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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

बालकाण्ड ८७

में कर लिया था । उसने वेदोक्त विधान से एक सौ दुष्कर यज्ञ सम्पन्न किये थे, जिससे देवेन्द्र भी सकट में पड़ गया था । (कुछ विद्वानो का कहना है कि इसमे वर्णित नरेश 'नहुष' है ।)

इस वंश मे कोई एक ऐसा नरेश हुआ था, जिसने चन्द्र को जीता था, किसी ने रुद्र को परास्त किया था, किसी ने बाण से धुँढ¹ नामक असुर को मारा था और रघु नामक राजा ने इन्द्र को परास्त करके आगे की दिशाओ पर विजय प्राप्त की थी ।

इस वश के अज नामक राजा ने अपने धनु-रूपी मदरपवत को मथनी बनाकर शत्रुराजकुल-रूपी समुद्र का मंथन किया था और मल्लयुद्ध मे कुशल उम राजा ने ज्योतिमंय मंदहास से शोभायमान इन्दुमती-रूपी लक्ष्मी देवी को. अपने कंधे का उसी प्रकार आभरण बनाया था,

जिस प्रकार अंधकार-ममान वर्णवाले विष्णु ने ( लक्ष्मी को अपना आभरण ) बनाया था । विविध वाद्य-घोष से मुखरित राजद्वारवाले ( हे जनक ) ! ऐसा कोई नहीं है, जो अज महाराज के पुत्र दशरथ को नहीं जानता । उन दशरथ के ही ये दोनो पुत्र हैं। यदि चतुर्मुख ब्रह्मा भी इनकी महिमा का यथावत् वर्णन करने लगें, तो उन्हे भी ( इनकी महिमा का ) पार पाना कठिन है । फिर, भी मुझसे जहाँतक हो सकेगा, मै उसका वर्णन करूँगा ।

जाज्वल्यमान विष्णुचक्र-तुल्य सूर्य जिस प्रकार ओसकणो को परास्त करता है, उसी प्रकार वे दशरथ महाराज शत्रु-राजाओ को पराजित कर समस्त प्राणी-वर्ग के अविपन्न जीवन बिताने मे सहायक हुए हैं। अपने हाथ के धनुष के अतिरिक्त अन्य कोई उनका साथी नहीं है ( ऐसे पराक्रमी हैं वे ) । धर्म ही उनका कवच है । उन्होने अपनी नीति से स्वयं मनु को भी जीत लिया है । वे दशरथ सतानहीन होने के कारण बहुत दुःखी थे ।

फिर, दशरथ ने उस ऋष्यश्रृंग मुनीश्वर की सहायता से अपने दुःख से निस्तार पाना चाहा, जो पहले कभी धनुषाकार भाल, मधुरभाषी बिम्बाधर, काले और दीर्घ नयन, मूल्य पर दिये जानेवाले विशाल जघन, विद्युल्लता-सदृश विकंपित कटि से शोभायमान वेश्याओ को स्तन-रूपी शृ गवाले मृग समझकर उनपर मोहित हुए थे और अपने आश्रम को छोड़ उनके साथ ही ( रोमपाद के यहाँ ) आ गये थे ।

दशरथ ने ऋष्यश्रृंग के चरणो पर नत हो प्रार्थना की - ( हे मुनि ! ) मेरी तपो-हीनता के कारण, कंचुक-बद्ध स्तनवाली मेरी पत्नियो के पवित्र गर्भ से पुष्पालंकार के योग्य मस्तकवाले पुत्र उत्पन्न नही हुए हैं। अतः, आप मुझे ऐसे सत्पुत्र प्रदान करें, जो मेरे बाढ समुद्र से आवेष्टित इस धरणी का शासन कर सकें ।

ये वचन सुनकर ऋष्यश्रृंग ने कहा - मै तुम्हे ऐसे पुत्र प्रदान करूँगा, जो इस धरणी का ही नही, परन्तु सभी लोको की रक्षा अनायास ही कर सकेंगे । ( इसके लिए ) देवताओ के हविर्भाग प्राप्त करने योग्य यज्ञ करना चाहिए, उसके लिए आवश्यक वस्तुएँ सग्रह करो ।


१. गुरु-पत्नी का हरण करनेवाले चन्द्र को दिलीप ने परास्त किया था। स्कंदपुराण तथा सनत्कुमार-संहिता से विदित होता है कि भगीरथ ने अपने यागाश्व का हरण करनेवाले पशुमुख के साथ युद्ध करते हुए शिवजी को भी पराजित किया था और कुवलयाश्व नामक राजा ने उत्तंग महर्षि के शत्रु 'हुँढ' को मारा था ।—अनु०

८८ कंब रामायण

दशरथ ने त्वरित ही पुत्र-प्राप्ति के निमित्त-भूत यज्ञ के लिए आवश्यक सब पदार्थ संगृहीत करा दिये। महान् तपस्वी (ऋष्यशृंग) ने पुत्रकामेष्टि-यज्ञ सम्पन्न किया। उस यागाग्नि से भूतगण का नायक महाभूत, प्रकाशमान सुन्दर थाल में अमृत-तुल्य श्वेत खीर लेकर निकला।

गुणों में अपना उपमान न रखनेवाले दशरथ ने वेदों के तत्त्वज्ञ ऋष्यशृंग की आज्ञा से स्वर्णपात्र-सहित उस अन्न को क्रमशः रमणीय ललाट-युक्त अपनी तीनों पत्नियों को चार भागों में बाँटकर दिया।

महान् पापों के पाप के कारण तथा अनन्त वेदों में कथित धर्मों के धर्म (पुण्य) के कारण, अरुण अधरवाली कौशल्या ने इस नीलसमुद्र (राम) को जन्म दिया, जिसके विशाल हस्त में 'कटक' (आभरण) भूषित हैं तथा जिसका सुन्दर रूप चित्र में अंकित करने में असम्भव है।

केकय-नरेश की पुत्री (कैकेयी) ने भरत नामक पुत्र को जन्म दिया, जो अनिवार्य नीतिधर्म-रूपी अनुपम नदियों के द्वारा भरा गया गंभीर समुद्र है, अनिन्दनीय सद्गुण-संपन्न है और सौन्दर्य में भी इस (रामचन्द्र) की समता करनेवाला है।

इन दोनों रानियों में कनिष्ठा (सुमित्रा) ने दो पुत्रों (लक्ष्मण और शत्रुघ्न) को जन्म दिया जो अपूर्व शक्ति-संपन्न हैं तथा धर्मघाती असुरों को भी कँपा देनेवाले हैं। स्वर्णमय मेरु और उन्नत रजतमय हिमाचल, दोनों यदि धनुष धारण करके खड़े हों, तो उन दोनों कुमारों की समानता कर सकेंगे।

चतुर्वेदों के तुल्य वे चारों कुमार सभी विषयों के परिज्ञान में सरस्वती से भी बढ़-कर हैं। धनुर्विद्या में ऐसे हैं कि स्वयं धनुर्वेद भी उनसे परास्त होकर, उनके वशीभूत शत्रु के समान उनकी सेवा में निरत रहता है। वे (चारों बालक) राका-चन्द्र के उदय-काल में आनन्द-घोष के साथ उमड़नेवाले तरंगपूर्ण समुद्र के जैसे बढ़ते रहे हैं।

शत्रुओं का विनाश हो जाने से अब कोश में रखे हुए दीर्घ शूलवाले (हे जनक)! ये दोनों नाममात्र से उस दशरथ के कुमार हैं, जो (दशरथ) कर देनेवाले सभी नरेशों के द्वारा वन्दित तथा वीर-वलयधारी चरणवाले हैं और जो अत्यन्त क्षमाशील हैं। वस्तुतः, इनका उपनयन-संस्कार करके वेदों की शिक्षा देकर इन्हें पालनेवाले वसिष्ठ ही हैं।

मैंने सोचा कि मेरे यज्ञ में अधिक विघ्न उपस्थित करनेवाले अत्याचारी राक्षसों को इन दोनों कुमारों के द्वारा मैं मिटा दूँगा। ज्योंही मैं इन पुष्पकोमल चरणवाले सुकुमार कुमारों को लेकर अरण्य में गया, त्योंही असह्य शक्तिशालिनी ताड़का नामक राक्षसी स्वयं सामने आ गई।

