भारतकोश
कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary

आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished164 पृष्ठ

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१४श सर्ग ] प्रकृति कर्म्म। ९५ मध्ये के सन्तुष्ट के असन्तुष्ट ताहार विचार, मध्यम ओ उदासीनेर चरित्रज्ञान एवं उहादेर सिद्धि, अर्थात् सन्धिर पालन, मित्रदिगेर सहित मित्रता रक्षा, शत्रुदिगेर निग्रह, पुत्र ओ द्वारा प्रभृति हइते आत्मरक्षा, बन्धुवर्गेर सहित मित्रता-रक्षा, खनि-द्वीप-वन दुर्ग-सेतु-वाणिज्येर पथ प्रभृति राजकीय वृत्तिर यथायथ परिचालन, असत्लोकदिगेर वृत्ति रोध करा, सज्जनदिगेर वृत्ति स्थापन करा, सकल जीवे अहिंसा, अधार्म्मिकदिगेर बर्ज्जन, अकार्य्येर प्रतिषेध, कर्त्तव्यकार्य्येर प्रवर्त्तन, दातव्यवस्तु ( क्षेत्रादिर ) दान, अदानार्ह ( पापार्ज्जित ) अर्थसंग्रह करिबे ना ( पाठान्तरे—याहा दानयोग्य नय ताहार संग्रह ), अदण्डनीयेर दण्ड-निषेध, दण्डनीयेर दण्डविधान, अग्राह्य ( अर्थात् पूर्ब्बवैरि अथवा स्वभावतः विद्वेषी ) दिगेर अग्रहण, ग्राह्यदिगेर ग्रहण, अर्थयुक्त ( सफल अभियानादिर ) अनुष्ठान, अनर्थेर ( अर्थात् बलवानेर सहित विग्रह प्रभृतिर ) बर्ज्जन, न्यायसङ्गत करग्रहण, करदाने असमर्थ व्यक्तिर कर रेहाइ करा, प्रधान व्यक्तिदिगेर समर्थन ( पाठान्तरे— संवर्द्धन ), दुष्ट व्यक्तिदिगेर निराकरण, वैषम्येर प्रशमन, भृत्यदिगेर विरोधेर मीमांसा, अविज्ञात विषयेर ज्ञान, ज्ञात-विषयेर अवधारण, सर्व्वदाइ कार्य्येर आरम्भ, आरब्धकार्य्येर परिसमाप्ति, अलब्धविषयेर न्यायानुसार लाभेच्छा, लब्धवस्तुर परिवर्द्धन, बर्द्धित विषय हइते विधिपूर्ब्बक सत्पात्रे अर्पण, अधर्म्मेर प्रतिषेध, न्यायानुसार चला, उपकार्य्य ( अर्थात् उपकारेर उपयुक्त ) व्यक्तिर उपकार—एइगुलि राजार वृत्ति ॥४१—५८॥ राजा नीतिपरायण हइया उद्योगी हइले एइ अमात्यादि समुदायेर उन्नति-साधन करेन एवं व्यसनी हइले एइ समुदाय क्षय करेन ॥५९॥ राजा धर्म्म एवं अर्थ उपार्ज्जने उत्कण्ठित हइया अनुद्विग्नचित्त हइले मन्त्री एइ समुदायेर विशेषरूप उन्नति करिते पारेन अर्थात् राजा व्यसनी ना हइया उद्योगी ओ नीतिपरायण हइले मन्त्री সমুদय कार्य्य सुशृङ्खलभावे परिचालित करिया राज्येर उन्नति करिते पावेन ॥६०॥ इति प्रकृति कर्म्म ॥