कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें৪র্থ সর্গ ] প্রকৃতি সম্পদ। ২৩ लोके ताहार आश्रय लइया थाके। सेइरूप कार्य्यइ कर्त्तव्य याहाते लोक अनुगत हय ॥९॥ ये नरपति आपनार हित कामना करेन तिनि विख्यात-वंश- सम्भूत, अक्रूर, लोक-संग्राहक ओ उपधাশुद्ध ( लोभेर परीक्षाय उत्तीर्ण ) व्यक्ति के परिवारेर अन्तर्गत करिबेन ॥१०॥ भूपति दुष्ट हइलेओ परिवारेर गुणे सेवा हइया थाके ; किन्तु परिवार दुष्ट हइले सर्प-वेष्टित वृक्षेर न्याय परित्याज्य हय ॥११॥ दुष्टचित्त सचिवगण सत्पथ अवरुद्ध करिया राजार सर्व्वनाश करे ; अतएव सुमन्त्रीर आवश्यक ॥१२॥ अतुल ऐश्वर्य्य लाभ करिया साधुव्यक्तिदिगेर प्रतिपालन करिबे। ये ऐश्वर्य्ये साधुगण प्रतिपालित हय ना से ऐश्वर्य्य वृथा ॥१३॥ असाधु लोकेर धनसम्पत्ति असाधु लोकेइ भोग करे। येमन किम्पाक वृक्षेर अर्थात् माकाल गाछेर फल काकेइ खाय अन्य पक्षीरा खाय ना ॥१४॥ * यिनि वक्ता, प्रगल्भ, स्मृतिशक्तिसम्पन्न, उदग्र अर्थात् अन्येर काछे नीचु हन ना, बलवान्, जितेन्द्रिय, दण्डेर ( सैन्येर ) नेता, निपुण, कृतविद्य, स्ववग्रह ( अर्थात् भ्रमवशतः अकार्य्ये प्रवृत्त हइयाओ ताहा हइते अनायासेइ निवृत्त हइते सक्षम ), परेर अभियोग सह्य करिते समर्थ, सकल अनर्थेर प्रतीकार समर्थ, परच्छिद्रज्ञ, सन्धि-विग्रह-तत्त्वज्ञ, मन्त्र ओ ताहार प्रयोग गोपन राखिते समर्थ, देश ओ कालेर विभागवेत्ता, अर्थ समुदय बुझिया लइते समर्थ, अर्थेर व्यवहार समर्थ, लोक चिन्ते समर्थ, क्रोध-लोभ-भय-हिंसा-स्तम्भ ( कर्त्तव्यविमूढ़ता )-चापल्या-शून्य, पर- पीड़न-पैशुन्य ( परस्परेर भेदसाधन )-मात्सर्य्य ( परश्रीकातरता )-ईर्ष्या ( विद्वेष )-मिथ्या—एइ समुदयेर बहिर्भूत, वृद्धेर उपदेश-ग्रहणकारी, मिष्टभाषी, मधुर दर्शन, गुणानुरागी एवं मितव्ययी, ताँहार एइ वक्तृता प्रभृति आत्मगुण बलिया कथित हइयाछे ॥१५-१९॥ यिनि पूर्व्व कथित गुणसम्पन्न,
- एइ १४ श्लोकटि ट्राभङ्कुरेर संस्करणे नाइ।