हे राजन्! तरंगायित समुद्र जैसे इस श्यामल पुरुष-श्रेष्ठ की इन दीर्घ तथा पुष्ट नील भुजाओं का बल भी तो तुम देखो। इसका एक बाण, युद्ध-रंग में लाल-लाल अग्निवर्षा करनेवाले नयनोंवाली उस ताड़का का हृदय चीरकर, पर्वत को भेदकर, वृक्षों को काटकर, पृथ्वी को चीरता हुआ चला गया।

गगन के रंगवाले तथा आग की लपटों के जैसे बालों से भरे हुए, जलते हुए-से

बालकाण्ड ८९

लगनेवाले (राक्षसों के) जो सिर कट-कटकर पर्वताकार गिरे, उनकी कोई गणना ही नहीं रही। उस ताड़का का एक पुत्र (सुबाहु) एक ही बाण से परलोक जा पहुँचा। दूसरा पुत्र (मारीच) कहाँ जा गिरा, उसका पता नहीं है। मैं अपना यज्ञ भी सम्पन्न करके अब यहाँ आ पहुँचा हूँ।

हे राजन्! यह जानो कि हम इनकी महिमा जानने में भी असमर्थ हैं। मैं अपनी तपस्या के फलस्वरूप इन्हें ऐसे अस्त्र प्राप्त करके दे सकता हूँ, जो समुद्र तथा पर्वत-सहित सारे संसार को जला सकते हैं। वे सभी अस्त्र इनकी आज्ञा के पालक दास बने हुए हैं।

इनके कमल-सदृश, वीर-वलय-भूषित चरण की रज ही गौतम की पत्नी को (शाप-मुक्त करके) पूर्वरूप प्रदान करनेवाली है। मुझे अपने प्राणों से भी बढ़कर इस श्यामल पर प्रेम है।

ऐसा है इस रामचन्द्र का दिव्य चरित तथा भुजबल—यों विश्वामित्र ने कहा।
(१-२६)


अध्याय १२

धनुर्भंग पटल

तब जनक ने विश्वामित्र के प्रति ये वचन कहे—आपको मैं क्या बताऊँ ? मैंने उस मायावी धनुष को प्रणबन्ध कर रखा है, जिससे मैं अब अपने इच्छानुसार कुछ नहीं कर सकता। मेरा मन (इस श्रीरामचन्द्र को देखकर, उसे सीता के योग्य वर समझकर और शिव-धनुष की बात स्मरण करके) अत्यन्त अधीर हो रहा है। यदि यह कुमार धनुष पर डोरी चढ़ा सके, तो मैं दुःख-सागर को पारकर जाऊँगा तथा मेरी पुत्री भी भाग्यवती होगी।

यों कहकर जनक ने अपने सम्मुख स्थित कुछ सेवकों को आदेश दिया कि पर्वत-सदृश उस धनुष को यहाँ ले आओ। 'यथाज्ञा' कहकर चार सेवक दौड़कर उस आयुधागार में गये, जहाँ स्वर्ण-वलयों से अलंकृत वह धनुष रखा था।

अतिबलशाली गज-जैसे शरीरवाले, पहाड़-जैसे पुष्ट तथा लोमश कंधोंवाले, साठ सहस्र वीर, बड़े-बड़े बल्लों पर रखकर उस धनुष को उठा लाये।

वह धनुष लाया गया, तो विशाल धरती (जहाँ पर एक दीर्घकाल से वह धनुष रखा हुआ था) अपनी पीठ की पीड़ा दूर कर सकी। (उसे देखकर) सुदृढ खड़ा ऊँचा मेरु गिरि भी लज्जित हो गया। समुद्र जैसी जनता शोर-गुल करती हुई उस धनुष को देखने के लिए उमड़ आई। ऐसा लगा कि उस विशाल धनुष को रखने योग्य खाली स्थान कहीं भी नहीं है।

कुछ लोग कहते थे—शंखचक्र-विभूषित हस्तवाला, सिंह-सदृश यह (विष्णु का अवतार रामचन्द्र) यदि इस शिव-धनुष पर डोरी न चढ़ा सके, तो संसार में इसे छू सकने-

६० कम्ब रामायण

वाला भी कोई व्यक्ति नही मिलेगा। यदि आज ही यह कुमार इसे चढ़ा दे, तो सीताजी का शुभ-विवाह सुसपन्न हो सकेगा।

कुछ लोग कहते थे—इसे धनुप कहना धोखा है, यह सोने का पहाड मेरु है। कुछ कहत थे—ब्रह्मा न इसे अपने हाथो से स्पर्श करके नही बनाया, किन्तु अपने महान् तप के प्रभाव से ही इसे निर्मित किया है ओर कुछ कहतं थे—न जाने पूर्व काल मे इसे कौन चढ़ाता था ?

कुछ कहंत थे--दृढ मेरु को ही इस धनुप का आकार दिया गया है, या पूर्वकाल मे जिम मंदरपर्वत से क्षीरसागर को मथा गया था, वही पर्वत इस धनुप के रूप में यहाँ पडा हे, या प्रभावशाली, प्रकाशमान सर्पराज (आदिशेप) ही है यह, या गगनस्थ दीर्घ इन्द्र-धनुष ही अब किमी प्रकार यहाँ आ गिरा है।

कुछ कहत थे—महाराज ने इसे ले आने की आज्ञा ही क्यो दी ? इसे प्रणबध बनानेवाले उनके जैमा बुद्धिहीन व्यक्ति कोई है क्या ? कुछ कहते--पूर्व-पुण्य से ही यह कार्य पूर्ण हो भी सकता है। कुछ कहते—क्या सीता ने अपने (विवाह के) लिए दाँव पर रखे गये इस धनुप को कभी देखा भी है ?

कुछ कहते--इस धनुप से छोडे गंय वाण का लक्ष्य कौन हो सकता है ? कुछ कहतं—इस महान् धनुष को अपनी कन्या के सामर्थ्य के अनुरूप ही बनाया है। कुछ कहते—चक्रायुध धारण करनेवाला (महाविष्णु) क्या निश्चय ही इस धनुष को झुका सकता है ? कुछ कहते—यह पूर्वजन्म-कृत पाप ही है (जो प्रणबंध होकर यहाँ पड़ा है)।

वहाँ एकत्र नर-नारी इस प्रकार के वचन कह रहे थे, तब सेवको ने वह धनुष जनक के सम्मुख रखा, जिससे धरित्री की पीठ नीचे को धँम गई। उस धनुष को देखते ही वहाँ के राजाओ की भुजाएँ, यह सोचकर कि 'इसे कौन चढ़ा सकता है?', काँपने लगी।

जनक महाराज (कभी) कलभ जैसे उस वीरकुमार (राम) के सौन्दर्य को देखते, कभी दुःख देनेवाले उस बडे धनुष को देखते, फिर अपनी पुत्री (सीता) की ओर देखत । उनके मन की अधीरता को जानकर शतानन्द कहने लगे---

मेरु को धनुष बनानेवाले शिवजी, अपने पार्श्व मे रहनेवाली उमा का अपमान करनेवाले दक्ष के यज्ञ मे, क्षमारहित क्रोध के साथ, इसी धनुष को लेकर गये थे।

(शिवजी के किये गये आघातो से उन देवताओ के) दाँत और हाथ टूटकर गिर पडे। वे देवता भागे और अज्ञात स्थानो मे जा छिपे। दक्ष की यागाग्मियाँ ध्वस्त हो गई' , तब जाकर त्रिनेत्र तथा अष्टभुजावाले रुद्र का क्रोध शान्त हुआ।

उसके बाद शिवजी ने देवों की थरथराहट देखी। उन देवो की आयु अभी शेष थी। अतः, (शिवजी ने) उस दृढ धनुष को इस वृषभ-समान वीर जनक के वंश में उत्पन्न एक खड्गधारी नरेश को दे दिया।

इस धनुष की कठोरता के बारे मे मुझे कहना ही क्या है ? दीर्घजटाधारी (शिव)

बालकाण्ड ६६

तुल्य हे मुनिवर ( विश्वामित्र ) ! आपसे बढ़कर सर्वज्ञ दूसरा कौन है ? अब रथ के सदृश जघनवाली जनक की पुत्री इस सीता का वृत्तान्त भी सुनिए ।

