कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें৮६ कामन्दकीय नीतिसार। अकुद्रता ओ दक्षता कीर्त्तन ( पाठान्तरे—प्रदर्शन ) करिबे ॥१५॥ निद्रित बा माताल अवस्थाय मनेर भाव प्रकाश हइते पारे, अतएव प्रत्यह एकाकी निद्रा याइबे, स्त्रीप्रसङ्ग ओ मादकद्रव्य परित्याग करिबे * ॥१६॥ बुद्धिमान् व्यक्ति ( विपक्ष-राज्ये थाकिया ) समय नष्ट हइतेछे इहा जानियाओ स्वार्थ- सिद्धिर जन्य खेद करिबे ना, [ विपक्ष ] नाना रकम प्रलोभन द्वारा ताहार ये समय नष्ट करितेछे তাহা बुझिबे ॥१७॥ [ एवम् इहाओ बुझिबे ये ] एइ ये दिनगुलि अतिवाहित हइतेछे इहाते आमादेर राजार कोन व्यसन इहारा देखितेछे अथवा निजेराइ कोन विपद् घटाइबार चेष्टा करितेछे ॥१८॥ अथवा नीति-सुचतुर दूत इहाओ बुझिबे ये विपक्षगण ताहार राजार अन्तःप्रकोप उत्पादनेर चेष्टाय आछे किंवा दुर्गे विपक्षेरा निजेदेर रसद संग्रह करितेछे अथवा दुर्ग-संस्कारे नियुक्त आछे ॥१९॥ अथवा विपक्ष राजा ताहार निजेर मित्रेर अभ्युदय आकाङ्खाय देश-काल-विवेचना करितेछे किंवा सैन्य-साहाय्येर चेष्टाय आछे, ( सम्भवतः ) एइ सकल कारणेइ ताहारदिगके फिरिया याइते दितेछे ना ॥२०॥ एइ विपक्ष स्वपक्षेर यात्रा ओ कालेर यथोपयुक्त क्रियार जन्य ( पाठान्तरे—आमादिगेर यात्राकालेर क्षय प्रार्थी हइया ) विलम्ब करितेछे। पण्डित-दूत काल- क्षय हइले ঐ पूर्व्वोक्त समुदायेर वितर्क करिबे ॥२१॥ विशेष वृत्तान्त जानिबार जन्य शत्रुराज्ये थाकिया समस्त वृत्तान्त प्रभुके जानाइबे एवम् कार्य्यकाल अतिक्रान्त हइयाछे इहा स्पष्ट बुझिया चलिया आसिबे ॥२२॥ शत्रुर के शत्रु ताहार ज्ञान, शत्रुर सुहृद् ओ बन्धुर भेद संघटन, शत्रुर दुर्ग कोष ओ बल ज्ञान, शत्रुर अमात्यदिगके स्वपक्षे आनयन, शत्रुर राष्ट्रपाल बन- पाल ओ अन्तपालदिगके वशीभूत करा एवम् युद्धेर अपसार भूमिज्ञान ( अर्थात् युद्धकालेर जन्य रास्ता-घाट ज्ञान ओ सैन्यादि समावेशेर एवम् निर्गमेर उपयुक्त भूमि निर्णय) एइगुलि दूतेर कर्म्म बलिया कथित हय ॥२३-२४॥
- एइ श्लोकटि कलिकाता संस्करणे नाइ ॥