भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 822

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ सामवेदीय वासुदेवोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! गोपीचन्दनका महत्त्व, उसके धारणकी विधि और फल


[बायाँ स्तम्भ]

देवर्षि नारदने सर्वेश्वर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करके उनसे पूछा—भगवन् ! द्रव्य, मन्त्र, स्थान आदि (देवता, रेखा, रंग एव परिमाण) के साथ मुझे ऊर्ध्वपुण्ड्रकी विधि बतलाइये । तब देवर्षि नारदसे भगवान् वासुदेव बोले—'जिसे ब्रह्मादि मेरे भक्त धारण करते हैं, वह वैकुण्ठधाममें उत्पन्न, मुझे प्रसन्न करनेवाला विष्णुचन्दन मैने वैकुण्ठधामसे लाकर द्वारकामें प्रतिष्ठित किया है । कुङ्कुमादिसहित विष्णुचन्दन ही चन्दन है । मेरे अङ्गोंमें वह चन्दन गोपियोंद्वारा उपलेपित और प्रक्षालित होनेसे गोपीचन्दन कहा जाता है । मेरे अङ्गका वह पवित्र उपलेपन्नु चक्रतीर्थमें स्थित है । चक्र (गोमतीचक्र) सहित तथा पीले रंगका वह मुक्ति देनेवाला है । [चक्रतीर्थमें जहाँ गोमती-चक्रशिला हो, उस शिलासे लगा पीला चन्दन ही गोपी-चन्दन है । शिलासे पृथक् तथा दूसरे रंगका नहीं ।] पहले गोपीचन्दनको नमस्कार करके उठा ले, फिर इस मन्त्रसे प्रार्थना करे— गोपीचन्दन पापघ्न विष्णुदेहसमुद्भव । चक्राङ्कित नमस्तुभ्यं धारणान्मुक्तिदो भव ॥ 'हे विष्णुभगवान्के देहसे समुत्पन्न पापनाशक गोपी-चन्दन ! हे चक्राङ्कित ! आपको नमस्कार है । धारण करनेसे मेरे लिये मुक्ति देनेवाले होइये ।'


[दायाँ स्तम्भ]

इस प्रकार प्रार्थना करके 'इमं मे गङ्गे०'¹ इस मन्त्रसे जल लेकर 'विष्णोर्नु कम्०'² इस मन्त्रसे (उस चन्दनको) रगड़े । फिर 'अतो देवा अवन्तु नो०'³, आदि ऋग्वेदके मन्त्रोंसे तथा १ 'इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्ण्या । असिक्न्या मरुद्वृधे वितस्तयाऽऽर्जीकीये शृणुह्या सुषोमया ॥' (ऋक्० १०।७५।५) इस मन्त्रके सिन्धुद्वीप ऋषि हैं, मन्त्रोक्त सब नदियाँ देवता हैं, जगती छन्द है, जलदानमें इसका विनियोग है ।' इन ऋषि आदिका न्यास करना चाहिये । २ 'विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्र वोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो अस्कभायद॒त्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः ॥' (ऋक्० १।१५४।१) इस मन्त्रका 'विष्णोर्नु कमिति मन्त्रस्य दीर्घतमा ऋषिः नारायणो देवता त्रिष्टुप् छन्द मर्दने विनियोगः।' इस प्रकार विनियोग है । इन ऋषि आदिका न्यास करना चाहिये । ३. 'अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे । पृथिव्याः सप्त धामभिः ॥' 'तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् । तद्विप्रासो विपन्धवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् ।' (ऋक्० १।२२।१६, २०-२१) इन तीनों मन्त्रोंको पढ़े। इनका विनियोग वाक्य यह है—'अतो देवा

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