ञान ( सत्ता ) ही सदा भास रहा है, परंतु उस सर्वव्यापक निरवधिक, केवल शुद्ध विज्ञानघनस्वरूपको मन्द भाग्यवाले नहीं जान सकते— ज्ञानमेक सदा भाति सर्वावस्थासु निर्मलम् । मन्दभाग्या न जानन्ति स्वरूप केवलं बृहत् ॥ (सदाचारानुसन्धानम् ३१) जो सबका साक्षी ज्ञानस्वरूप है, जो सब चराचर प्राणियोंका जीवनरूप है 'चेतनश्चेतनानाम्' है, वही आत्मा है और वही 'मैं हूँ' इस प्रकार जो जानता है और अनुभव करता है, वह मुक्त और कृतकृत्य है—इसमें कुछ भी सशय नही। प्रमाता ( अन्तःकरणविशिष्ट जीवात्मा ); प्रमाण ( प्रत्यक्षादि ); प्रमेय ( घट-पट आदि ) तथा (वृत्तिक्शान ) प्रमा जिस चैतन्य-प्रकाशसे प्रतीत होते हैं, उस चैतन्य-ज्ञानके लिये कौन प्रमाण चाहिये अर्थात् वह चैतन्य वस्तु स्वतः- सिद्ध स्वयंप्रकाश है. प्रमाणान्तरसे उसका ज्ञान नहीं हो सकता। क्योंकि वही तो प्रमाणोंका भी प्रमाण है अर्थात् प्रमाण भी उस चैतन्यसे ही प्रकाशित होकर प्रमाणित होते हैं। इसी आत्माको— एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवास साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ ( श्वेताश्वतर० ६ । ११ ) 'समस्त प्राणियोंमे एक ही देव स्थित है। वह सर्वव्यापक, समस्त भूतोंका अन्तरात्मा, कर्मोंका अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों- मे बसा हुआ, सबका साक्षी, सबको चेतनत्व प्रदान करने- वाला, शुद्ध और निर्गुण है।' इस श्रुतिमे 'साक्षी' कहा गया है। भगवद्गीतामें भी 'उपद्रष्टानुमन्ता च' (१३ । २२) कहा गया है अर्थात् देह, चक्षु, मन और बुद्धिरूप दृश्य- पदार्थोंमें रहकर भी उन देह, चक्षु, मन और बुद्धि आदिके समस्त व्यापारोंको एवं दृश्योंको अविक्रियरूपसे वह देखता है। इसलिये 'उपद्रष्टा' है और उन देह, इन्द्रिय प्रभृतिको अपने- अपने व्यापारमें अपनी-अपनी इच्छानुसार प्रवृत्त होनेपर उन्हे रोकता भी नहीं—वह केवल साक्षीरूपसे सब कुछ देखता है—अतः आत्मा स्वभावसे ही साक्षी एवं द्रष्टा है। इसलिये द्रष्टाभाव आत्माका स्वरूप है। इसकी गाढ अवस्थामें सविकल्प समाधि लगती है। अतः सब कालमें विराजमान सच्चिदानन्द- घन निर्गुण निर्विकार निराकार आत्माका द्रष्टाभाव रखना ब्रह्माभ्यास ही है तथा यह उच्चकोटिकी साधना है। चित्तगत काम, सकल्प प्रभृति वृत्तियाँ दृश्य हैं, आत्म- चैतन्य उनका द्रष्टा है, इस भावसे आत्मचैतन्यका ध्यान करना चाहिये अर्थात् उन काम-संकल्पादि वृत्तियोंमेसे प्रत्येक वृत्तिको द्रष्टाका दृश्यरूप जानकर तथा जो चैतन्य उन वृत्तियोंका साक्षी हुआ है, उस द्रष्टा साक्षीको ही अपना यथार्थ स्वरूप जानना चाहिये। मैं असङ्ग, सच्चिदानन्द स्वयंप्रकाश हूँ तथा सब प्रकारके काम-सकल्पादि द्वैतसे वर्जित हूँ, स्वगत, सजातीय तथा विजातीय भेदसे शून्य अन्तरात्मस्वरूप साक्षी
ॱ निवेदन और क्षमा-प्रार्थना ॱ ७७५ हूँ—इस प्रकारका भाव सदा जागरित रखना चाहिये और मै अन्तरात्मस्वरूप चैतन्य-मात्र, द्रष्टा, साक्षी हूँ—इस चिन्तन- धाराको ऐसे प्रवाहित करना चाहिये कि तार न टूटने पावे । इस प्रकारका अभ्यास सहज होनेपर स्वरूपभूत ज्ञानानन्दका आविर्भाव होकर आत्मास्थितिपूर्वक जीव कृतकृत्य हो जाता है । यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्था प्रकाशन्ते महात्मन ॥ ( श्वेताश्वतर० ६ । २३ ) ‘जिसकी परमेश्वरमे अत्यन्त भक्ति है और जैसी परमात्मा- मे है वैसी ही श्रीगुरुदेवमें भी है, उसीके अन्तःकरणमे इन तत्त्वोंका प्रकाश होता है ।’ निवेदन और क्षमा-प्रार्थना मनुष्य-जीवनका चरम और परम उद्देश्य है—अखण्ड पूर्ण आनन्द तथा सनातन शान्तिरूप भगवान्को प्राप्त करना । जीवनके अन्य सारे कार्य इसी एकमात्र चरम लक्ष्यकी सिद्धिके लिये किये जाने चाहिये । हमारे उपनिषद् इसी परम लक्ष्यके स्वरूप तथा उसकी प्राप्तिके विविध अनुभवपूर्ण साधनोंका उपदेश करते है । हम भारतीय आज इस अपने घरके दिव्य परसोज्ज्वल प्रकाशको छोड़कर अज्ञानान्धकारके नाशके लिये दूसरोंकी टिमटिमाती चिरागपर मुग्ध हुए जा रहे है ! हमारा यह मोह दूर हो । हम उपनिषदोंका किसी अंशमें यत्किञ्चित् परिचय प्राप्त कर सकें, इसी उद्देश्यसे ‘उपनिषद्- अङ्क’के प्रकाशनका हमारा यह क्षुद्र प्रयास है । उपनिषदें ज्ञानकी खानें हैं । जीवनकी सभी दिशाओंमे प्रकाश देनेवाली अखण्ड परम ज्योति हैं । परमात्माके पुनीत मार्गकी पथप्रदर्शिका हैं और परमात्मा परमेश्वरके विभिन्न रूपोंके निर्भ्रान्त और समन्वयात्मक स्वरूपका साक्षात्कार कराने- वाली हैं । उपनिषदोंकी महिमा इसलिये नहीं है कि दाराशिकोहने इनसे प्रकाश प्राप्त किया या शोपेनहर, मैक्समूलर एव अन्यान्य पाश्चात्त्य विद्वानोंने इनकी प्रशसा की है । यह उनका सौभाग्य है, जो उन्हें उपनिषदोंका कुछ आभास प्राप्त हुआ । वे उपनिषदोंको न जान पाते, जानकर भी प्रशंसा न करते या कोई इन्हें व्यर्थ बताकर निन्दा भी करता तो इससे उपनिषदोंका महत्त्व तो अक्षुण्ण ही रहता । क्योंकि उनकी महिमाका आधार उनका निर्मल मङ्गलमय प्रकाशमय स्वरूप ही है। आजकल काल-निर्णयकी पद्धति चली है, और पाश्चात्त्य विद्वानोंके मतोंका अनुकरण करके भारतीय विद्वान् भी उसी पद्धतिके अनुसार चल रहे हैं । इसीसे उपनिषदोंका निर्माण- काल ईसासे सात-आठ सौ वर्ष पूर्व बतलाते हैं । पर उन्हें यह समझना चाहिये कि ब्रह्मसूत्रमे उपनिषदोंकी व्याख्या है और ब्रह्मसूत्रका श्रीमद्भगवद्गीतामे उल्लेख है, इससे यह सिद्ध है कि भगवद्गीतासे पूर्व उपनिषदोंका अस्तित्व था । श्रीमद्भगवद्गीताका प्रादुर्भाव ईसासे ३१०० वर्ष पूर्व महाभारत- युद्धमें हुआ था—यह प्रायः निर्णीत हो चुका है । ऐसी अवस्था- में दूसरोंके अन्धेरेमें काल टटोलनेकी यह पद्धति कहाँतक समीचीन है, इसपर विद्वान् सज्जन विचार करें । वस्तुतः उपनिषदोंकी महत्ता कालपर नहीं है, वह तो उनकी महान् ज्ञानराशिको लेकर है, जो वेदोंके सारके रूपमें ऋषियो- द्वारा श्रुत और संगृहीत है एव जो नित्य, सत्य और सनातन है । उपनिषदोंमे तत्त्वज्ञान या ज्ञानके परम साध्य तत्त्वके स्वरूपका साक्षात्कार ही नहीं है, वहाँतक पहुँचनेके विभिन्न रुचिके अधिकारियोंके अनुकूल विविध साधनोंका भी वर्णन है, और साथ ही मनुष्यको ऊँचे उठानेवाले उस सदाचारका भी महत्त्वपूर्ण उल्लेख है, जिसे जानकर प्रत्येक मनुष्य अपनेको ऊँचा उठानेका प्रयत्न कर सकता है । यह भारतीयोकी परम निधि है और किसी दिन इन्हींके प्रकाशसे विश्वमे यथार्थ सुख-शान्तिका प्रसार होगा । उपनिषद् सैकड़ों हैं । उनमे बारह प्रधान मानी जाती है । इन बारहमेंसे—ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय और श्वेताश्वतर इन नौ उपनिषदोंको तो मूल, पदच्छेद, अन्वय तथा व्याख्यासहित प्रकाशित किया जा रहा है । समय-सङ्कोचसे शेष तीन—छान्दोग्य, बृहदारण्यक और कौषीतकि-ब्राह्मणपर व्याख्या नही लिखी जा सकी ।
Regd. No. A. 175. श्रीहरिः भगवान् ही सब कुछ हैं स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् । स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः ॥ स एव सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं सनातनम् । ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विमुक्तये ॥ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । सम्पश्यन् ब्रह्म परमं याति नान्येन हेतुना ॥ ( कैवल्योपनिषद् ८–१० ) वे (परात्पर परब्रह्म परमेश्वर ही) चतुर्मुख ब्रह्मा हैं, वे ही पञ्चमुख शिव हैं, वे ही देवराज इन्द्र हैं, वे ही अक्षर परमात्मा हैं, वे ही चतुर्भुज विष्णु हैं, वे प्राण हैं, वे काल हैं, वे अग्नि हैं, वे चन्द्रमा हैं। जो कुछ हो चुका और जो कुछ आगे होनेवाला है, सब वे ही हैं। उन सनातन भगवान्को जानकर जीव मृत्युके परे चला जाता है। इसके अतिरिक्त मुक्तिका अन्य कोई उपाय नहीं है। जो इन परमात्माको सब चराचर भूत- प्राणियोंमें देखता है और सब भूतप्राणियोंको परमात्मामें देखता है अर्थात् सब प्रकारसे एक भगवान्को ही सदा सर्वत्र देखता है, वह उन पर- ब्रह्मको प्राप्त करता है। दूसरे किसी उपायसे उनकी प्राप्ति नहीं होती।