कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८-श सर्ग ] उपायविकल्प । ११९ याहार थाके ताहार कार्य्यसिद्धि हइया थाके ॥ ३७ ॥ राजा प्रजादिगेर मूल ; एइजन् राजाके स्कन्ध कहे। एखाने अमात्य ओ दण्डप्रभृतिइ आबार। बेष्टनकेइ आबार कहे। अर्थात् शाखागुलि येमन गाछेर गुँड़िके आश्रय करिया थाके सेइरूप प्रजावर्ग राजाके आश्रय करिया थाके बलिया, राजा स्कन्धस्वरूप एवं गाछेर गुँड़िते येमन आलवाल थाके सेइरूप अमात्य- दण्डप्रभृति राजस्वरूप-वृक्षेर आलवाल बा आबार ॥ ३८ ॥ प्रजावर्गेर त्रिवर्गसिद्धिर जन्य प्रकाण्ड आबार द्वारा स्कन्ध आवृत थाके ; अतएव स्कन्धके आवृत करे बलियाइ इहाके स्कन्धावार कहे ॥ ३९ ॥ विपक्षेर आक्रमण, घास, ( पाठान्तरे—बास ), जल, बीवध ओ आसार एइगुलिर निग्रह—स्कन्धावारेर मृत्युस्वरूप ; अतएव एइगुलिके सयत्ने रक्षा करिबे ॥ ४० ॥ एइ पूर्व्वकथित- रूप यत्न लइया सैन्य सन्निवेश करिबे, इहार शुभाशुभ निमित्त लक्ष्य करिबे एवं शत्रुपक्षेरओ एइ समुदय निपुण भावे देखिबे। अनन्तर यखन कोन- दिकेइ अशुभ देखा याइबे ना, तखन विग्रह करिबे ॥ ४१ ॥ इति कामन्दकीय- नीतिसारे स्कन्धावार-निवेशन ओ निमित्तज्ञान नामक सप्तदश-सर्ग ॥ ——— अष्टादश-सर्ग * उपायविकल्प । महाबुद्धिशाली राजा सहायसम्पन्न हइया ( पाठान्तरे—सत्त्व-सम्पन्न ओ दैवबले बलीयान हइया ) उद्योग ओ अध्यवसाय सहकारे शत्रुर प्रति उपाय समुदय प्रयोग करिबेन ॥ १ ॥ उत्तम-मन्त्रशक्ति-सम्पन्न राजा चतुरङ्गसैन्य परिहार करिया कोष ओ मन्त्र द्वारा युद्ध करिबेन। अग्रे मन्त्रद्वारा परे कोषद्वारा ( अर्थात् प्रथम साम ओ भेदद्वारा शत्रुके वशीभूत करिबेन, यदि उहा द्वारा शत्रु
- कलिकाता संस्करणे इहा सप्तदशसर्ग ॥