कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- उपनिषदोंमें श्रीसर्वेश्वर * ७७१ रहनेके कारण अत्यन्त सूक्ष्म जीवसमूह और परमाणु आदि वस्तुओंका साङ्कर्य नहीं होता। विद्वान् भक्त वेदादि सच्छास्त्रों- द्वारा एव यज्ञ-दान-तप आदि साधनोंसे इसी सर्वेश्वर प्रभुको जानने एव प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं, क्योंकि इसी सर्वेश्वर प्रभुको जानने एव प्राप्त करनेमें जीवनकी परम सफलता है।' प्राचीन समयमें सभी मुनिजन 'श्रीसर्वेश्वर' नाम और श्रीसर्वेश्वरकी ही उपासना करते थे। श्रीसर्वेश्वर-प्राप्तिके लिये लौकिक प्रपञ्चको त्यागकर विरक्तिका अवलम्ब लेते थे । श्रीसनकादि-जैसे मुनिजनोंने पुत्रादि लौकिक एषणाओ- को छोड़कर श्रीसर्वेश्वरको ही अपना परमाराध्य एव परम प्राप्य माना है, क्योंकि श्रुतियोंमें 'नेति-नेति' कहकर जिस तत्त्वको सर्वोच्च बतलानेका संकेत किया है, वह यही सर्वेश्वर- तत्त्व है। अतएव इसी तत्त्वके उपासक प्राचीन ऋषि मुनि सर्वेश्वरवादी कहलाते थे। श्रीहंसभगवान्ने श्रीसनकादिको इसी सर्वेश्वर-तत्त्वका उपदेश किया था। फिर सनकादिने श्रीनारदजीको इसी तत्त्वकी उपासनाका उपदेश दिया—जो छान्दोग्य-उपनिषद्में भूमाविद्याके नामसे वर्णित है। बृहदारण्यक उपनिषद्में वही भूमाविद्या सर्वेश्वरविद्याके रूपसे उपदिष्ट हुई है। देवर्षि श्रीनारदजीने श्रीनिम्बार्क आदि मुनिवरोंको इसी सर्वेश्वर-उपासना (विद्या) का उपदेश किया । इस प्रकार परम्पराके रूपमें यह विद्या चली आ रही है। श्रीनिम्बार्काचार्य के परवर्ती सभी आचार्योंने इसे अपनी परम गोप्य विद्या मानकर केवल उत्तमोत्तम अधिकारियों को ही इसका उपदेश किया, जिससे उत्तरोत्तर यह विद्या विरलप्रचार बनती गयी। अन्यान्य नामोंसे इस विद्याका विशेष विस्तार हुआ। श्रीभगवान्के सभी नाम सर्वविधि कल्याणप्रद एवं समान ही हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं। तथापि नामोंमें प्रकृति- प्रत्ययात्मक विशेषता कुछ-न-कुछ अवश्य माननी पड़ती है। क्योंकि जिन-जिन नामोंमें जैसा-जैसा प्रकृति प्रत्ययका योग है, उन-उन नामोंसे वैसे ही शक्तिविशेषका विकास होता है। इसलिये उन-उन नामोंसे उपासना करनेवाले साधकोंको उन्हीं अर्थोंके अनुसार फल प्राप्ति होती है। अतएव वेद, ब्राह्मण, उपनिषद्, आरण्यक, इतिहास, पुराण आदि शास्त्रोंमें ध्यान, यजन, पूजन, कीर्तन आदि विभिन्न-विभिन्न युगोंके विशेष साधनोंकी भाँति परमात्माके नामोंकी उपासनाका भी क्रम देखा जाता है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि किस-किस अवसरपर किन-किन ऋषि-मुनियोंने किन-किन नामोंसे परमात्माकी उपासना की। जिस प्रकार 'ब्रह्म' 'विष्णु' आदि व्यापकत्व-प्रतिपादक शब्द प्रकृति-प्रत्ययके तात्पर्यानुसार उस परमात्म-तत्त्वकी व्यापकताको सूचित करते हैं। 'आत्म' शब्द निरन्तर स्थिति और 'सत्' शब्द अस्मिता, 'पुरुष' शब्द पुरीरूप समस्त क्षेत्रोंमें स्थिति और 'असत्' शब्द सूक्ष्म-कारणत्व प्रदर्शित करता है। 'अक्षर' शब्द अविनाशिता एव 'राम' शब्द योगियोंके रमण स्थलका द्योतन करता है। तथा 'कृष्ण' शब्द अपनी ओर आकर्षित कर संसारसे निवृत्तिकारिता प्रकटित करता है। 'रुद्र' शब्द भयप्रदर्शकत्व, 'शिव' शब्द मङ्गलमयता, 'शङ्कर' शब्द कल्याण कारकता, 'इन्द्र' शब्द आह्लादकत्व, 'सूर्य' शब्द प्रकाशकत्व, 'काल' शब्द गणनात्मकता, 'यम' शब्द नियामकता, 'प्रजापति' शब्द प्रजापालकता, 'गणपति' शब्द गणोंका आधिपत्य द्योतित करता है। 'महादेव' शब्द एक बड़े प्रकाशात्मक स्वरूपका निर्देश करता है और 'ईश्वर' शब्द शासकता प्रकटित करता है। 'विश्वेश्वर' शब्द प्राकृत विश्वकी शासकता प्रदर्शित करता है। 'पुरुषोत्तम' और 'परमात्म' शब्द भी सदा स्थित रहनेवालोंमें सर्वोच्च आत्मत्व- का प्रदर्शन कराते है। उसी प्रकार 'सर्वेश्वर' शब्द समस्त प्राकृत-अप्राकृत वस्तुजातकी शासकता एव नित्य निरतिशय ऐश्वर्य आदि सर्वोपरि शक्तिका प्रकाश करता है। यद्यपि 'ईश्वर' शब्दके साथ अखिल और निखिल शब्दोंके योगसे भी उपर्युक्त अर्थ सम्भावित हो सकता है, किंतु उपनिषदोंमें ऐसे विशेषणविशिष्ट शब्द सर्वोच्च-तत्त्व प्रतिपादनके अवसरपर कहीं नहीं अपनाये गये। इसलिये यही निश्चित होता है कि उपनिषदोंमें 'सर्वेश्वर' शब्द सर्वोच्च परमात्मतत्त्वका प्रतिपादक है। क्योंकि 'ब्रह्म' 'विष्णु' 'रुद्र' आदि जितने भी परमात्मतत्त्वके वाचक शब्द हैं, उन सभीकी शक्ति एक 'सर्वेश्वर' शब्दमें समाविष्ट है। इसलिये प्रभुको प्रसन्न कर अपनी समस्त आपत्तियोंको मिटाने एव नित्य निरतिशय आनन्दकी प्राप्तिके लिये, किस अवसरपर प्रभुके किस नामसे किस स्वरूपकी उपासना (प्रार्थना) करनी चाहिये—यह समझकर इस महान् धार्मिक सङ्कटके समय, उपनिषदोंके सर्वस्वरूप रहस्यात्मक इसी 'सर्वेश्वर' मन्त्रका उपयोग करना विशेष हितकर है। श्रीसर्वेश्वर प्रभुमें अपनी रक्षाके लिये ऐसा घनिष्ट अभिनिवेश कर लेना चाहिये कि—