एक बार हमने यज्ञ करने का उपक्रम करके लौह-समान दीर्घ शृंगद्वय से भूषित दो वृषभों के अतिभारी कंधों पर स्फटिकमय जुआ रखा और उससे असंख्य रत्न-खचित हल को बाँधा और उसमें हीरे की बनी फाल लगाकर दृढ़ भूमि को जोता ।

जोतते समय फाल के सिरे पर उदीयमान कांतिपूर्ण-सूर्य की जैसी एक सुन्दरी निकल पड़ी, मानो भूमि स्वयं नारी की आकृति धारण कर निकल आई हो। वह इतनी सुन्दरी थी कि क्षीराब्धि से स्वच्छ अमृत के साथ उत्पन्न लक्ष्मी भी अपने को छोटी मानकर दूर हटकर खड़ी हो जाय तथा हाथ जोड़कर नमस्कार करे ।

इस कन्या के गुणों के संबंध में क्या बताऊँ ? सभी सद्गुण इस लतांगी के पास रहकर नव जीवन पाना चाहते हैं और चढ़ा-ऊपरी करते हुए इसके पास आ पहुँचते हैं। रूप-सौन्दर्य बड़ी तपस्या करके ऐसी कन्या को प्राप्त कर सका है। विशाल कर्णाभरणों से अलंकृत इस कन्या के आविर्भाव से अन्य सभी सुन्दरियाँ वैसे ही शोभाहीन हो गईं, जैसे सूर्य से प्रकाशमान नभ से गंगा के भूमि पर उतर आने से अन्य नदियाँ प्रभावहीन हो गई थीं ।

हे सर्वज्ञ ! (जो सीता का पाणिग्रहण करना चाहता है, उसे) धनुर्विद्या का चातुर्य अपने व्यापार में प्रकट करना होगा और (उसके लिए) भाग्य का भी बल होना आवश्यक है। ये दोनों (बल) किसी के पास एक साथ नहीं रहते, उनके पृथक्-पृथक होने पर भी पृथ्वी के सभी राजाओं ने इस सीता को प्राप्त करना चाहा, जैसे समुद्र से निकली हुई लक्ष्मी को सभी देवताओं ने अपनाना चाहा था। ऐसे आश्चर्य का विषय संसार में और क्या होगा ?

अपनी सूँड़ से मद-जल बहानेवाले मत्तगज के जैसे राजा अपनी भारी सेनाओं-समेत, कोलाहल मचाते हुए, समुद्र के समान आते और सीता का पाणिग्रहण करने की इच्छा प्रकट करते । उनके उत्तर में हम कहते—व्याघ्रचर्म को कटि मे तथा गजचर्म को उत्तरीय के रूप मे धारण करनेवाले (शिवजी) ने युद्ध मे जिस धनुष का प्रयोग किया था, उसे चढ़ानेवाला ही इस सीता का वर हो सकता है।

वाणी-रूपी धनुष से लोक की रक्षा करनेवाले (हे विश्वामित्र) ! वे राजा इस कठोर (शिव) धनुष को चढ़ाने मे असमर्थ हुए। परन्तु, वे मन्मथ के छोटे-से ईख के धनुष (के बाणों) को भी सहने मे असमर्थ थे, इसलिए वे कर्णाभरण-विभूषित उस सीताजी को बहुत चाहने लगे, जिसके विवाह के लिए शिवधनुष पण बनाया गया था, अतः वे हमारे साथ युद्ध करने आये।

हमारे महाराज (जनक) की सेना इस प्रकार घटती गई, जैसे किसी दाता राजा की यशःप्रद संपत्ति घटती है। किन्तु, गुंजायमान भ्रमरों से अलंकृत घुँघराली लटों से सुशोभित सीता के मोह से आये हुए उन राजाओं की सेनाएँ उनकी इच्छा के सदृश ही विफल हुईं।

६२ कंब रामायण

उज्ज्वल किरीटधारी देवो ने जब देखा कि बलशाली सुन्दर भुजावाले ये (जनक) वृषभवाहन (शिव) के धनुष के कारण उत्पन्न युद्ध मे शिथिल पड़ रहे है, तब उन्होंने कृपा करके इन्हे चतुरंग सेना प्रदान की। उस सेना को देखते ही वे शत्रु राजा डरकर इस प्रकार भागे, जैसे रात मे उल्लू को देखकर कौए डरकर भाग जाते हैं।

तव से अवतक अन्य कोई राजा इस शिव-धनुष के पास भी नही फटका। वे रथी नरेश, जो डर के मारे भाग खडे हुए थे, कभी नही लौटे। हम यही सोचते रह गये कि अब सीता का विवाह नही होनेवाला है। यदि यह कुमार (राम) धनुष चढ़ा दे, तो बड़ा हित होगा और पुष्पमालाालंकृत सीता का लावण्य व्यर्थ नही जायगा।—शतानन्द यों कहकर चुप हो रहे।

अपूर्व तपस्वी (विश्वामित्र) ने उस मुनि के वचनो पर विचार किया, फिर जटालंकृत अपना सिर हिलाया और युद्ध-कला मे निपुण वृषभतुल्य राम के मुख की ओर निहारा। चित्र की प्रतिमा-जैसे सौन्दर्यवान् (रामचन्द्र) ने विश्वामित्र के मन का विचार ताडकर उस दीर्घ शिव-धनु पर दृष्टिपात किया।

प्रवाहित घृत की आहुति पाकर जैसे प्रज्वलित अग्नि ऊपर उठती है, वैसे ही रामचन्द्र अपना आसन छोड़ उठ खडे हुए और (धनुष की ओर) पग धरने लगे। तब देवगण ने 'धनुर्भंग हो गया।' कहकर घोष किया। शत्रुत्रय, (काम¹ क्रोध और मोह) को परास्त करनेवाले ऋषियो ने उन्हे आशीष दिये।

पवित्र तपःसपन्न मुनि की आज्ञा पाकर श्रीराम ने अभी शिव-धनुप को चढाया भी नही था कि अनंग (मन्मथ) ने मनोहर आभूषणो से भूपित तरुणियों के हृदय मे तीर मार-मारकर सहस्रो धनुषों को तोड़ दिया।

वहाँ की नारियाँ कई प्रकार की बातें करने लगी। कोई कहती—यह सामने रखा हुआ धनुष भीतर से बहुत ही कठोर है। और कोई कहती—यदि लज्जाशील सीता के मनोहर लाल कर को इस कुमार (राम) का विशाल हाथ न छुए, तो (अर्थात्, इन दोनो का विवाह न हो तो) क्रात ललाटवाली (सीता) का जीवन ही व्यर्थ हो जायगा।

कुछ नारियाँ अपने करो को जोड़कर कहती—यदि मत्तगज-समान यह राजकुमार हमारी आँखो को आनन्दाश्रु से भरते हुए इस धनुप को न चढ़ा दे, तो हम कस्तूरीगंध-युक्त केशोवाली सीता के साथ जलानेवाली अग्नि मे डूब जायेंगी।

कोई कहती—ये वदान्य महाराज (जनक) यदि सीता का विवाह करना चाहते, तो इस राजकुमार को देखते ही यह कहकर कि 'मेरी कन्या सीता से विवाह कर लो,' पहले ही अपनी कन्या उन्हे दे देते। उलटे, इन्होने गगा को जटा मे बाँधनेवाले (शिवजी) के धनुष को लाकर इस कुमार के सामने रख दिया है यह कैसा भोलापन है ?


