भारतकोश
कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary

आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished164 पृष्ठ

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८म सर्ग ] प्रकृति सम्पत् । ५५ उच्छेद आशङ्काय बलवान् कर्तृक निगृहीत हइयाछे एइरूप कष्टे पतित शत्रुर अपचय करिबैन। (पाठान्तरे—विजिगीषु आपनार उच्छेदेर आशङ्काय बलवान् कर्तृक निगृहीत एवं कष्टे पतित शत्रुर उपचय अर्थात् ताहार पृष्ठपोषण करिया ताहारके रक्षा करिबैन। तात्पर्य्य एइ ये अन्य बलवान् राजा यखन पार्श्ववर्त्ती शत्रुक़े ध्वंस करिते आरम्भ करियाछे तखन ओइ शत्रुक़े रक्षा करा आवश्यक, केनना, ओइ बलवान् राजा शत्रु-राज्य-ग्रहण करिते पारिलेइ एइ विजिगीषुर राज्य आक्रमण करिबे, एइ भये एखाने शत्रुरओ साहाय्य करिते हइबे) ॥६४॥ * विजिगीषु ये शत्रुर उच्छेद करिले अन्यान्य नूतन शत्रु जन्माय सेइ नूतन शत्रुर उच्छेद करिबैन ना; एइ नूतन शत्रुक़े निजेर अधीन करिया राखिबैन। इहार तात्पर्य्य एइ ये, विजिगीषु भूम्यनन्तर शत्रुर राजत्व ग्रहण करिले पूर्वे विजिगीषुर ये स्वाभाविक मित्र छिल अर्थात् शत्रुर ये भूम्यनन्तर शत्रु छिल सेइ राजा एखन विजिगीषुर भूम्यनन्तर हओयाय स्वाभाविक शत्रुर स्थान ग्रहण करिल, सुतरां एइ नूतन शत्रुर सहित शत्रुता ना राखिया उहाके हस्तगत करिया राखिबैन ॥६५॥ वंशपरम्परागत शत्रु दुर्द्दमनीय हइले (पाठान्तरे— वशवर्त्ती शत्रु अन्येर साहाय्ये विद्रोही हइले) इहाके वशीभूत करिवार जन्य ताहार विपक्षे ताहारइ वंश्याय एकजनके दाँड़ कराइबैन ॥६६॥ विष विष द्वाराइ प्रशमित हय, हीरकेर द्वारा हीरकेर छिद्र करा याय एवं परीक्षित सामर्थ्यसम्पन्न गजेन्द्र द्वाराइ अन्य गजेन्द्र নিহত हय ॥६७॥ मत्स्य मत्स्यकेइ खाइया फेले, सेइरूप ज्ञाति ज्ञातिके निश्चयइ नष्ट करे, देखा याय राम रावणके बध करिवार जन्य विभीषणके सम्मान प्रदान करियाछिलेन ॥६८॥ ये कार्य्य करिले मण्डलेर क्षोभ उपस्थित हय, बुद्धिमान् राजा ताहा करिबैन ना, किन्तु प्रकृतिर अनुरञ्जन करिबैन ॥६९॥ साम दान ओ मान द्वारा आत्मीय प्रकृतिर अनुरञ्जन करिबैन एवं भेद ओ दण्ड प्रयोगे परकीय अर्थात् शत्रु ओ शत्रु-प्रकृतिर भेद-सम्पादन करिबैन ॥७०॥

  • टुभाटुरेर संस्करणेर एइ पाठान्तरइ समीचीन।