कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३य सर्ग ] आचारव्यवस्थापन। १९ हइया अविचारपूर्वक अल्पसार अर्थात् दुर्बल प्रजागणके पीड़ित करिते पारेन? ॥८॥ आधि (मनःपीडा) ओ व्याधिग्रस्त एवं अद्यइ हउक बा कल्लइ हउक याहा ध्वंसशील, एमन शरीरेर निमित्त कोन व्यक्ति धर्म- विगर्हित कार्य्य करिते प्रस्तुत हन? ॥९॥ आहार्य्य द्रव्य द्वारा अति कष्टे अल्पदिनेर जन्य शरीर हृष्टपुष्ट हय। इहाके छायामात्र अर्थात् असार एवं जलबिन्दुर न्याय अचिरस्थायी देखिबे ॥१०॥ प्रचण्ड पवनेर आघाते भङ्गुर मेघमालार न्याय विषय रूप-शत्रुगण कर्तृक কিরূপে महानुभव व्यक्तिगण आकृष्ट हइते पारेन? ॥११॥ देहधारिप्राणिगणेर जीवन जले प्रतिबिम्बित चन्द्रेर न्याय चपल। जीवनके एइरूप जानिया नित्य मङ्गलकर कार्य्येर अनुष्ठान करिबे ॥१२॥ क्षणभङ्गुर एइ जगत्के मृगतृष्णार तुल्य देखिया धर्मेर जन्य एवं सुखेर जन्य सज्जनगणेर सहित सङ्ग करिबे ॥१३॥ सुधाकरेर रश्मिजाले प्रासाद येरूप सुधालिप्तेर न्याय शोभा पाइया थाके, सेइरूप श्रीमान् व्यक्ति सज्जनगण कर्तृक सेवित हइया अतिशय दीप्ति पाइया थाकेन ॥१४॥ येरूप साधु लोकेर चेष्टा चित्तके आनन्दित करिते पारे, हिमांशुमाली चन्द्र एवं विकसित कमलिनीमालाय मण्डित सरोवरओ सेइरूप मनके आनन्दित करिते पारे ना ॥१५॥ निदाघकालीन सूर्य्यकिरणे सन्तप्त अतएव उद्वेगजनक एवं आश्रयशून्य मरुभूमिर न्याय दुष्ट लोकेर संश्रव वर्जन करिबे ॥१६॥ अनल येमन शुष्क वृक्षके दग्ध करे, सेइरूप दुर्जन सहसा शास्त्रज्ञ ओ सुशील व्यक्तिगणेर मध्ये प्रवेश करिया सर्व्वनाश साधन करे। अर्थात् छिद्रान्वेषी खल प्रथमे सद्ब्यवहार करिया साधुव्यक्तिर मन आकर्षण करे, शेषे अवसर बुझिया ताहाके असत् पथे चालित करिया ताहार ध्वंस साधन करे ॥१७॥ ये सकल सर्पेर निःश्वास अग्नि उद्गीरण करे एवं सेइ अग्निर धूम द्वारा ताहादेर मुख धूम्रवर्ण धारण करे, एइरूप भीषण सर्पेर सहित सङ्गओ बरं भाल तथापि दुर्जनगणेर सहित कदापि संसर्ग करिबे ना ॥१८॥