¹ संस्कृत-ग्रन्थों मे अरि-षड्वर्ग' प्रसिद्ध र। तमिल-ग्रन्थों मे प्रायश काम, क्रोध, मोह, मद, लोभ, मात्सर्य—इन छह दुर्गुणों को काम, क्रोध और लोभ के अंतर्गत मानकर 'शत्रुत्रय' का प्रयोग होता है। —अनु०

बालकाण्ड ६३

कोई कहती—इस तत्त्वज्ञ मुनि में लज्जा नहीं है। कोई कहती--इस जनक से बढ़कर कठोर अन्य कोई व्यक्ति नहीं है। यह श्रेष्ठ कुमार यदि इस धनुष को न झुकावे, तो पीनस्तनी सीता भाग्यहीन हो जायगी।

मयूर-सदृश नारियाँ इस प्रकार कह रही थीं। उधर साधुजन शुभबचन कह रहे थे। स्वर्ग में देवता आनन्दित हो रहे थे। तत्र वे (राम) नाग (मत्तगज) तथा नाग (पर्वत) को लजाते हुए आगे पग बढ़ाते हुए चले।

उन्होंने बड़े स्वर्ण-पर्वत-सदृश उस धनुष को इस प्रकार उठाया, मानो वे सुवर्ण-चूड़ियाँ पहनी हुई दुर्लभ रत्न-समान (सीता) को पहनाने के लिए कोई दीर्घ पुष्पमाला उठा रहे हों।

देखने में बाधा पड़ेगी, इस भय से सभी दर्शक निर्निमेष नयनों से देख रहे थे, किन्तु वे लोग यह देख और समझ भी नहीं पाये कि कब उन्होंने धनुष के एक सिरे को पैर से दबाया और कब उसको झुकाकर दूसरे सिरे पर डोरी चढ़ा दी। उन्होंने केवल धनुष का उठाना देखा और उसके टूटने की ध्वनि सुनी।

उस ध्वनि को सुनते ही देवता डर गये कि ब्रह्माण्ड ही फट गया है। वे चिन्ता करने लगे कि अब हम किसकी शरण में जायें। अब इस पृथ्वी की क्या दशा हुई। मैं क्या कहूँ? नीचे इस पृथ्वी को अपने सिरपर ढोनेवाला, इसका मूल स्वरूप आदिशेष भी यों भयभीत हुआ, मानो उसके सिर पर वज्र गिर पड़ा हो।

'जयशील, शत्रु-भयंकर, शूलधारी जनक को आज पुण्यफल प्राप्त हुआ है'—यह सोचकर देवों ने पुष्प-वर्षा की। मेघों ने सोने की वर्षा की। झाग-भरे सभी समुद्रों ने विविध रत्नों को बिखेरकर आनन्द-घोष किया। मुनियों ने आशीष दिये।

मिथिला नगरी में श्वेतशंख तथा अमृतनादयुक्त विविध वाद्य बज उठे। पुष्प-मालाएँ, आभरण, चन्दन, सुगंध-चूर्ण, सुगंध-द्रव्य, समुद्रों से उत्पन्न उज्ज्वल मुक्ताएँ, स्वर्ण, मणियों, उत्तम वस्त्र आदि वस्तुएँ वहाँ के लोग दान करने लगे। वह नगर ऐसा लगा, जैसे पर्वकाल में (पूर्णिमा या अमावास्या के दिन) समुद्र उमड़ पड़ा हो।

भाले के जैसे नुकीले नयन और रात्रि में शोभायमान चन्द्रोपम वदनवाली रमणियाँ, वर्षा-ऋतु में गगन के नीर-भरे बादलों को देखकर नाचनेवाली मयूरों की जैसी नाच उठीं। उस समय सुनाद-भरी मकरवीणा की संगीत-सुधा बरसने लगी और मंदहास तथा कर्णाभरणों की चमक चारों ओर छा गई।

मानिनी नारियों ने, जिनके रक्तवर्ण और काले सुन्दर नयन मस्ती से भरे थे, अपना मान छोड़कर अपने-अपने प्रियतम का आलिंगन कर लिया। विशाल समुद्र में जैसे सफेद बादल पानी पिये, वैसे ही दरिद्रों ने जनक-महाराज की संपत्ति को भर लिया।

नर्तकों के मधुर गीत, रमणियों के अमृत-गीत, तन्त्री-वाद्य बजानेवालों की मकर-वीणा से उत्पन्न मधु-सदृश दिव्य गीत तथा वंशी के विविध गीत—इन सबका पान करते हुए देवता अपने शरीर और प्राण के जड़ीभूत होने से यों खड़े रहे, मानो चित्र ही हों।

देवलोक की अप्सराएँ, प्रभु के धनुष तोड़ने का अद्भुत दृश्य देखने के लिए

६४ | कंब रामायण

भूतल पर उतर आई तथा अंगो के व्यापार मे, आकार मे, नाच मे, गान मे—सभी प्रकार से, भूतल की नारियो के साथ एकाकार हो गई और पृथ्वी की ललनाओ का (अप्सरा समझकर) आलिंगन करने लगी किन्तु इन ललनाओं को अपनी पलकें स्पंदित करते हुए देखकर विस्मय-विमुग्ध हो गई।

(दर्शकों में से) कुछ कहते—देखो, यह दशरथ का पुत्र है। कुछ कहते, यह कमलनयन है (विष्णु का भी एक नाम कमलनयन या 'पुण्डरीकाक्ष' है)। कुछ कहते—इसका शरीर ही कालमेघ है और (अतसी) पुष्प की तुलना करता है। कुछ कहते—यह मनुष्य नही है, मीन-भरे समुद्र का निवासी विष्णु ही है, किन्तु ससार भ्रम मे पड़ा है (इनको पहचान नही रहा है)।

कुछ कहते—इस कुमार (के सौन्दर्य) को देखने के लिए उस कुमारी (सीता) को सहस्र नयन चाहिए और उस लतांगी (सीता के सौन्दर्य) को देखने के लिए इस पुरुषश्रेष्ठ को भी वैसे ही सहस्र नयन चाहिए। फिर कहते—देखो, इसका भाई भी कितना सुन्दर है। इनको प्राप्त करके पृथ्वी अत्यत पुण्यवती हुई है। और, कुछ कहते—इस नगर मे इन कुमारों को ले आनेवाले मुनिवर (विश्वामित्र) को हम सभी नमस्कार करें।

यहाँ राजदरबार में यह दृश्य था। उधर चन्द्र और रात्रि के चले जाने पर (राम के) पुनर्दर्शन की अभिलाषा से, प्राणो को कुछ रोककर बैठी हुई उस लघुकटि, पीन उरोज, लाल रेखाओ से युक्त और काले भाले जैसे तीक्ष्ण नयन तथा स्वर्ण-कंकण से सुशोभित सीता की क्या दशा हुई, अब हम इसका वर्णन करेंगे।

वह सीता दोलायमान प्राणो के साथ (उष्णता से) शरीर को गलानेवाली पुष्प-शय्या को छोड़कर स्वर्णाभरणो से अलकृत चेरियो से घिरी हुई, वहाँ से उठी और सुन्दर कमल-सरोवर के तट पर एक स्फटिक-प्रासाद मे, चन्द्रकान्त से उत्पन्न शीतल जल से छिड़कायी हुई कोमल शय्या पर, बड़ी कठिनाई से जा लेटी।

(विरह-ताप से पीडित वह कहने लगी) शीतल सुरभित कमललताओ ! ऐसा प्रतीत होता है कि एक बाला की विरह-व्यथा को समझने की उदारता तुममें है, इसीलिए तुमने अपने पत्तो की छटा मे (उस श्रीरामचन्द्र के शरीर का) अपूर्व रंग दिखाकर मेरी मनोव्यथा को कुछ कम किया है, किन्तु मेरे पल्लव-समान रंग का हरण करनेवाले (उन रामचन्द्र) के नेत्रो की आतरिक काति को भी (अपने दलो में) दिखाकर मेरे प्राणो को लौटाने से क्यो पीछे हटती हो ?

(उन राम की भुजाओ को देखकर) लज्जित मेरु-सदृश उनका धनुष तथा उनकी डोरी पर सचरण करनेवाले उनके हस्त, स्तभ-सदृश उनके स्कध, बाणों से भरा तूणीर, उज्ज्वल चन्द्रिका-जैसा यज्ञोपवीत और जयमाला से अलकृत उनका वक्ष—ये सब फिर देखने को मिलेंगे, तो मेरे प्राण भी देखे जा सकेंगे। (अर्थात्, तभी मेरे प्राण बचेंगे, अन्यथा अदृश्य हो जायेंगे)।

नभोमडल मे प्रकाशमान चन्द्रमा और उनके साथ भ्रमरावृत पुष्पमालाधारी केशों

बालकाण्ड ६५

से अलंकृत दीर्घधनुर्धारी एक मेघ आया था, जो अपने दो नयनों से मेरे प्राणरूपी जल को उठाकर पी गया। वह मेघ मेरे हृदय में अब भी छाया हुआ है और सदा छाया रहेगा।

निष्ठुर मन्मथ ने ऐसे तीक्ष्ण वाण मेरे हृदय पर मारे हैं, जो तूल को जलाने-वाली अग्नि के समान मेरे प्राण हरकर चले गये हैं और उसे पीडित कर रहे हैं। अब मैं अत्यंत व्याकुल हो रही हूँ, ऐसी दशा में पास आकर मुझ अबला को जो अभयदान न दे, जो यह न कहे कि 'डरो मत, डरो मत'—उसका पौरुष भी कोई पौरुष है ?

