भारतकोश
कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary

आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished164 पृष्ठ

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५म सर्ग ] अनुजीवीगणेर वृत्ति । ३५ राजार पार्श्ववर्ती अनुचरवर्ग मद्यपानेर आकुड़ा, वेश्या-नर्त्तकीर मज्लिस एवं पाशा बा जुयाखेलार आड्डाय अतिवाहित करिवार निर्दिष्ट समयादि निर्देश प्रभृति उपाय द्वारा प्रमत्त राजार चैतन्य सम्पादन करिबे ॥५१॥ अन्याय कार्य्ये आसक्त राजाके याहारा उपेक्षा करे सेइ अकृतज्ञ अनुजीवीगण राजार सहित विनष्ट हय ॥५२॥ हे देव ? हे नाथ ? आपनार जय हउक, आपनि आज्ञा करुन, आपनि दीर्घजीवी हउन, आदरपूर्वक एइरूप वाक्य प्रयोग करिया भृत्यगण राजार आदेश प्रतीक्षा करिया ताँहार उपासना करिबे ॥५३॥ स्वामीर चित्तेर अनुवर्त्तन करा अनुजीवीदिगेर सद् वृत्त, येहेतु निरन्तर अभिप्राय अनुसारे कार्य्य करिले राक्षसदिगकेओ वशीभूत करा याय ॥५४॥ बुद्धिमान् बलशाली ओ उद्योगी महात्मादिगेर कोन वस्तुइ दुर्लभ हय ना। प्रियवादी एवं छन्दानुवर्त्ती मानुषेर पृथिवीते केहइ पर हइते पारे ना ॥५५॥ अलस असन्तुष्ट (सत्त्वहीन—पाठान्तर) मूर्ख एवं अकर्म्मण्य व्यक्तिर सम्बन्धे जननीओ कोन वस्तु दिवार समय ताहार प्रति पराङ्मुखी अर्थात् स्नेहशून्य हन ॥५६॥ याहारा शूर, विद्वान् एवं स्वामीर चित्तानुवर्त्ती हइया सेवाकुशल हन विकासिनी राजसम्पत् ताहादेरइ भोग्या हइया थाके ॥५७॥ अप्रिय व्यापारओ पथ्य (हितकर) हइया थाके, इहाई वृद्धगणेर मत; वृद्धेर अनुशासन मानिया चलिले [ अप्रिय हइयाओ पुनःराय ] प्रीतिभाजन हइया थाके ॥५८॥ पृथिवीते मेघर न्याय राजा सकल प्राणिबर्गेरइ उपजीव्य हय; किन्तु राजा जीविकार उपायप्रद ना हइले शुष्क वृक्षके येमन पाखीरा त्याग करे सेइरूप प्राणिबर्गओ ऐ राजाके त्याग करिया थाके ॥५९॥ [लोक] कुल, जाति, (विद्या—पाठान्तर) एवं शौर्य्य ए सकल किछुइ गणना करे ना; दुर्लङ्घ्यइ हउक बा हीन जातिइ ( पाठान्तर—सज्जातिइ ) हउक, दातार प्रति लोक अनुरक्त हय ॥६०॥ लक्ष्मीइ एकमात्र लोकानुसरणेर कारण; लक्ष्मी-