कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ कामन्दकीय नीतिसार। आश्रितव्यक्ति आश्रयदाताके गुरुर न्याय मान्य करिया विनीतभावे ताँहार निकट काल अतिवाहित करिबे एवं ताँहार आश्रये थाकिया सबल हइया क्रमशः स्वाधीन हइबे ॥२९॥ यदि कोन बलवानेर आश्रय ना पाऒया याय ताहा हइले आश्रय शून्य हइया ऐ आक्रमणकारीके सैन्य अथवा अर्थ किंवा उर्व्वरा भूमि अर्पण करिया, ताँहार आश्रय ग्रहण करिबे अर्थात् ताँहार सहित सन्धि करिबे ॥३०॥ विपन्न हइया निजेर परित्राणेर जन्य समस्तइ अर्पण करिबे; केनना, जीवित थाकिले युधिष्ठिरेर न्याय पुनःराय राजत्व लाभ हय ॥३१॥ आश्रितव्यक्ति निजेर सम्पूर्ण बलाधान हइले आश्रयत्याग करिबे। अथवा आश्रयदाता-शत्रुर व्यसन उपस्थित हइले ताँहार आश्रय त्याग करिबे। अथवा अत्यन्त बलवती सिंह-वृत्ति अवलम्बन करिया ताँहाके (आश्रयदाताके) प्रहार करिबे। अथवा समय पाइया उत्थित हइया आश्रयदाता-शत्रुके प्रहार करिबे ॥३२॥ कारण ना घटिले बलवान् समबल वा दुर्ब्बलेर सहित सङ्ग करिबे ना; केनना, ताहाते क्षय व्यय विश्वास वा हिंसा जनित दोष जन्माय ॥३३॥ कारण- वशतः संश्रय-ग्रहण करिया पिताकेओ विश्वास करिबे ना, कारण विश्वासकारी साधु व्यक्तिকে असाधुगण प्रायइ मारिवार चेष्टा करे ॥३४॥ एइ ये सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध ओ संश्रय—एइ छयटि गुणेर कथा बला हइल, अन्य पण्डितेरा एइगुलिके सन्धि ओ विग्रह एइ दुइटि गुणेर अन्तर्गत करिया थाकेन। पण्डितेरा यान ओ आसनके विग्रहेर रूपान्तर बलिया निर्द्देश करेन ॥३५॥ सङ्क्षिप्त पण्डितगणेर मते द्वैधीभाव ओ संश्रय एइ दुइटि सन्धिरइ रूपान्तरमात्र; येहेतु विजिगीषु व्यक्ति अभियान वा आसन-ग्रहण करिया विग्रहइ करेन ॥३६॥ एवं द्वादश सर्ग आरम्भ करिया १-७ पर्य्यन्त ओ आरऒ एकटि श्लोक याहा बन्धनीर मध्ये ८म संख्यक श्लोकेर उपरे धरियाछे ताहा। कलिकोता संस्करणे नाइ। कलिकोता संस्करणे याहा एकादश सर्ग ताहा टुभाकर संस्करणे एकादश ओ द्वादश सर्ग किन्तु टुभाकुरेर ११श सर्गेर २९ श्लोक हइते द्वादश सर्गेर ८म श्लोकेर उपर पर्य्यन्त श्लोकगुलि कलिकोता संस्करणे नाइ।