हे कभी कृश न होनेवाले (मेरे) स्तन! उमड़ते-उमड़ते रहकर तुमने क्या काम किया ? उदय न होनेवाले (अर्थात्, सर्वदा एक जैसे चमकनेवाले) चन्द्र-जैसा कान्तिमान् वदनवाले, (शिव के) कठोर धनुष को उठानेवाले उस महाप्रभु (राम) के वक्ष का गाढालिंगन यदि प्राप्त करना चाहते हो, तो उसके लिए उचित तपस्या करो।

यह चन्द्रमा कहाँ से निकल आया है, जो मेरे ऐसे स्तनों पर विष बरसा रहा है, जिनसे मेरे हृदय में अनंग के द्वारा छोड़े गये शरों से उत्पन्न विरह-पीड़ा उमड़ रही है। विष बरसाने पर भी यह रात्रि-काल में उदित होनेवाला चन्द्र$^१$ नहीं है, क्योंकि इसके मध्य कलंक नहीं दीखता।

ह मेरे हृदय ! अनंग ने निकट आकर, क्रुद्ध हो शर बरसाये; उनके विष से जलाये जाकर भी मेरे ये प्राण जले नहीं है; किन्तु ये (प्राण) मेरे शरीर से निकलकर उष्ण मदजल बरसानेवाले काले हाथी के जैसे दीखनेवाले उस युवक (राम) के चरणों$^२$ की शरण में पहुँच गये थे। वे प्राण फिर लौटकर कैसे आयें ?

मानों गगनगत-मेघ, बिजली के साथ, इस धरती पर उतर पड़ा हो, ऐसा ही दीखनेवाला वह श्वेत यज्ञोपवीतधारी राजकुमार (रामचन्द्र) आया और चला गया। वह यद्यपि मेरे हृदय-गत है, तथापि मैं उसे जान नहीं पाती कि वह कौन है ? वह यद्यपि मेरे नयन-गत है, तथापि मैं उसे देख नहीं पाती। यह क्यों ?

उदार समुद्र में उत्पन्न, अन्यत्र दुर्लभ अमृत को पाकर भी उसे मनोहर स्वर्णकलश में न भरकर बहा देनेवाले मूर्ख के समान मैं रह गई और उस कुमार की महान् बलिष्ठ भुजाओं को देखते ही आलिंगन में न बाँधकर मैंने उसे हाथ से जाने दिया। अब बहुत कहने से क्या प्रयोजन ?

सोने के लेप-जैसे चिह्न-भरे स्तनोंवाली (सीता), उपर्युक्त प्रकार से कहती हुई, अत्यन्त व्याकुल हो, सिसक-सिसककर रोने और दुःख-सागर में डूबने लगी। इतने में मुदित-मन और अंजन-अंजित नयनोंवाली एक सखी पर्वत-जैसे धनुष के तोड़े जाने का समाचार लेकर आई। उसका वर्णन हम अभी करेंगे।

विशाल सरोवर में उत्पन्न नील कुईं समान नयनोंवाली माला नामक सखी, लचकती हुई बिजली की-सी शीघ्रता से आई; उसके रत्नमय कंठहार और कर्णाभूषण इन्द्रधनुष का


१. रामचन्द्र का मुख ही सीता की दृष्टि में फिर रहा है, जिसे वह चन्द्रमा समझती है। २. 'विष्णुपद' के दो अर्थ होते हैं—(१) स्वर्ग तथा (२) राम के चरण। मृत्यु प्राप्त करने पर प्राण फिर कैसे शरीर में आये, यह संकेत है।

६८ कंब रामायण्

दृश्य उपस्थित कर रहे थे, तथा उनके घने पुष्प-भारित केश तथा वस्त्र नीचे खिसके पड़ते थे । वह सखी आई तो उसने सीताजी के चरणों का नमस्कार भी नहीं किया और शोर मचाने लगी । असीम आनन्द में भरी हुई वह नाचने-गाने लगी । उसे देख सीता ने पूछा—हे सुन्दरि ! तेरे मन में यह कैसा आनन्द है ? ऐसी क्या बात हुई है जो तू इतना आनन्दित है ? तब वह सखी सीता के चरणों की वंदना कर कहने लगी—

गज, रथ, तुरग के समुद्र से युक्त विपुल विद्या-सपन्न, मेघ-सदृश (दान-वर्षा करनेवाले) करों से युक्त, दशरथ नामक एक छत्रधारी चक्रवर्ती हैं । उनका पुत्र पुष्पबाणों द्वारा प्रेम उत्पन्न करनेवाले मन्मथ से भी अधिक सुन्दर है ।

उस कुमार की भुजाएँ सालवृक्ष के-जैसे बढ़ी हुई हैं । उसे देखने से सन्देह उत्पन्न होता है कि कहीं अनन्त पर शयन करनेवाले विष्णु भगवान ही तो इस रूप में नहीं आये हैं । उसका नाम है 'राम' । वह और उसका अनुज प्रशसनीय मुनिवर विश्वामित्र के संग इस नगर में आये हैं ।

वलय-विभूषित भुजावाला वह महापुरुष शिवजी का धनुष देखने के लिए आया है—यह समाचार विश्वामित्र से पाकर जनक ने वह धनुष लाने का आदेश दिया । वह धनुष लाया गया, तो उस पुरुषश्रेष्ठ ने उस पर डोरी चढ़ा दी । तब देवलोक भी काँप उठा ।

क्षण-भर में उसे पैर से दबाकर अपने भुजबल से ऐसा झुका दिया, मानो उस धनुष को चढ़ाने का उसे पहले से ही अभ्यास रहा हो । तब देवताओं ने उसकी प्रशंसा की और पुष्प-वर्षा की वह धनुष टूटकर ऐसा गिरा कि गजदरबार उस शब्द से काँप उठा ।

उस सखी ने जब यह कहा कि विश्वामित्र के साथ आया हुआ राजकुमार मेघवर्ण है और कमलनयन विष्णु की छटावाला है, तब सीता का यह सन्देह दूर हो गया कि यह वही राजकुमार है जिसे पहले दिन उसने देखा था या कोई अन्य । सीताजी का नितंब (आनन्द से) ऐसा बढ़ गया कि मेखला टूट गई ।

(सीता की यह दशा देखकर सखियाँ आपस में कहने लगी) कोई कहती— 'इनके कटि नहीं है।' तो दूसरी कहती कि 'नहीं, इनके कटि है।' सीता के सुकुमार स्तन उमंग से उभर उठे । यों आनन्दित होती हुई उसने मन में निश्चय कर लिया कि इस सखी के कहे लक्षणों से लगता है कि अवश्य वही राजकुमार है। पर, यदि धनुष तोड़नेवाला व्यक्ति कोई अन्य होगा, तो मैं अपने प्राण छोड़ दूँगी ।

विरह-वेदना से पीड़ित सीता की दशा ऐसी हुई । उधर जनक महाराज ब्रह्मा के द्वारा निर्मित धनुष के टूटने से उत्पन्न ध्वनि सुनकर अत्यन्त आनन्दित हुए और विश्वामित्र से कहा—

'भगवान् ! क्या आप इस कुमार का विवाह अविलम्ब आज ही, कर देना चाहते हैं या संबंध इस प्रकार का दृढ़ीकृत दिखलाकर तथा सुदर्शन वीर-चक्रबड़ारी और गरजनेवाली सेनाश्री-सहित दशरथ चक्रवर्ती को भी यहाँ बुलाने के पश्चात् विवाह संपन्न करना चाहते हैं ? आप कृपया बतावें ।

बालकाण्ड ६७

मल्लयुद्ध मे निपुण उस जनक के यों कहने पर महातपस्वी (विश्वामित्र) ने अपना मत प्रकट किया कि दशरथ का भी यहाँ आना अच्छा होगा। अति आनन्द-भरित राजा ने वहाँ का सारा वृत्तांत दशरथ से कहने का आदेश देकर, विवाहोत्सव के लिए निमन्त्रण-पत्र-सहित, दूतों को अयोध्या रवाना किया। (१-६६)


