कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 96, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८४ | कंब रामायण |
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अपने प्रियतम चन्द्र के चले जाने पर उसकी प्रेयसी दिशा-नारियो ने मानो अपने शरीर पर लगे हुए मनोज्ञ श्वेतचन्दन रस को शोक के कारण पोछ दिया हो, त्योंही चन्द्र के अस्तङ्गत होते ही उसको चन्द्रिका भी अदृश्य हो गई।
सघन पुष्पहार को धारण करनेवाले पुरुषोत्तम ( श्रीरामचन्द्र ) जिस समय काम-पीडा से इस प्रकार व्याकुल हो रहे थे, उसी समय रक्तवर्ण उष्ण-किरण ( सूर्य ) व्याकुल-हृदय कमलिनी-रूपी अपनी प्रियतमा का मुख विकसित करता हुआ उदित हुआ, मानो लाल बिन्दियो से अलंकृत अंधकार-रूपी मत्तगज का चर्म धारण करनेवाले, उदय-पर्वत-रूपी रुद्र के भाल का अग्नि-नेत्र ही खुल गया हो।
उस महान् उदयाचल के समस्त शिखरो पर बालसूर्य की अरुण-किरणें फैल गइ, मानो सूर्य के अति वेगवान् तथा शक्तिशाली हरे रग के घोडो के खुरो से उड़ी हुई धूलि ही उदयाचल पर फैल रही हो और अर्घ्य-प्रदान के लिए द्विजो के हाथ मे लिये हुए मधुसंचित पुष्प तथा जल के प्रवाह से वह धूलि सिक्त हो रही हो (अथवा) मानो उष्ण-किरण ( सूर्य ) प्राची ( रूपी ) दिग्गज ( के मस्तक ) पर सिदूर का तिलक लगा रहा हो।
जिस प्रकार शत्रु की विजय करने या धन कमाने के लिए दूर देशो में गये हुए प्राण-समान अपने प्रिय पति को सुन्दर रथो पर चढ़कर वापस लौटते हुए देखकर साध्वी पत्नियो के मन आनन्द से भर जाते हैं और उनकी कांति लौट आती है, उसी प्रकार कमलिनी-कुल के मुख विकसित हुए। उन कमलो के कारण सरोवर भी सौंदर्य ने संपन्न हो गये।
आकाश-रूपी रंगमंच पर असंख्य वेदो-सहित किन्नरो के गाते हुए, सभी लोको द्वारा स्तोत्र-पाठ होते हुए, देवो, मुनियो तथा ब्राह्मणो के हाथ जोडकर नमस्कार करते हुए एव सागर-रूपी गर्जन करनेवाले ‘मर्दल’^१ के बजते हुए, सूर्य की किरणें चारो ओर फैल गईं, मानो उज्ज्वल सूर्य-रूपी ललाट-नेत्र से सुशोभित रुद्र ही नृत्य कर रहा हो ओर उसकी लाल जटाएँ चारो ओर बिखरी हो।
विनाशकारी चक्रायुध को त्यागकर अनुपम वर्त्तुल तथा दृढ धनुष को धारण करने-वाले श्यामल (रामचन्द्र) जो सहस्रफन (आदिशेष) के सहस्र माणिक्य-दीपो से जाज्वल्यमान शेष-शय्या का त्याग कर अब वियोग-रूपी गभीर समुद्र मे लेटे हुए थे। एक चक्र-रथवाला सूर्य जब अपने कोमल करो से उनके चरण धीरे-धीरे सहलाने लगा, तव वे व्याकुल निद्रा का त्याग कर उठे और रात्रि-रूपी समुद्र के तट पर पहुँचे।
वह रजनी भी ऐसी बीती, मानो एक कल्प व्यतीत हुआ हो। निद्रा से उठकर मत्तगज के समान वे नित्य-कर्म से निवृत्त हुए। फिर, श्रुति-सदृश महातपस्वी ( विश्वामित्र ) के चरणो पर नत हुए। तब वे अपने प्रिय भाई लक्ष्मण को साथ लेकर सुगन्धित पुष्पहार तथा रत्न-किरीट से अलंकृत जनक महाराज की बड़ी यज्ञशाला मे जा पहुँचे।
उन जनक महाराज ने क्रमानुसार वेदोक्त यज्ञकर्म को सपन्न किया। चारो ओर मेघ-गर्जन जैसे नगाड़ो के बजते समय, इन्द्र के समान वे चल पडे और चन्द्रमंडल को छूने-
^१ मर्दल, एक प्रकार का ढोल या नगाड़ा।