कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ कामन्दकीय नीतिसार। सहजशत्रु ओ कार्य्यजशत्रु, एइ दुइ प्रकार शत्रु हय़। स्वकुलोत्पन्न शत्रुकेइ सहज-शत्रु बले—एतद्भिन्न ये शत्रु हय़, ताहार नाम कार्य्यज-शत्रु ॥२६॥ उच्छेद, अपचय़, पीड़न एबं कर्षण—एइ चारि प्रकार ब्यबहार शत्रु-विषय़े आछे, इहा नीतिशास्त्र-बेत्तारा बलिय़ा थाकेन ॥२७॥ समस्त प्रकृतिर नाशकेइ उच्छेद कहे। योग्य-पुरुषगणके नष्ट कराकेइ पण्डितगण अपचय़ कहेन ॥२७ क *॥ पण्डितेरा कोष रिक्त करा, दण्डसामर्थ्ये़र हानि करा • एबं प्रधान मन्त्रीर बध कराकेइ कर्षण कहेन। एतद्भिन्न अनिष्ट-साधनके पीड़न कहेन ॥२८॥ शत्रु यखन आश्रय़बिहीन (प्रबल पृष्ठपोषक-बिहीन) हय़ अथवा दुर्ब्बलके आश्रय़ करे एइरूप अवस्थाय़ ऐ शत्रु सम्पद्युक्त हइलेओ उच्छेद-योग्य हय़ ॥५९॥ निजेकेइ आश्रय़ बलिय़ा मने करे एमन आश्रय़ाभिमानीके काले (अर्थात् सुयोग बुझिय़ा) कर्षण ओ पीड़न करिबेन। बास्तविक आश्रय़ बलिते दुर्ग अथवा साधु-सम्मत-मित्र। फलतः आश्रय़ाभिमानी निराश्रय़ ॥६०॥ सकल तन्त्रेर अपहारी बलिय़ा बिभीषणेर सहजशत्रु सहोदर रावण एबं सूर्य्यपुत्र सुग्रीबेर सहजशत्रु सहोदर बाली उच्छेद हइय़ाछिल। सेइरूप सर्व्वतन्त्र हरण करिले निजशत्रु (अर्थात् सहज ज्ञातिशत्रु) उच्छेदयोग्य हय़ ॥६१॥ सहजशत्रु छिद्र, मर्म्म, (पाठान्तरे—कर्म्म) ओ वीर्य्य (बल) (पाठान्तरे—वित्त) जाने; अतएब अन्तर्गत अग्नि येमन शुष्क वृक्षके दग्ध करे सेइरूप समस्त वृत्तान्त अबगत बलिय़ा सहजशत्रु सर्व्वनाश साधन करे ॥६२॥ ये मित्र शत्रुरओ मित्र एबं बिजिगीषुरओ मित्र, एइरूप उभय़ात्मक मित्र यदि [उदासीनभाबे ना थाकिय़ा] शत्रुर पक्षपातित्व करे, ताहा हइले इन्द्र येमन त्रिशिराके सत्वर हइय़ा बध करिय़ाछिल सेइरूप बिजिगीषुओ एइ पक्षपाती मित्रके शीघ्रइ बिनष्ट करिबेन (१) ॥६३॥ *। बिजिगीषु आपनार
- २७ क श्लोकटि टुभाङ्कुर संस्करणे अतिरिक्त आछे। (उहाते ६० संख्या) (१) एइ श्लोकटि टुभाङ्कुर संस्करणे ७५ संख्यक श्लोक।