अध्याय १३

दशरथ-प्रस्थान पटल

जनक के द्वारा प्रेषित वे दूत अतिवेग से, पवन के जैसे चलकर वज्र-ध्वनि करने-वाले नगाड़ों से प्रतिध्वनित अयोध्यापुरी में आ पहुँचे और दशरथ चक्रवर्त्ती के उस प्रासाद के द्वार पर गये, जहाँ चक्रवर्त्ती के चरणों की वन्दना करने के लिए आये हुए राजा लोग अति भीड़ के कारण भीतर जाने का मार्ग न पाकर वही (द्वार पर ही) एकत्र हो गये थे और (भीड़ के कारण) उनके किरीट एक दूसरे से रगड़ खा रहे थे।

(अत मे) दूतों को चक्रवर्त्ती की कृपा प्राप्त हुई और वे यथाविधि राजा के सम्मुख जाकर उनके अति उज्ज्वल चरण-युगल को नमस्कार किया तथा उनकी स्तुति की। फिर बोले—हे महाराज ! आपके पुत्र जबसे विश्वामित्र के साथ चले, तबसे जो घटनाएँ घटित हुईं, उन्हे हम आपको सुनाते हैं। यह कहकर (उन्होंने) समस्त वृत्तांत कह सुनाया।

सारा वृत्तांत सुनाने के पश्चात् उन्होने अपने साथ लाये हुए पत्र को दशरथ के हाथ में दिया और कहा कि हे अनतगुणसंपन्न ! यह उस जनक महाराज द्वारा प्रेषित पत्र हैं। दरबार मे स्थित एक पडित ने उस पत्र को आनंद के साथ ले लिया। तब मुखरित वीर-वलय पहने हुए (दशरथ) चक्रवर्त्ती ने उस पत्र को पढ़ने की आज्ञा दी।

जनक ने ताल-पत्र पर उनके (दशरथ के) ज्येष्ठ पुत्र की धनुर्विद्या-चातुरी का जो चित्र अंकित करके भेजा था, उसके अपने श्रुति-पट पर अंकित होते ही दशरथ की वज्र-सम भुजाएँ पर्वत के जैसे फूल उठी और (भुजा के) वलय अपना मुँह बाये अपने स्थानों से खिसक गये।

जयप्रद शूलधारी (दशरथ) चक्रवर्त्ती ने कहा—उस दिन यहाँ एक बड़ी ध्वनि प्रतिध्वनित हुई थी, वह क्या उसी धनुष के टूटने की थी, जिसका प्रयोग घनी दीर्घ जटा-धारी, विशाल गण-सहित (शिवजी ने) दक्ष-यज्ञ के समय सातो लोको को पराजित करते हुए किया था ?

पर्वत-सदृश पुष्ट भुजावाले (दशरथ) ने उपर्युक्त वचन सभी दरबारियो से कहा. फिर अनुरूप नादविशिष्ट वीर-वलयधारी दूतों को स्वर्णमय आभरण, वस्त्र आदि निरंतर और अधिकाधिक मात्रा में दिलाते रहे।

६८ कंब रामायण

उन्होंने आज्ञा दी कि हाथियों पर बैठकर नगाड़े बजाये जायें और इस बात की घोषणा की जाय कि सूर्यवंशी मेरे पूर्वजों के पुण्य-फल से उत्पन्न मन्मथ जैसेश्रीरामचन्द्रजहाँ हैं, उस मिथिला नगरी की ओर हमारी सेनाएँ तथा राजसमूह पहले प्रस्थान करें ।

‘वल्लुवन’$^१$ ने अति वेगवान् अश्व-रूपी तरंग-युक्त (सेना-रूपी) समुद्र में घूम-घूमकर उपर्युक्त घोषणा सुनाई, (ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार) पूर्वकाल में जब मधुस्रावी तुलसी-पुष्पमाला से विभूषित शिरवाले विष्णु भगवान् ने (बलि का) दान स्वीकार करते हुए समस्त लोकों को नापा था, और जाम्बवान् ने उसकी घोषणा घूम-घूमकर प्रकाशित की थी।

नगाड़े का तुमुल शब्द कानों में पड़ने के पहले ही, मनोहर कंकण पहने हुई नारियाँ, सुन्दर पुरुष, भाले के (प्रयोग में) निपुण राजकुमार, विजयी नरेश, सभी आनन्द से यों उमंगित हो उठे, जैसे प्रभंजन से आहत समुद्र हों।

वृषभ-समान गंभीर पदगतिवाले (दशरथ) की सेनावाहिनी, जिसकी विशालता से ऐसा जान पड़ता था कि धरती पर थोड़ा भी खाली स्थान नहीं है, इस प्रकार चली, जैसे कल्पान्त के समय प्रलय-मारुत से विताड़ित होकर समुद्र सभी वस्तुओं को मिटाकर उमड़ता हुआ आगे बढ़ रहा हो।

(उस सेना के मध्य) डंडे के ऊपर फैले हुए ऊँचे श्वेतच्छत्र यत्र-तत्र ऐसे लगते थे, मानो असंख्य हंस दुग्ध-समान श्वेत कांति बिखेरते हुए उड़ रहे हों। नभ में छाई हुई ऊँची पताकाओं का समूह ऐसा लगता था मानो सारा आकाश (सर्प के समान) अपनी केंचुली उतारकर गिरा रहा हो।

हस्तिसेना के ऊपर उड़नेवाली श्वेत वस्त्रों की ध्वजाएँ उन मेघों की तरह लगती थीं, जो अपनी सूँड से मदजल बहानेवाले हाथियों की सेना को भ्रांति से समुद्र समझकर अंतराल को ढकते हुए उमड़ आये हों और जल पीने के लिए नीचे उतर रहे हों।

(नर-नारियों के) आभरणों से बालातप छिटक रहा था। वह बालातप मयूर-पक्षों से बने छत्रों की छाया को हटाता हुआ फैल रहा था। वे मयूर-छत्र मेघ की शोभा को मिटाते हुए विकसित हो रहे थे। उन मेघों को परास्त करते हुए पुंजीभूत नगाड़े बज उठते थे।

वे किंकिणीधारी अश्व, जिनपर रमणियाँ सवार होकर जा रही थीं, हंसों को लेकर चलनेवाली तरंग-युक्त नदी के प्रवाह-जैसे लगते थे। स्वर्णाभरण-भूषित, परस्पर संघट्ट-मान स्तनोंवाली, घुँघराली अलकों से युक्त रमणियाँ बिजली की जैसी थीं और उनके वाहन—छोटी-छोटी हथिनियाँ मेघों की जैसी थीं।

एक दूसरे को धक्का देते हुए, बड़ी भीड़ लगाकर चलने के कारण रमणियों के सटे हुए कुचों पर के कुंकुम-लेप तथा पुरुषों की सुंदर पर्वत-जैसी भुजाओं पर के चंदन-लेप, मार्ग


१ तमिल-देश में, प्राचीनकाल में 'वल्लुव' नामक जातिवाले राजघोषणा का ढिंढोरा पीटने का कार्य करते थे। —अनु०

बालकाण्ड ६६

में स्थान-स्थान पर गिर रहे थे, जिससे उस सेना-समुद्र का मार्ग कोमल पर्यंक के सदृश शोभित हो रहा था।

चाशनी से भी अधिक मीठी बोलीवाले लाल अधरों से शोभित रमणियों के आँचल में छिपे हुए यम (अर्थात्, काल की तरह मरण-पीडा उत्पन्न करनेवाले स्तन) मुक्ताओं से विभूषित होने से राका की चंद्रिका फैलाते थे ओर बहुल रत्नहारों से विभूषित होने से प्रातःकालिक बालातप फैलाते थे।

उस सेना के पुरुष सुरभित कुंतलवाले थे, पर्वतों को लजानेवाले थे, सोने के आभूषणों से विभूषित थे तथा धनुष और खड्ग धारण किये थे। वे अपनी लता जैसी कटिवाली प्रेयसियों के सग ऐसे चले, जैसे सुन्दर हथिनियों का अनुमरण करते हुए मत्तगज चलते हैं।

