कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४श सर्ग ] उत्साह प्रशंसा। ९१ व्यवसाय हइते निश्चयइ फललाभ हइया थाके ॥३॥ महासमुद्र येमन जलराशिर आश्रय सेइरूप धीमान् उत्साह-सम्पन्न ओ व्यवसाय-युक्त ( पाठान्तरे—प्रभुशक्ति-सम्पन्न ) व्यक्ति लक्ष्मीर उत्कृष्ट आश्रय ॥४॥ जले येमन नलिनी जीवित थाके सेइरूप बुद्धि थाकिले लक्ष्मीओ थाके। बुद्धि उत्थान ओ अध्यवसाय युक्त हइले ऐ लक्ष्मीर विस्तार हय ॥५॥ छाया येमन कायाके छाड़े ना अथच समये विस्तार प्राप्त हय सेइरूप उत्साह-सम्पन्न एवं बुद्धि द्वारा शुद्धरूपे चलिते समर्थ व्यक्तिर निकट हइते लक्ष्मी एकपाओ सरेन ना। बरं ताहार लक्ष्मी-सम्पत् बाड़िया याय ॥६॥ नदीसकल येमन समुद्रे प्रवेश करे सेइरूप सम्पत् समुदय बासनशून्य अश्रान्त महोत्साही ओ महामति-सम्पन्न व्यक्तिते उपगत हय ॥७॥ स्त्रीगण येमन नपुंसकके पराभूत करे, सेइरूप सत्बुद्धियुक्त हइलेओ याहार मन सर्व्वदा वासनासक्त तादृश अलस व्यक्ति सम्पद् हइते बञ्चित हय ॥८॥ काष्ठ येमन अग्निके परिवर्द्धित करे सेइरूप उत्साहद्वारा सत्त्वके ( अर्थात् बासन बा अभ्युदये विकारशून्य अध्यवसायके ) वर्द्धित करिबे। सतत उद्योगी व्यक्ति दुर्बल ( अर्थात् कोषद्ण्डविहीन ) हइलेओ निश्चयइ लक्ष्मीलाभ करे ॥९॥ दुष्ट स्त्रीके येमन बलपूर्व্বক भोग करिते हय सेइरूप पुरुषकार- सहकारे श्रीसम्पत् भोग करिबार जन्य उद्योग करिबे; कखनओ क्लीबेर न्याय आचरण करिबे ना अर्थात् उत्साह त्याग करिबे ना ॥१०॥ दुर्विनीत स्त्रीके येमन केशाकर्षणपूर्व্বক वशीभूत करिते हय, सेइरूप सर्व्वदा उद्योगी व्यक्ति सिंहवृत्ति अवलम्बन करिया लक्ष्मीके वशे आनिबेन ॥११॥ शत्रुदिगेर मणिरञ्जित किरीटयुक्त शिरस्त्राण-शोभित मस्तके पदार्पण ना करिया पुरुष कखनइ भद्रता लाभ करिते पारे ना ॥१२॥ अतिशय यत्ने प्रेरित प्रमत्त चित्त-हस्ती द्वारा प्रबल वैरि-वृक्षके उन्मूलित करिते ना पारिले सुख सम्भावना कोथाय ? ॥१३॥ हेलाय आकृष्ट देदीप्यमान तीक्ष्ण-खड्गेर किरणे अतिमात्र-रञ्जित सुन्दर-