भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 826

७७० - महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति - ब्रह्म, आत्मा आदि अन्यान्य परमात्मवाचक शब्दोंकी अपेक्षा 'सर्वेश्वर' शब्दका प्रयोग अत्यन्त स्वल्प संख्यामे ही हुआ है। दूसरा हेतु यह भी माना जा सकता है कि ब्रह्म, आत्मा आदि शब्द अनेकार्थ-द्योतक है और सर्वेश्वर शब्द केवल एक ही सर्वोच्च पारमार्थिक पदार्थका प्रतिपादक है। अतएव उनका प्रयोग विभिन्न अर्थोंमे होनेके कारण अधिक स्थलोंमें एव अधिक रूपेण हुआ है और 'सर्वेश्वर' शब्दका प्रयोग उसी स्थलमें हुआ है, जहाँ कि एक सर्वोच्च पारमार्थिक परमात्मतत्त्वके प्रतिपादनकी आवश्यकता हुई। इसलिये अन्यान्य उपनिषदोंमें प्रयुक्त 'सर्वेश्वर' शब्दकी चर्चा न करके केवल माण्डूक्य और बृहदारण्यक उपनिषदमें पठित सर्वेश्वर शब्दका ही पाठकोंको दिग्दर्शनमात्र करा दिया जाता है। 'एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनि सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्।' (माण्डूक्य० १।५) 'यही सर्वेश्वर प्रभु हैं, जो चराचरके शासक और भूत भविष्यत्-वर्तमान कालत्रयमे बाहर-भीतरकी समस्त वस्तु और भावोंके ज्ञाता हैं। अतएव ये ही अन्तर्यामी है और ये ही प्रभु समस्त चराचरके उपादान और समस्त भूत प्राणियोंके निमित्तकारण तथा संहारक भी ये ही हैं।' यद्यपि कुछ महानुभाव इस श्रुतिकी व्याख्या करते हुए यहाँके 'सर्वेश्वर' शब्दको वैसे ही परब्रह्मका प्रतिपादक नहीं मानते हैं, जैसा कि उन्होंने परब्रह्म मान रखा है, तथापि उपक्रमोपसंहारादिपर विचार करनेसे उनकी वह व्याख्या असंगत-सी हो जाती है। क्योंकि इस उपनिषद्के आरम्भमें ही ॐकारपदवाच्य परब्रह्मकी प्रस्तावना की गयी है, फिर उस परब्रह्मको सुगमरूपसे जाननेके लिये उसी परब्रह्मके चार पादोंकी गणना की गयी है। यद्यपि वह परमात्मतत्त्व एक ही है। किसी प्रकारसे विभक्त नहीं होता तथापि स्थानादिके विभेदसे विश्व, तैजस, प्राज्ञ, तुरीय आदि उसकी अनेकों संज्ञाएँ हो जाती हैं। उपर्युक्त सभी संज्ञाएँ सापेक्ष हैं, इनमे अन्तर्यामिता एव सर्वेश्वरता सर्वत्र निरपेक्षरूपेण विद्यमान रहती है। जाग्रत् अवस्थामें आत्मा, इन्द्रिय, शरीर-ये सब सञ्चरित रहते हैं। अतः इस अवस्थामे वह अन्तर्यामी 'विश्व' कहलाता है। जब सब इन्द्रियोंकी शक्ति मनमें लीन हो जाती है, तब उस स्वावस्थामे वह अन्तर्यामी प्रभु 'तैजस' कहलाता है, क्योंकि वहाँ मनका ही अन्तर्नियमन करता है। जब वह मन भी आत्मामें लीन हो जाता है, तब उस सुषुप्ति-अवस्थामें केवल जीवात्माका ही अन्तर्नियमन करनेसे वह अन्तर्यामी प्रभु 'प्राज्ञ' कहलाता है। जब वह प्रभु जाग्रत् आदि समस्त भेदोको अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे अपनेमें लीन करके योगनिद्रास्थ होता है—तब वही 'तुरीय' कहलाता है। यद्यपि जाग्रदादि अवस्थाएँ बदलती रहती हैं, किंतु परब्रह्मका सच्चिदानन्दात्मक वास्तविक स्वरूप चारों पादों (अवस्थाओं) में अनुस्यूत रहता है। अतः सभी पादों (अवस्थाओं) के अन्तर्यामीमें सर्वेश्वरत्व भी निर्बाध है ही। यदि इस उपनिषद्में स्वप्रतिपाद्य चतुर्थ पादमात्र ही परब्रह्मात्त्वेन अभीष्ट होता तो आरम्भमे 'सर्वं हि एतद्ब्रह्म' ऐसी प्रतिज्ञा न करके 'चतुर्थपाद एव ब्रह्म' ऐसी प्रतिज्ञा की जाती। अतः तृतीय पादके पश्चात् और चतुर्थ पादके पूर्वपठित 'सर्वेश्वर' शब्द देहली-दीपकन्यायसे दोनों पादोंके साथ ही अन्वित हो सकता है-यह नहीं, अपितु चारो पादोंके साथ ही अन्वित समझना चाहिये । उपनिषदोंमे जहाँ कहीं किमी श्रुतिके शब्दार्थमें सन्देह प्रतीत होता है, वह अन्यत्र दूसरी श्रुतिमे स्पष्ट हो जाता है, अतएव यही 'सर्वेश्वर' शब्द बृहदारण्यक उपनिषद्में स्पष्टतया उसी परात्पर ब्रह्मका प्रतिपादन करता हुआ दृष्टिगत होता है, जैसा कि समस्त व्याख्याकारोंने उच्च- से-उच्च परात्मतत्त्व मान रक्खा है। क्योंकि इसके अतिरिक्त फिर और कोई उपनिषत्-प्रतिपाद्य सर्वोच्च तत्त्व है ही नही। 'स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशान सर्वस्याधिपति स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयान् एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसम्मेदाय तमेत वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेनैनमेव विदित्वा मुनिर्भवति।' (बृहदारण्यक० ४।४।२२) 'वह यही परमपिता परमेश्वर महान् अज है, जिसक शास्त्रोंमें अनेकों नामोसे उल्लेख मिलता है। यही प्रभु शरीर इन्द्रिय, मन, प्राणादिमें विज्ञान (प्रकाश) मयरूपसे विराजमान् है, अन्तर्यामीरूपसे हृदयन्तर्वर्ति-आकाशमें सदा स्थित रहता है। अतएव समस्त प्राणी इसीके वशमें हैं, इसीर्क प्रेरणासे प्रवृत्त होते हैं, क्योंकि यही प्रभु सबके शासक है एवं चराचरके अधिपति हैं। यद्यपि प्रत्येक जीव और समस्त सदसद् वस्तुओके भीतर यह प्रभु विराजमान है तथापि उनके गुण दोषोंसे एव भले-बुरे कर्मोंसे लिप्त नहीं होता पक्षपातरहित, न्यायकर्ता और सर्वत्र समान दयालु होनेवे कारण यही सर्वेश्वर है, यही सर्वेश्वर प्रभु समस्त भूतप्राणियोंक अधिपति, पालक और सेतुरूप सर्वोधार है। इसीके आभ्रित