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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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बालकाण्ड ८५

वाले अपने प्रासाद मे आये । (वहाँ) रत्नखचित उन्नत मंडप मे आसीन हुए तथा उनके पार्श्व मे महातपस्वी (विश्वामित्र) सुन्दर विजयमाला धारण किये हुए धनुर्हस्त (रामचन्द्र) और उनके अनुज (लक्ष्मण) आसीन हुए।

जनक महाराज ने वहाँ पर आसीन उत्तमकुल चक्रवर्त्ती-कुमारो को ऐसे देखा, जैसे वे अपनी आँखों से उन दोनो के मुख-लावण्य को पी रहे हों। फिर, तपस्वी विश्वामित्र के सम्मुख सिर नवाकर प्रश्न किया—हे पूज्यपाद ! ये कौन हैं ? विश्वामित्र ने उत्तर दिया—ये दोनो कुमार महिमामय दशरथ के पुत्र हैं। तुम्हारे यज्ञ के दर्शनार्थ आये हैं। तुम्हारे धाम रहनेवाले शिव-धनुप को भी वे देखेंगे । फिर, वे उन दोनो कुमारो की महिमा का वखान करने लगे । (१-१५७)


अध्याय ११

वंश-महिमा-वर्णन

सूर्य के प्रथम पुत्र मनु को कौन नही जानता ? इन्हीं के वंश मे एक ऐसे नरेश (पृथु चक्रवर्त्ती) उत्पन्न हुआ था, जिसने सभी प्राणियो की भूख से बचाने के लिए अपने तेजस्वी धनुष की सहायता से धेनु-रूप धारण किये हुए पृथ्वी से दुग्ध प्राप्त किया था ।

नवरत्न-खचित मनोहरकिरीटधारी (हे जनक)! इसी वंश के एक दूसरे नरेश (इक्ष्वाकु) ने जगत् की व्याधियो तथा पापो को मिटाते हुए अनेक वर्ष-पर्यन्त ब्रह्मा की उपासना की थी और ब्रह्मा की कृपा से आदिशेष पर शयन करनेवाली उस परम ज्योति को हम जैसे लोगो के भी दर्शन का विषय बनाते हुए, मनोज्ञ श्रीरंगविमान¹-सहित उस परम ज्योति को (पृथ्वी पर) ला दिया था । उन महाराज को जो नही जानते, वे यज्ञ हैं ।

इन्ही कुमारो के वंश मे पहले एक दूसरा राजा उत्पन्न हुआ था । देवेन्द्र ने अपने शत्रु असुरो को पराजित करने मे असमर्थ हो, उस राजा से प्रार्थना की कि वह उन


¹ दक्षिण के श्रीरंगक्षेत्र के संबंध मे यह प्रसिद्ध है कि यहाँ का प्रणवाकार विमान जिसमें विष्णु भगवान् श्रीभूमिनायिका-समेत आदिशेष-शय्या पर लेटे हुए हैं, पहले सत्यलोक में ब्रह्मा के द्वारा पूजित था । वैवस्वत मनु की नासिका से उत्पन्न इक्ष्वाकु महाराज ने ब्रह्मा को अपनी तपस्या से संतुष्ट किया तथा उनसे श्रीरंगविमान को प्राप्त कर उसे भूलोक पर ले आये। इक्ष्वाकु से श्रीरामचन्द्र तक सूर्यवंश के सभी नरेशों ने (कुलदेव के रूप में) इसी श्रीरंगनाथ की पूजा की थी। रामायण की घटनाओं के पश्चात् जब विभीषण अयोध्या से लंका को लौट रहा था, तब रामचन्द्र ने विभीषण को अपने कुलदेव की मूर्ति और श्रीरंगविमान दिया था । विभीषण ने उस विमान को कावेरी की दो शाखाओं के मध्य रखकर विश्राम किया, फिर चलने के समय उसे उठाना चाहा, तो वह विमान उठा नहीं । तब विभीषण ने यह समझकर कि भगवान् की इच्छा वहाँ पर रहने की है, उसने उस विमान को वहाँ प्रतिष्ठापित कर दिया। श्रीरामानुजाचार्य के अनुयायी मानते हैं कि भूतल के १०८ विष्णु-क्षेत्रों मे श्रीरंगक्षेत्र सर्वश्रेष्ठ है । —अनु०