कुछ रमणियाँ पालकियों में बैठकर जा रही थी। सुरभित, मनोहर तथा नव-विकसित पुष्पों से भरे हुए मेघों का दृश्य उपस्थित करनेवाले केशों से विभूषित उन रमणियों के मुखमात्र (उन पालकियों में से) दिखाई पड़ने थे, जिससे ऐसा लगता था, मानो अनेक पूर्ण-चन्द्र विमानों पर चढ़कर जा रहे हों।

प्रवहमाण मदजल की वर्षा थमती नहीं थी। उससे जो कीचड़ उत्पन्न हो जाता था, उसमें मुखपट्टधारी हाथी फँस जाते थे और पागल हो जाते थे, वे (उस कीचड़ से) बाहर न निकल सकने के कारण घनी तरंगोंवाले समुद्र के समान शब्दायमान नथनोंवाली अपनी सूँड़ों को उठा-उठाकर टटोलते थे, मानो दिग्गजों को खोज रहे हों।

घोड़ों की पंक्तियाँ किंकिणियों के कलरव तथा टापों के ताल के साथ फाँदती हुई जा रही थी। देवों के समान ही उनके पैर धरती को छू नहीं रहे थे। उनकी चाल वार-नारियों के मन के समान थी, जो (बाहर से अधिक प्रेम दिखाने पर भी) अंतर से प्रेम-रहित होती हैं। (भाव यह है कि जिस प्रकार वारनारियों का मन बाहर से कुछ ओर, भीतर से कुछ और होता है, उसी प्रकार घोड़ों के पैर पृथ्वी को छूते हुए भी न छूते-से लगते थे।)

कुछ मानवती स्त्रियाँ (जो अपने पतियों से रूठी हुई थीं) अपनी दृष्टि अपने पति पर नहीं डालती थीं, वे निःश्वास भरती थीं, उनकी भौंहें तनी हुई थी, पल्लव-सयुक्त पुष्प भी नहीं पहने थीं। वे अपने पतियों के सग ऐसे चल रही थीं, मानो उन (पतियों) के प्राण ही जा रहे हों।

झरने के समान मद-धारा प्रवाहित करनेवाले गडस्थलयुक्त, अंकुश का नाम सुनते ही कोपाग्नि उगलनेवाले निर्भीक हस्तिगण, पर्वतों को अपना प्रतिद्वन्द्वी समझकर, उनसे टकरा जाते थे। बड़े-बड़े वृक्षों को तोड़कर नीचे गिरा देते थे और कभी उनको रगड़ते हुए निकल जाते थे। वे ऐसे चलते थे, जैसे कोई नदी-प्रवाह हों।

सभी दुःख-मग्न प्राणियों के आलंबन-भूत, करुणाद्र वे (दशरथ) अभी प्रस्थान के लिए उठे भी नहीं (क्योंकि वे इसी प्रतीक्षा में थे कि अयोध्या की सारी सेना पहले प्रस्थान कर जाये, तो उनके पीछे चलें) कि उधर धरती में कोई खाली स्थान नहीं है, ऐसा भाव

१०० कम्ब रामायण

उत्पन्न करती हुई, जो सेना अयोध्या से निकलकर मिथिला के मार्ग में चली, उसका अग्र-भाग ध्वजाङ्कित प्राचीर से आवृत मिथिला नगर के पास जा पहुँचा (अर्थात्, वह सेना एक-दम अयोध्या से मिथिला तक के मार्ग में फैल गई)।

दर्शकों का मन मुग्ध करनेवाले जुते हुए रथ, भ्रमर-कुल-सङ्कुल कुन्तलोंवाली रमणियों के वदन-समूह के कारण ऐसे लगते थे, मानो कमल-पुष्पों से सुशोभित सरोवर ही जा रहे हों।

रथ में बैठी हुई एक सुन्दरी, अति प्रेम के कारण अपने रथ के साथ-साथ डग भरते हुए आनेवाले युवक की ओर देखने लगी, तो उस सुन्दरी की आँखों में लगा हुआ (काला) अञ्जन, उस युवक के लिए मधुर अमृत बन गया।

बाल-हरिण की जैसी दृष्टिवाली (अपनी प्रेयसी) से बिछुड़कर जानेवाले एक पुरुष ने पानी और कीचड़ से भरे 'मरुद' प्रदेश में हंसों तथा कोमल कमलों को देखा, तो (अपनी प्रेमिका की पदगति एवं पैरों का स्मरण करके) उसका मन अकेलेपन का अनुभव करके अत्यन्त व्याकुल हो उठा।

उस सेना में शंख तथा भेरियाँ मेघ-जैसी बज रही थीं, वे उज्ज्वल श्वेतच्छत्रों तथा चामरों की बहुलता के कारण गगानदी की समानता कर रही थीं। ओह ! इस सुन्दर पृथ्वी पर कैसे-कैसे राजचिह्न सर्वत्र दिखाई देते ।

वहाँ की मिष्टभाषिणी तथा श्रेष्ठ देव-रमणियों जैसी लावण्यवती स्त्रियाँ, प्राण पीने-(हरने) वाले अतितीक्ष्णनेत्र नामक यम के योग्य शूलायुधों को युवकों के हृदयो पर फेंक रही थीं, जिससे वह सेना ऐसी दीखती थी, मानो वह युद्ध-क्षेत्र में ही हो।

(वीरों की) भुजाएँ परस्पर सटी हुई थीं, जैसे पत्थर के खमे एक दूसरे के साथ खडे हों। करवाल सटे हुए थे, जैसे गगन में बिजलियाँ सटी हुई हों। (उनके) पद सटे हुए थे, जैसे कमल सटे हुए हों। पदाति सेना सटी हुई थी, जैसे सिंहों की पंक्तियाँ सटी हुई हों।

(किसी रमणी की अँगिया में) कसे हुए स्तनों में गड़े हुए अपने नयनों को हटाने में असमर्थ, चमकता चेहरावाला एक युवक अपने आगे के मार्ग पर दृष्टि नहीं रख पाता है और अंधे की तरह बड़े बलिष्ठ हाथी से जाकर टकरा जाता है।

झँरियोवाले ओग फाँदकर दौड़नेवाले एक घोड़े के उछलने से, उसपर आसीन कोई मयूरी-जैसी छटावाली सुन्दरी, अपना संतुलन खोकर नीचे गिरने लगी। इतने में एक उदारहृदय (युवक) ने लोहस्तंभ जैसी अपनी लंबी बाँहों से उसे सँभाल लिया और उस सुन्दरी को धरती पर उतारे बिना वैसे ही अपने अंक में भरकर जड़वत् खड़ा रह गया।

(अपने) युगल कमलों को दुखाती हुई चलनेवाली तथा (युवकों के) मन को दुखानेवाली शर-सदृश काले नयनों से युक्त रमणी को देखकर एक (युवक) कह उठा—'देखो, इस सुन्दरी के पीन और मनोहर उरोज-रूपी मदजलस्त्रावी हाथी को बाँधने के लिए पर्याप्त विशाल स्थान (वक्ष) कहीं है क्या?'

बालकाण्ड १०१

अपने घुँघराले बालों पर बैठे हुए भ्रमरों को उड़ाकर, उन्हें गुञ्जारित करते हुए, मदजल बहानेवाले गज के समान एक युवक एक सुन्दरी के काले और नुकीले नयनों को देखता है और फिर अपने हाथ के भाले की ओर देखता है। १

तरग-समान काली और लम्बी घुँघराली अलकों, कमल-समान छोटे पदों तथा करवाल-समान काले नयनों से शोभित एक रमणी को देखकर कोई युवक पूछता है—परस्पर सटे हुए, आभरण-भूषित स्तनों तथा कंकण-भूषित दीर्घ बाहुओं से शोभायमान हे सुन्दरी, तुम अपनी कटि को कहाँ भूल आई ?

एक तरुणी ऐसी है, जो अपने नयनों से ही—जो यम के जैसे ही (दर्शकों के) प्राण हरनेवाले थे—बाते करती है. लेकिन अपना मुँह खोलकर कोई बात नहीं कहती है। उससे एक युवक पूछता है—हे सुन्दरी, जब तुम किसी नदी की धार में खड़ी (फँसी) रह जाओगी, तब तुम्हारे सुन्दर करों को पकड़कर किनारे पर पहुँचानेवाला कौन होगा ? (अर्थात् यदि तुम बात नहीं करोगी, तो तुम्हें बचाने की चेष्टा भी कौन करेगा ?)

