कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें८६ कंब रामायण
असुरो से स्वर्ग की रक्षा करे । तब इन्द्र को अभयदान देकर वह नरेश हाथ मे धनुष-बाण लेकर गया था तथा असुरो को युद्ध मे हराया था । स्वय इन्द्र वृषभ का आकार लेकर (युद्ध मे) उस नरेश का वाहन बना था । (यह 'ककुत्स्थ' नामक इक्ष्वाकुकुल के राजा की कहानी है ।)
उस (ककुत्स्थ) महाराज के पश्चात् जो महान् व्यक्ति इस वंश में उत्पन्न हुए थे, उनका वर्णन करना मेरे लिए सभव नही है । इसी वश मे एक ऐसा नरेश उत्पन्न हुआ था, जिसने अपने पलित केशो, सकुचित चर्म तथा वार्द्धक्य को दूर कर दिया था। जिसने तरगो से शब्दायमान क्षीरसागर को बड़े पर्वत से मथकर अमृत निकाला था और देवेन्द्र को अमर बनाया था। उसकी कीर्त्ति शब्दो मे वर्णित नही हो सकती है। (इस पद्य में वर्णित राजा कौन है, यह मूल कथानक मे नहीं है।)
युद्ध समाप्त करके भाले को कोश मे ही रखनेवाले (हे जनक) । अब तुमसें युद्ध करने के लिए कोई सन्नद्ध नही है। इन राजकुमारो के ऐसे अनेक पूर्वज हुए हैं, जिनका आज्ञाचक्र त्रिभुवन मे चलता था और जिनमें असख्य श्रेष्ठ गुण थे। उनमें एक (मान्धाता) ने इस प्रकार शासन किया था कि सहज वैरी व्याघ्र तथा हिरण एक ही घाट पर जल पिया करते थे।
अनेक विजयी राजाओ के द्वारा वदित चरणवाले (हे जनक) ! सहनशील देवता और दानव एक बार युद्ध करने लगे थे, तब इन्ही के वंशज एक नरेश ने—जिसनं यथोक्त रीति से अपने राज्य पर अभिषिक्त होकर उसके चिह्नभूत रत्न-किरीट तथा हार धारण किये थे—प्रकाशमान धनुष धारण करके, धर्मदेवता के समान एकाकी सचरण करता हुआ अमरावती की रक्षा की थी। (यह कदाचित् 'मुचुकुंद' नामक राजा हैं।)
हे विद्युत्-सदृश ज्योतियुक्त दीर्घशूलधारी (जनक) ! इस वश के राजाओ की, जो सौन्दर्यवर्धक वीरककण धारण करनेवाले थे और जो सब प्यारे प्राणियो के प्राण-समान रहकर भूलोक पर शासन करत थे, हम क्या प्रशसा कर सकते हैं ? इन्ही में से एक (शिवि) ने एक पक्षी के प्राणी के बदले मे अपने प्राण दे दिये थे।
शत्रु-नरेशो के शरीर भेदनेवाले शूलधारी, हे नृपवर ! इस वश के नरेशो ने (एकबार अश्वमेध अश्व के खो जाने पर) बडे-बडे पर्वतो को रास्ते के रोड़ों के समान उडा दिया था। इस भूलोक को एक ऊँचा टीला बनाते हुए लवण-जल से भरे सागर को खोदा था। इनकी महिमा को जताने के लिए और क्या कहे ? (यह सगर-कुमारो से संबद्ध घटना है।)
हे (शत्रुओं के) मास-सिक्त कातिवाले शूल को धारण करनेवाले। जब अनतशेष ही इस वंश के महत्त्व का बखान नहीं कर सकते हैं तो क्या यह मेरे लिए सुलभ हो सकता है ? पुष्प-भूषित शिवजी के मस्तक पर जो पवित्र गगा आकर ठहरी थी, उसे स्वर्ग से भूतल पर ले आनेवाला नरेश भी इसी वंश में उत्पन्न हुआ था।
कलक-रहित पूर्णचन्द्र-समान उज्ज्वल दंतच्छत्रधारी (हे जनक) ! इस वश के एक नरेश ने जलचरो से भरे सागर से घिरी हुई धरती को हस्तामलक के समान अपने वश