कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
पृष्ठ 26, कुल 164 में से
संदर्भ में पढ़ें२य सर्ग ] वर्णाश्रमव्यवस्था। १५ करिबेन। विद्या लोकोपकारिणी एबং ইহার रक्षाकर्त्ता राजा ॥१६॥ महामति नरपति एइ सकल विद्याय़ निपुण हइले चतुर्व्वर्ग ( धर्म्म, अर्थ, काम, मोक्ष ), लाभ करेन ; एइ कारणे एइ समस्त विद्यार विद्यात्व जानिबे। कारण बिद् धातुर अर्थ ज्ञान ॥१७॥ वर्णाश्रमव्यवस्था। शास्त्रानुसारे यज्ञ वेदाध्ययन एबং दान एइ तिनटि ब्राह्मण, क्षत्रिय़ ओ वैश्यगणेर सनातन साधारण धर्म्म बलिय़ा कथित ॥१८॥ शुद्धभावे याजन ओ अध्यापना एबং विशुद्ध व्यक्तिर निकट हइते दान ग्रहण, एइ तिनटि ज्येष्ठवर्ण ब्राह्मणगणेर वृत्ति, इहाइ मुनिरा बलिय़ाछेन ॥१९॥ शस्त्रबले जीविका एबং प्रजावर्गेर सर्व्वतोभावे रक्षा करा राजार अर्थात् क्षत्रिय़ जातिर वृत्ति। पशुपालन, कृषि एबং पण्य इहाइ वैश्यगणेर वृत्ति बलिय़ा कथित ॥२०॥ द्विजातिगणेर आनुपूर्व्विक शुश्रूषाइ शूद्रेर धर्म्म ; आर कारुकर्म्म ओ चारण-कर्म्म ( स्तुतिपाठ ओ नटकर्म्म ) इहाइ ताहादिगेर विशुद्ध वृत्ति ॥२१॥ गुरुकुले बास, अग्निसेवा ( अग्निहोत्ररक्षा ), स्वाध्याय़ ( वेदाध्ययन ), व्रतधारण ( यम, नियम, अस्तेय़, अहिंसा ओ शौचेर अनुष्ठान ), त्रिकाल स्नान, भिक्षाबलम्बन एबং यावज्जीवन गुरुर निकट अबस्थान ; गुरुर अभाव हइले ऐभावे गुरुपुत्रेर निकट अबस्थान किंवा गुरुपुत्रेर अभावे बा अनुप- युक्तताप्रयुक्त निजेर न्याय़ समान ब्रह्मचर्य्यानुष्ठानकारीर निकट बास करिबे ; अथवा इच्छानुसारे [ ब्रह्मचर्य्य त्याग करिय़ा ] आश्रमान्तर अर्थात् गार्हस्थ्याश्रम ग्रहण करिबे, इहाइ ब्रह्मचारीर धर्म्म ॥२२-२३॥ अथवा सेइ ब्रह्मचारी ये पर्य्यन्त विद्याग्रहण ना हय़, ততদিন मेखला जटा-धारण अथवा दण्डी हइय़ा मस्तक-मुण्डन करिय़ा गुरुर आश्रये बास करिबे ; अथवा इच्छानुसारे गृहस्थाश्रमे गमन करिबे ॥२४॥ अग्निहोत्ररक्षा, स्ववर्णोचित कर्म्मद्वारा जीविकानिर्व्वाह, पर्व्व ( अष्टमी,