भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 828, कुल 832 में से

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पृष्ठ 828

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७७२ -:- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति : मा चेन्न पास्यसि ततो भगवन्ममैव तो आप यह न समझे कि उससे केवल मेरी ही हानि हानिर्भवेदिति तु नो मननीयमीश। होगी, किंतु 'अहा देखो, सर्वेश्वरका सेवक होकर भी दुःख सर्वेश्वरस्य करुणादिगुणाम्बुतान्धे- पा रहा है' यह कहकर जनता आपको भी उलाहना दिये र्दासो हि सीदति जना इति वै क्षिपेयु ॥ बिना नहीं रहेगी। हे भगवन् ! हे ईश ! आप यदि मेरी रक्षा न करेंगे ऐसे विश्वासी भक्तोंपर ही सर्वेश्वर प्रभु शीघ्रातिशीघ्र द्रवित होते हैं। उपनिषदोंमें आत्मानुभव ( लेखक—श्रीबाबूलालजी गुप्त 'श्याम' ) सृष्टिके पूर्व जो जगत्‌की अनिर्वचनीय अव्याकृत अवस्था है, उसीको 'अव्यक्त' कहते है। यह 'अव्यक्त' ही परमेश्वर- की 'माया' नामक शक्ति है। सृष्टिके प्रारम्भमे परमात्माद्वारा जो सृष्टिविषयक ईक्षण³ ( आलोचन ) होता है, उसका नाम समष्टि 'बुद्धि' ( महत्तत्त्व ) है। अथवा यों कहिये कि सृष्टि रचनाविषयक परमेश्वरका ज्ञान ही 'ईक्षण' है। ईक्षणके अनन्तर 'अह बहु स्याम्' ( मै बहुत रूपोंमे प्रकट हो जाऊँ)—इस प्रकारका जो परमेश्वरीय सङ्कल्प है, वही 'अहङ्कार' कहलाता है। उस अहङ्कारसे ही आकाशादि क्रमसे पञ्चमहाभूतोकी उत्पत्ति हुई है५। ये पञ्चमहाभूत तम प्रधान प्रकृतिसे उत्पन्न हुए है। इन सबके जो पृथक् पृथक् सत्त्व अश ह, उनसे श्रोत्र आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियोंका प्रादुर्भाव हुआ है। इन पाँचों सत्त्वांशोंका संघात ही अन्तःकरण है। इसी प्रकार आकाश आदि पाँचों भूतोंके जो पृथक् पृथक् राजस अश हैं, उनसे क्रमशः वाक्, पाणि, पाद, गुदा तथा उपस्थ-ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं। उक्त पाँचों राजस अगोंके मेलसे प्राणका प्रादुर्भाव हुआ, जो वृत्तिभेदसे मुख्यतः पाँच प्रकारका माना गया है। पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, मन तथा बुद्धि- इन सत्रह तत्त्वोका समुदाय ही सूक्ष्म शरीर है। पिण्ड और ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिके लिये पाँचो भूतोका पञ्चीकरण हुआ। पञ्चीकृत भूतोंसे बना हुआ यह स्थूल शरीर 'अन्नमय कोष' कहलाता है। सूक्ष्म शरीरके रजोमय अश—पाँच प्राण एव पाँच कर्मेन्द्रियोका समुदाय मिलकर 'प्राणमय कोष' है। मन तथा सात्त्विक अशभूत ज्ञानेन्द्रियाँ 'मनोमय कोष'के अन्तर्गत है। निश्चयात्मिका बुद्धि एव ज्ञानेन्द्रियाँ 'विज्ञानमय कोष' हैं। कारण शरीर ही 'आनन्दमय कोष' है। यही सक्षेपसे सृष्टिकी प्रक्रिया है ( पञ्चदशी तत्त्व विवेक १७। ३६ )। पञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न विषयोंका ही दर्शन स्पर्श आदि होता है। प्रत्येक इन्द्रिय अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले केवल एक ही विषयको ग्रहण करती है, इसलिये सम्पूर्ण इन्द्रियग्राह्य विषय पाञ्चभौतिक होनेके कारण विनश्वर है । उनकी उत्पत्ति होती है, अतः विनाश भी अवश्यम्भावी है । आत्मा नित्य- सिद्ध चेतन है, इन विनाशशील जड वस्तुओसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। वह इनसे सर्वथा पृथक् एव विलक्षण है। इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेकसे आत्माको इन भूतोंसे पृथक् और अपना ही स्वरूप जानकर उसमे स्थिति प्राप्त की जा सकती है। आत्मस्थिति प्राप्त होनेपर ही जीव कृतकृत्य होता है। श्रीगुरुदेवकी कृपासे इस शरीरके रहते हुए ही आत्माका अनुभव होता है; और प्रयत्न करनेपर सबको हो सकता १ 'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' ( उन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमात्माकी अपनी ही शक्तिका, जो अपने गुणोंसे आच्छादित ( अव्यक्त ) है, साक्षात्कार किया)— श्वेताश्वतर० १।३। यह श्रुतिप्रतिपादित अव्यक्त है। २ 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' (श्वेता० ४। ९) यह श्रुति परमेश्वरकी शक्तिका नाम 'माया' बतलाती है। ३ 'तदैक्षत' इति ईक्षणरूपा बुद्धिः । ४ 'बहु स्या प्रजायेय' ( छान्दो० ४।९ ) इति बहुभवन सङ्कल्परूप अहङ्कार । ५ तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाश सम्भूत , आकाशाद् वायु , वायोरग्नि , अग्नेराप., अद्द्भ्य पृथिवी' ( तैत्ति० ३।१ ) इति पञ्चभूतानि श्रौतानि ।