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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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८८ कंब रामायण

दशरथ ने त्वरित ही पुत्र-प्राप्ति के निमित्त-भूत यज्ञ के लिए आवश्यक सब पदार्थ संगृहीत करा दिये। महान् तपस्वी (ऋष्यशृंग) ने पुत्रकामेष्टि-यज्ञ सम्पन्न किया। उस यागाग्नि से भूतगण का नायक महाभूत, प्रकाशमान सुन्दर थाल में अमृत-तुल्य श्वेत खीर लेकर निकला।

गुणों में अपना उपमान न रखनेवाले दशरथ ने वेदों के तत्त्वज्ञ ऋष्यशृंग की आज्ञा से स्वर्णपात्र-सहित उस अन्न को क्रमशः रमणीय ललाट-युक्त अपनी तीनों पत्नियों को चार भागों में बाँटकर दिया।

महान् पापों के पाप के कारण तथा अनन्त वेदों में कथित धर्मों के धर्म (पुण्य) के कारण, अरुण अधरवाली कौशल्या ने इस नीलसमुद्र (राम) को जन्म दिया, जिसके विशाल हस्त में 'कटक' (आभरण) भूषित हैं तथा जिसका सुन्दर रूप चित्र में अंकित करने में असम्भव है।

केकय-नरेश की पुत्री (कैकेयी) ने भरत नामक पुत्र को जन्म दिया, जो अनिवार्य नीतिधर्म-रूपी अनुपम नदियों के द्वारा भरा गया गंभीर समुद्र है, अनिन्दनीय सद्गुण-संपन्न है और सौन्दर्य में भी इस (रामचन्द्र) की समता करनेवाला है।

इन दोनों रानियों में कनिष्ठा (सुमित्रा) ने दो पुत्रों (लक्ष्मण और शत्रुघ्न) को जन्म दिया जो अपूर्व शक्ति-संपन्न हैं तथा धर्मघाती असुरों को भी कँपा देनेवाले हैं। स्वर्णमय मेरु और उन्नत रजतमय हिमाचल, दोनों यदि धनुष धारण करके खड़े हों, तो उन दोनों कुमारों की समानता कर सकेंगे।

चतुर्वेदों के तुल्य वे चारों कुमार सभी विषयों के परिज्ञान में सरस्वती से भी बढ़-कर हैं। धनुर्विद्या में ऐसे हैं कि स्वयं धनुर्वेद भी उनसे परास्त होकर, उनके वशीभूत शत्रु के समान उनकी सेवा में निरत रहता है। वे (चारों बालक) राका-चन्द्र के उदय-काल में आनन्द-घोष के साथ उमड़नेवाले तरंगपूर्ण समुद्र के जैसे बढ़ते रहे हैं।

शत्रुओं का विनाश हो जाने से अब कोश में रखे हुए दीर्घ शूलवाले (हे जनक)! ये दोनों नाममात्र से उस दशरथ के कुमार हैं, जो (दशरथ) कर देनेवाले सभी नरेशों के द्वारा वन्दित तथा वीर-वलयधारी चरणवाले हैं और जो अत्यन्त क्षमाशील हैं। वस्तुतः, इनका उपनयन-संस्कार करके वेदों की शिक्षा देकर इन्हें पालनेवाले वसिष्ठ ही हैं।

मैंने सोचा कि मेरे यज्ञ में अधिक विघ्न उपस्थित करनेवाले अत्याचारी राक्षसों को इन दोनों कुमारों के द्वारा मैं मिटा दूँगा। ज्योंही मैं इन पुष्पकोमल चरणवाले सुकुमार कुमारों को लेकर अरण्य में गया, त्योंही असह्य शक्तिशालिनी ताड़का नामक राक्षसी स्वयं सामने आ गई।

हे राजन्! तरंगायित समुद्र जैसे इस श्यामल पुरुष-श्रेष्ठ की इन दीर्घ तथा पुष्ट नील भुजाओं का बल भी तो तुम देखो। इसका एक बाण, युद्ध-रंग में लाल-लाल अग्निवर्षा करनेवाले नयनोंवाली उस ताड़का का हृदय चीरकर, पर्वत को भेदकर, वृक्षों को काटकर, पृथ्वी को चीरता हुआ चला गया।

गगन के रंगवाले तथा आग की लपटों के जैसे बालों से भरे हुए, जलते हुए-से