भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 823
  • महांन्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७६७

विष्णुगायत्री^१ से तीन बार अभिमन्त्रित करे। तदनन्तर— शङ्खचक्रगदापाणे द्वारकानिलयाच्युत । गोविन्द पुण्डरीकाक्ष मा पाहि शरणागतम् ॥ 'हाथोंमें शङ्ख, चक्र तथा गदा धारण किये, द्वारका- धाममें रहनेवाले हे अच्युत ! हे कमललोचन गोविन्द ! मै आप- की शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा करो।' इस प्रकार मेरा ध्यान करके गृहस्थ अनामिका अगुलि- द्वारा ललाट आदि ( ललाट, उदर, हृदय, कण्ठ, दोनों भुजाएँ, दोनों कुक्षि, कान, पीठका (पेटके पीछेका) भाग, गर्दनके पीछे तथा मस्तक—इन ) बारह स्थानोंपर विष्णु- गायत्रीसे अथवा केशव आदि बारह नामों^२ से ( चन्दन ) धारण करे। ब्रह्मचारी अथवा वानप्रस्थ (अनामिकासे ही) ललाट, कण्ठ, हृदय तथा बाहुमूल (कन्धोंके पास बाहुके कूल्हों) पर विष्णुगायत्रीके द्वारा अथवा कृष्णादि पाँच नामों^३ से (चन्दन) धारण करे। सन्यासी तर्जनी अँगुलिसे सिर, ललाट तथा हृदयपर प्रणवके द्वारा (चन्दन) धारण करे। इति ऋचस्य कण्वो मेधातिथि ऋषि विष्णु देवता गायत्री छन्द अभिमन्त्रणे विनियोग ।' पूर्ववत् न्यास करे । १. (विष्णुगायत्री)—नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् । २ ललाटे केशव विद्यान्नारायणमथोदरे । माधव हृदये न्यस्य गोविन्द कण्ठकूपके ॥ विष्णुश्च दक्षिणे कुक्षौ तद्भुजे मधुसूदनम् । त्रिविक्रम कर्णदेशे वामे कुक्षौ तु वामनम् ॥ श्रीधर तु सदा न्यस्येद् वामबाहौ नर सदा । पद्मनाम पृष्ठदेशे ककुद्दामोदर स्मरेत् ॥ वासुदेव स्मरेन्मूर्ध्नि तिलक कारयेत् क्रमात् । ललाटमें केशव, उदरमें नारायण, हृदयमें माधव, कण्ठकूपमें गोविन्द, दाहिनी कुक्षिमें विष्णु, दाहिनी भुजामें मधुसूदन, कानोंमें त्रिविक्रम, बायीं कुक्षिमें वामन, वामबाहुमें श्रीधर, पीठमें पद्मनाभ, ककुत् (गर्दनके पीछे) में दामोदर, मस्तकपर वासुदेव—इस प्रकार भगवन्नामका न्यास करते हुए तिलक करे। ३ 'कृष्ण. सत्य. सात्वत. स्याच्छौरि शूरो जनार्दन. ।' अथवा— कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च। नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नम ॥ कृष्ण, सत्य, सात्वत, शौरि एव जनार्दन अथवा कृष्ण, वासुदेव, देवकीनन्दन, नन्दगोपकुमार और गोविन्द—इन नामोंसे तिलक करे। ब्रह्मादि (ब्रह्मा, विष्णु, शिव), तीनों मूर्तियाँ, तीनों (भू. भुव स्व.) व्याहृतियाँ, तीन (गण-छन्द, मात्रा- छन्द तथा अक्षर-छन्द) छन्द, तीनों (ऋक्, यजुः एव साम) वेद, तीनों (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) स्वर, तीनों (आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि) अग्नियों, तीनों (चन्द्र, सूर्य, अग्नि) ज्योतिष्मान्, तीनो (भूत, वर्तमान, भविष्य) काल, तीनों (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) अवस्थाएँ, तीनों (क्षर, अक्षर, परमात्मा) आत्मा, तीनों पुण्ड्र (अकार, उकार, मकार—प्रणवकी ये तीन मात्राएँ)—ये सब प्रणवात्मक तीनों ऊर्ध्वपुण्ड्रके स्वरूप हैं। अतः ये तीन रेखाएँ एकत्रित होकर ॐके रूपमें एक हो जाती हैं (अर्थात् तीनों पुण्ड्र मिलकर प्रणवरूप होते हैं)। अथवा परमहंस प्रणवद्वारा एक ही ऊर्ध्वपुण्ड्र ललाटपर धारण करे। वहाँ (ललाटमें) दीपके प्रकाशके समान अपने आत्माको देखता हुआ तथा 'मैं ब्रह्म ही हूँ' ऐसी भावना करता हुआ योगी मेरा सायुज्य (मोक्ष) प्राप्त करता है और दूसरे (परमहंसके अतिरिक्त) कुटीचक, त्रिदण्डी, बहूदक आदि सन्यासी हृदयपरके ऊर्ध्वपुण्ड्रके मध्यमें या हृदयकमलके मध्यमें अपने आत्मतत्त्वकी भावना (ध्यान) करें । उस हृदयकमलके मध्यमें नीले बादलके मध्यमें प्रकाशमान विद्युल्लताकी भाँति अत्यन्त सूक्ष्म ऊर्ध्वमुखी अग्निशिखा स्थित है। वह नीवारके शूक (सिके—कोंपलमूल) की भाँति पतली, पीतवर्ण तथा प्रकाशमय अणुके समान है। उसी अग्नि- शिखाके मध्यमें परमात्मा स्थित हैं। पहले हृदयके ऊपरके ऊर्ध्वपुण्ड्रमें (अग्निशिखाके मध्य परमात्माकी भावनाका) अभ्यास करे। उसके पश्चात् हृदय-कमलमें (उसी ध्यानका) अभ्यास करे। इस प्रकार क्रमशः अपने आत्मरूपकी मुझ परम हरिरूपसे भावना करे । जो एकाग्र मनसे मुझ अद्वैतरूप (जिसके अतिरिक्त और कोई सत्ता नहीं, उस) हरिका हृदय-कमलमें अपने आत्म- रूपसे ध्यान करता है, वह मुक्त है, इसमें सन्देह नहीं। अथवा जो भक्तिद्वारा मेरे अव्यय, ब्रह्म (व्यापक), आदि- मध्य एवं अन्तसे रहित, स्वयंप्रकाश, सच्चिदानन्दस्वरूपको जानता है (वह भी मुक्त है, इसमें सन्देह नहीं)। मैं एक ही विष्णु अनेक रूपवाले जङ्गमों तथा स्थावर भूतोंमें भी ओतप्रोत होकर उनके आत्मरूपसे