कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 824, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७६८ * वासुदेवोपनिषद् * निवास करता हूँ। जैसे तिलोंमें तेल, लकड़ीमें अग्नि, दूधमें घी तथा पुष्पमें गन्ध (व्याप्त है), वैसे ही भूतोंमें उनके आत्मरूपसे मैं अवस्थित हूँ। जगत्- में जो कुछ भी दिखायी पड़ता है अथवा सुना भी जाता है, उस सबको बाहर और भीतरसे भी व्याप्त करके मैं नारायण स्थित हूँ। मैं देहादिसे रहित, सूक्ष्म, चित्प्रकाश (ज्ञानस्वरूप), निर्मल, सबमें ओतप्रोत, अद्वैत परम ब्रह्मस्वरूप हूँ। ब्रह्मरन्ध्रमें, दोनों भौंहोंके मध्यमें तथा हृदयमें चेतनाको प्रकाशित करनेवाले श्रीहरिका चिन्तन करे। इन स्थानोंको गोपीचन्दनसे उपलिप्त करके (वहाँ गोपीचन्दनका तिलक करके) तथा ध्यान करके साधक परमतत्त्वको प्राप्त करता है। ऊर्ध्वदण्डी, ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी), ऊर्ध्वपुण्ड्र (धारी) तथा ऊर्ध्वयोग (उत्तम गति देनेवाले योग) को जानने- वाला-इस ऊर्ध्व-चतुष्टयसे सम्पन्न सन्यासी ऊर्ध्वपद (दिव्यधाम) को प्राप्त करता है। इस प्रकार यह निश्चित ज्ञान है। यह मेरी भक्तिसे स्वयं सिद्ध हो जाता है। नित्य गोपीचन्दन धारण करनेसे एकाग्र भक्ति प्राप्त होती है। वैदिक ज्ञानसम्पन्न सर्वश्रेष्ठ सभी ब्राह्मणोंके लिये पानीके साथ घिसकर गोपीचन्दनके ऊर्ध्वपुण्ड्र (करने) का विधान है। जो मुमुक्षु (मोक्षकी इच्छा रखनेवाला) है, वह अपरोक्ष आत्मदर्शनकी सिद्धिके लिये गोपीचन्दनके अभावमे (गोपीचन्दन न हो, तब) तुलसीके जड़की मिट्टी (से) नित्य (तिलक) धारण करे। जिसका शरीर गोपीचन्दनसे लिप्त रहता है, उसके शरीरकी हड्डियाँ निश्चय ही (दधीचिकी हड्डियोंके समान) दिनोंदिन चक्र (वज्रके समान सुदृढ) होती जाती हैं। (दिनमें तो गोपीचन्दनका ऊर्ध्वपुण्ड्र करे) और रात्रि- को अग्निहोत्रकी भस्मसे 'अग्नेर्भस्मासि०' आदिसे (भस्म लेकर) 'इदं विष्णुं०' आदि मन्त्रसे मलकर तथा 'त्रीणि पदाँ०' आदि मन्त्रसे, विष्णुगायत्रीसे तथा (यदि साधु हो तो) प्रणवसे उद्धूलन करे (सम्पूर्ण शरीरको मले)। जो इस विधिसे गोपीचन्दन धारण करता है, अथवा जो इस (उपनिषद्) का अध्ययन करता है, वह समस्त महापातकोंसे पवित्र हो जाता है। उसे पाप-बुद्धि उत्पन्न नहीं होती। वह सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर चुकता है। (सब तीर्थोंके स्नानका पुण्य प्राप्त कर लेता है।) सम्पूर्ण यज्ञोंका यजन करनेवाला (उनके यजनके फलको प्राप्त) होता है। सम्पूर्ण देवताओंसे पूजनीय हो जाता है। उसकी मुझ नारायणमें अचला भक्ति वृद्धिको प्राप्त होती है। वह सम्यक् ज्ञान प्राप्त करके भगवान् विष्णुका सायुज्य (मोक्ष) प्राप्त करता है। फिर (संसारमें) लौटकर नहीं आता, नहीं आता। आकाशमें व्याप्त हुए सूर्यकी भाँति भगवान् विष्णुके उस परमपदको सूक्ष्मदर्शी (ज्ञानी) सदा अपने हृदयाकाशमें देखते (साक्षात् करते) हैं। भगवान् विष्णुका वह जो परम पद है, उसे लोक व्यवहारमें अनासक्त एव साधनके लिये सदा जाग्रत् रहनेवाले विप्रगण ध्यानमें प्रकाशित करते हैं। (ध्यानमें उसका साक्षात् दर्शन करते हैं।) ॥ सामवेदीय वासुदेवोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! १. 'अग्नेर्भस्मासन्ने पुरीषमसि चित स्थ परिचित्त ऊर्ध्वचित अध्वश्वम्।' (वाजसनेयिसंहिता १२।४६) २. 'इद विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूढमस्य पांसुरे ॥' (ऋक्० १।२२।१७) ३. 'त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन्।' (ऋक्० १।२२।१८)