कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 825, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपनिषदोंमें श्रीसर्वेश्वर (लेखक—विद्याभूषण, साख्य-साहित्य-वेदान्ततीर्थ श्रीव्रजवल्लभशरणजी वेदान्ताचार्य) वेदेषु यत्किमपि गुप्तमनन्ततत्त्वं ब्रह्मात्ममत्पुरुषशब्दमुखैर्विनीतम् । नत्वेह निर्गुणमशेषगुणाश्रयं तं सर्वेश्वरं श्रुतिगिरा सुविभावयामि ॥ अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक विश्वम्भर परमपिता परमेश्वर-तत्त्वकी वेद एव उपनिषदोंमें जो मीमासा की गयी है वह ब्रह्म, आत्मा, विष्णु, रुद्र, शिव, केवल, सर्वज्ञ इन्द्र, उपेन्द्र, नारायण, नृसिंह, कृष्ण, गोपाल, गोविन्द, परमात्मा, परमेश्वर, पुरुषोत्तम, वासुदेव, राम, यम, काल, ईश्वर प्राण, आकाश, क, ख, ॐ, सत्, असत्, चित्, आनन्द और अक्षर आदि अनेकों नामोंसे की गयी है। उपर्युक्त सभी नाम सार्थक हे। इन सभीमे श्रीसर्वेश्वरके ही स्वरूप गुणोंकी झाँकी होती है, क्योकि शब्द और अर्थका तादात्म्य-सम्बन्ध माना जाता है। अतः शब्दके उच्चारण होते ही उसका अर्थ भाषित हो जाता है, परतु जो व्यक्ति शब्दकी शक्तिसे अनभिज्ञ हों, उनको बारयार उच्चारण करनेपर भी इन शब्दोंका अर्थ ज्ञात नहीं हो पाता। जबतक शब्दशक्ति- को द्योतन करनेवाले साधनोंकी प्राप्ति नहीं होती, तबतक अर्थ चाहे म्वय मूर्तिमान् बनकर भी किसीके सामने उपस्थित हो जाय, अबोध व्यक्तिको यह पता नहीं चल सकता कि यह कौन वस्तु है, इसका क्या महत्त्व है एवं यह किस उपयोगमे आती है। जैसे नवजात शिशुको उसके माता पिता, भाई आदि तत्तद्व्यक्तियोंको दिखलाकर जबतक बारबार उनके नाम नहीं सुनाये जाते, तबतक वह शिशु अपने जनक-जननी आदि परमहितैषी आत्मीयोंको भी नहीं जान पाता। परतु उनका ज्ञान हो जानेपर वह अपने उन माता-पिता-भ्राता आदिको उन उन नामोंसे पुकारने लगता है और उनमे आत्मरक्षाका अभिनिवेश बना लेता है। अतएव जब कभी कोई भी आपत्ति आती दीखती है, तो वह तत्क्षण तल्लीन होकर रोता है और अपने उन पोषक रक्षक माता पिता आदिको पुकारता है और वे अपने कर्तव्यानुसार यथाशक्ति उसकी रक्षा करते हैं। अवस्था बढ जानेपर भी जबतक उस व्यक्ति- को किसी विशिष्ट शक्तिशाली सरक्षकका ज्ञान नहीं होता, तबतक वह उन्हीं भौतिकविग्रही माता पिता आदिपर निर्भर रहता है। यही कारण है कि कुछ लोग वृद्ध हो जानेपर भी दु खके अवसरपर अरी मैया ! अरे बाप ! आदि शब्दोंके वाच्यार्थको ही अपना सरक्षक मानते हैं। अतः ईश्वर आदि शब्दोसे पुकार न करके अरी मा ! आदि-आदि सम्बोधनोंके साथ साथ ही रुदन करते देखे जाते हैं। यह लौकिक ज्ञानका उदाहरण शास्त्रीय ज्ञानके साथ भी घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है। जैसे माता-पिता शब्दोंके प्रतिपाद्य व्यक्ति अपने पालनीयोंकी जहाँतक जितनी रक्षा करते हैं, वैसे ही उस सर्वाधार सर्वनियन्ता सर्वेश्वर प्रभुके ब्रह्म आत्मा आदि अन्यान्य नाम एव उन नामोंके द्वारा अभिव्यक्त होनेवाला तत्तद्गुणशक्ति विशिष्ट परमात्म तत्त्व भी वहींतक उतनी ही रक्षा करता है, जितनी मात्रामे कि उन-उन नामोंमें परमात्म- शक्तिमा आविर्भाव होता है, क्योंकि 'सर्वे शब्दा ब्रह्म- वाचका' इस उक्तिके अनुसार माता-पिता, भैया आदि सभी शब्द ब्रह्म (परमेश्वर) के ही वाचक होनेपर भी उनसे परिसीमित त्राणरूप ही फल मिलता है। अतः असीम रक्षाके लिये माता पिता आदि शब्दोंके अतिरिक्त किसी दूसरे ही शब्दका अवलम्ब लिया जाता है, किंतु परमात्माके नाम अनन्त है। क्रमशः एक एक नामकी उपासना करते करते सहस्रों मानवजन्म व्यतीत हो जायें तब भी, निर्हेतुक असीम कृपाकारक सर्वोच परमात्मतत्त्व-प्रतिपादक नामका प्राप्त होना कठिन है। अतः उपनिषदोंमे उस अनन्त ब्रह्माण्डनायक सर्वाधार सर्वेश्वर प्रभुके कुछ ऐसे विशिष्ट नामोंका उल्लेख है कि जिनका क्रम पूर्ण होकर एक ही जन्ममें मनुष्यको सर्वोच्च नामकी प्राप्ति हो सकती है, जिसके प्रयोगसे असीम रक्षा सुलभ हो जाती है और फिर अन्य नामादिका अन्वेषण भी अवशिष्ट नहीं रहता। वेद, उपनिषद् आदि समस्त निगमागममे ऐसा एक महान् शब्द 'श्रीसर्वेश्वर' है, जिसका उच्चारण करते ही साधकको सर्वोच्च परमात्मतत्त्वकी झाँकी हो जाती है। किंतु यह शब्द, इस शब्दकी महिमा, इस नामकी प्रतिमा और उसकी उपासना—ये सब प्राचीन कालसे ही बड़ी गोपनीय वस्तु मानी गयी है। यही कारण है कि जैसे लोकमें विशेष गोप्यवस्तु, जो अत्यन्त अभीष्ट हो उसका अत्यन्त गोपन (छिपाव) किया जाता है, वैसे ही वेद और उपनिषदोंमें 'श्रीसर्वेश्वर' शब्दका अत्यन्त गोपन किया गया है। अर्थात् उ० अं० ९७—