कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 99, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ८७
में कर लिया था । उसने वेदोक्त विधान से एक सौ दुष्कर यज्ञ सम्पन्न किये थे, जिससे देवेन्द्र भी सकट में पड़ गया था । (कुछ विद्वानो का कहना है कि इसमे वर्णित नरेश 'नहुष' है ।)
इस वंश मे कोई एक ऐसा नरेश हुआ था, जिसने चन्द्र को जीता था, किसी ने रुद्र को परास्त किया था, किसी ने बाण से धुँढ¹ नामक असुर को मारा था और रघु नामक राजा ने इन्द्र को परास्त करके आगे की दिशाओ पर विजय प्राप्त की थी ।
इस वश के अज नामक राजा ने अपने धनु-रूपी मदरपवत को मथनी बनाकर शत्रुराजकुल-रूपी समुद्र का मंथन किया था और मल्लयुद्ध मे कुशल उम राजा ने ज्योतिमंय मंदहास से शोभायमान इन्दुमती-रूपी लक्ष्मी देवी को. अपने कंधे का उसी प्रकार आभरण बनाया था,
जिस प्रकार अंधकार-ममान वर्णवाले विष्णु ने ( लक्ष्मी को अपना आभरण ) बनाया था । विविध वाद्य-घोष से मुखरित राजद्वारवाले ( हे जनक ) ! ऐसा कोई नहीं है, जो अज महाराज के पुत्र दशरथ को नहीं जानता । उन दशरथ के ही ये दोनो पुत्र हैं। यदि चतुर्मुख ब्रह्मा भी इनकी महिमा का यथावत् वर्णन करने लगें, तो उन्हे भी ( इनकी महिमा का ) पार पाना कठिन है । फिर, भी मुझसे जहाँतक हो सकेगा, मै उसका वर्णन करूँगा ।
जाज्वल्यमान विष्णुचक्र-तुल्य सूर्य जिस प्रकार ओसकणो को परास्त करता है, उसी प्रकार वे दशरथ महाराज शत्रु-राजाओ को पराजित कर समस्त प्राणी-वर्ग के अविपन्न जीवन बिताने मे सहायक हुए हैं। अपने हाथ के धनुष के अतिरिक्त अन्य कोई उनका साथी नहीं है ( ऐसे पराक्रमी हैं वे ) । धर्म ही उनका कवच है । उन्होने अपनी नीति से स्वयं मनु को भी जीत लिया है । वे दशरथ सतानहीन होने के कारण बहुत दुःखी थे ।
फिर, दशरथ ने उस ऋष्यश्रृंग मुनीश्वर की सहायता से अपने दुःख से निस्तार पाना चाहा, जो पहले कभी धनुषाकार भाल, मधुरभाषी बिम्बाधर, काले और दीर्घ नयन, मूल्य पर दिये जानेवाले विशाल जघन, विद्युल्लता-सदृश विकंपित कटि से शोभायमान वेश्याओ को स्तन-रूपी शृ गवाले मृग समझकर उनपर मोहित हुए थे और अपने आश्रम को छोड़ उनके साथ ही ( रोमपाद के यहाँ ) आ गये थे ।
दशरथ ने ऋष्यश्रृंग के चरणो पर नत हो प्रार्थना की - ( हे मुनि ! ) मेरी तपो-हीनता के कारण, कंचुक-बद्ध स्तनवाली मेरी पत्नियो के पवित्र गर्भ से पुष्पालंकार के योग्य मस्तकवाले पुत्र उत्पन्न नही हुए हैं। अतः, आप मुझे ऐसे सत्पुत्र प्रदान करें, जो मेरे बाढ समुद्र से आवेष्टित इस धरणी का शासन कर सकें ।
ये वचन सुनकर ऋष्यश्रृंग ने कहा - मै तुम्हे ऐसे पुत्र प्रदान करूँगा, जो इस धरणी का ही नही, परन्तु सभी लोको की रक्षा अनायास ही कर सकेंगे । ( इसके लिए ) देवताओ के हविर्भाग प्राप्त करने योग्य यज्ञ करना चाहिए, उसके लिए आवश्यक वस्तुएँ सग्रह करो ।
१. गुरु-पत्नी का हरण करनेवाले चन्द्र को दिलीप ने परास्त किया था। स्कंदपुराण तथा सनत्कुमार-संहिता से विदित होता है कि भगीरथ ने अपने यागाश्व का हरण करनेवाले पशुमुख के साथ युद्ध करते हुए शिवजी को भी पराजित किया था और कुवलयाश्व नामक राजा ने उत्तंग महर्षि के शत्रु 'हुँढ' को मारा था ।—अनु०