(उस सेना के) ऊँट, जो इतना भारी बोझ ले जा रहे थे, जिसे उठाना भी कठिन था, स्वच्छ तथा मीठे पल्लवों को कभी नहीं खाते थे. किन्तु कडुवे (नीम आदि पेड़ों के) पत्ते ही खोजते हुए, मद्य पीने में निरत नशे के जैसे ही (लड़खड़ाते हुए) चल रहे थे। उनके मुख उनके हृदय के जैसे ही सूखे थे।

लाल नेत्र और गाढ़े अंधकार-जैसे शरीरवाले वर्बर (जाति के लोग) भारी बाँसों को उठाये हुए ऐसे चल रहे थे, जैसे मत्तगज अपने कंधे पर अंकुश और अपने को बाँधने के लिए उपयुक्त बड़े आलान भी उठाकर लिये जा रहे हों।

(एक) मत्तगज मस्त होकर अड़ गया और किसी हथनी पर सूँड़ बढ़ाने लगा। तब उस हथनी पर बैठी हुई कुछ स्त्रियाँ भयभीत होकर अपनी आँखों को हथेलियों से मूँदने लगीं। किन्तु, उनकी विशाल आँखें उन हथेलियों में समा नहीं पाईं; तो वे बहुत खिन्न होकर रह गईं।

ऐसी हथिनियों के ऊपर, जिनकी पूँछ पृथ्वी को छूती है, बैठे हुए मेखला-भूषित रमणियों के मध्य बौने भी जा रहे हैं, जैसे सद्योविकसित मनोहर पुष्प-समूह के मध्य कलुषों पर बैठकर मेढ़क जा रहे हों।

एक अश्व, पुष्पलता-सदृश एक सुन्दरी को अपनी पीठ पर लेकर अपने पैरों को झुका-झुकाकर फाँद रहा है। बड़े आलान से बँधा रहनेवाला एक हाथी उसके पीछे दौड़ता है, तो भी वह अश्व उसके काबू में नहीं आता। वह दृश्य ऐसा है, मानो वह अश्व यह सोचकर कि यह सुन्दरी इस धरती पर रहने योग्य नहीं है, किन्तु देवेंद्र के योग्य है, उसे उड़ाकर स्वर्ग की ओर ले जाना चाहता हो।

(कवि कहते हैं) मेरे पितृसमान श्रीराम ने शिव-धनुष को तोड़ा, ज्योंही यह


१ यह संकेत है—वह युवक यह देखना चाहता है कि उसका भाला भी इस सुन्दरी के नयन-जैसा पैना है या नहीं।

१०२ | कम्ब रामायण

मधुर समाचार पुरुषों ने सुनाया, त्योंही अत्यंत आनन्द में विभोर होकर वहाँ की नारियाँ (विवाह को देखने के लिए) ऐसे दौड़ीं कि अपने दीर्घ तथा मनोहर केशपाशों के खुल जाने पर भी उन्हें बाँधने की या मेखला की मणियों के टूटकर गिर जाने पर भी उन्हें उठाने की सुध नहीं रही।

मत्त हस्तियों तथा कामिनियों से शंकित रहनेवाले विप्रजन हाथों में छाता और कमंडल लिये हुए, (प्राणायाम के समय) नासिका पर लगे रहनेवाले अपने हाथ को (चलते समय भी) नीचे की ओर नहीं गिराकर उचक-उचककर डग भरते हुए (अर्थात्, ऐंड़ी को पृथ्वी पर न लगाकर सावधानी से अशुद्ध स्थानों से बचकर प्रयत्नपूर्वक डग रखते हुए) आगे-आगे निकले जा रहे हैं।

सुगन्धित पुष्पधारी कुंतलों से सुशोभित कुछ नारियाँ अपने नयनों में (श्रीरामचन्द्र का) प्रतिबिंब देखकर समझती हैं कि स्वयं श्रीराम ही आ गये हैं और कहती हैं कि 'हमारा स्वागत करने के लिए तुम्हीं आ गये हो आओ हमारे रथ में बैठ जाओ', यों कहकर रथ की ओर अपना हाथ झुकाकर संकेत करती हैं।

शब्दायमान रथ, हाथी, घोड़े बड़े-बड़े नगाड़े—सर्वत्र भरे हुए हैं। उनके कोलाहल से एक का कहना दूसरा सुन नहीं पाता, अतः सब गूँगे के जैसे चल रहे हैं।

अत्यंत झीने मकड़े के जाल-जैसे वस्त्र पहने हुई, भ्रमर से गुंजरित पुष्पों से अलंकृत केशोंवाली रमणियों का समूह अपने पैरों की पायलों की रुनझुनाहट के कारण पक्षियों के कलरव से भरे तालाब की समानता करता है।

स्वच्छ तरंगों से शोभित समुद्र से अद्भुत लक्ष्मी की समता करनेवाली कुछ नारियाँ झीने वस्त्र से जब देखती हैं तब उनकी आँखों को देखकर पुरुषों के नयन कोलाहल कर उठते हैं, मानों मत्तगजों के मद को देखकर मोद-भरे भ्रमर कोलाहल भर रहे हों।*

(पुरुषों के) प्राणों को भेदकर चलनेवाली तीक्ष्ण नील नयनोंवाली नारियों के नूपुर 'उल्लै' (नामक) वाद्य के समान बज रहे हैं। उसके लिए सहायक वाद्य बनकर घोड़े हिनहिनाने लगते हैं जैसे (आकाश में) उठनेवाले मेघ गर्जन कर रहे हों।

पृथ्वी देवी के हृदय को पुलकित करती हुई अपना मृदुपद रखनेवाली रमणियों के उज्ज्वल मुख को देखकर कुछ युवकों के नयन, यह समझकर आनंदित हो रहे हैं कि विकसित कमल-पुष्पों से मंडमान भ्रमर विहरण कर रहे हैं, उन युवकों की भावना से मन्मथ भी आनंदित हो रहा है।

मन के लिए भी अगोचर (अतिसूक्ष्म) कटि, मनोहर श्रेष्ठ प्रवाल जैसे अधर तथा किन्नर** के जैसे मधुर कण्ठवाली तरुणियों के रूपरूपी काँचे हुए लाल नारियल-जैसे कुचों से


* नूपुर के कलरव एवं कमलों से और कलहंस एवं मणिमय वस्त्र पहने हुई नारियों से समानता दिखाई गई है।—अनु०
** किन्नर-जातियों के सम्बन्ध में ऐसा कहने का रिवाज कहते हैं। ये मानों पक्षी होनेके कारण पक्षी होने...—अनु०

बालकाण्ड १०३

गिरा हुआ सुगन्ध-लेप और (सेना के पैरों से उठी) धूल—दोनों मिलकर (आकाश में) भर गये।

बड़े-बड़े चित्रमय रथों पर सवार हो उपयुक्त प्रकार के असंख्य नर और नारियाँ बड़ा शोर मचाते हुए अपने मार्ग में आगे बढ़ते जा रहे हैं।

लगाम-लगे घोड़े, रथ तथा वीर, सर्वत्र दल बाँधकर तेजी के साथ चल रहे हैं; उससे अति शीघ्रता से ऊपर उठी हुई धूल सर्वत्र फैल गई है और बादलों के जलबहाग करने-वाले सजल रन्ध्रों में भी जाकर भर गई है, तथा दिशाओं में स्थित गजों के मदजलप्रवाही रन्ध्रों में भी घुस गई है।

(उस सेना के वीरों ने) ढाल पकड़े हुए अपने बाँये हाथ में (दाहिने हाथ में रहनेवाले) चमकते हुए करवाल को भी पकड़ रखा है, और रुचिर रत्नमय सोने के कड़ों से भूषित (अपने) दायें हाथ में, 'कटक' (नामक पदभूषण) से शोभित अपनी पत्नियों की चूड़ियों से अलंकृत कर-पल्लव को पकड़कर स्वर्ण-मुखपट्टों में विभूषित हाथियों के मण्डल के कारण सिलौए (बने) रास्ते पर धीरे-धीरे पैर रखते हुए जा रहे थे।

खेतों में, सरोवरों में तथा छोटे-छोटे जलाशयों में बहुलता से खिले हुए कुमुद-उत्पल, रक्तकमल आदि (सुन्दरियों के) हाथ, चेहरे, मुख तथा नयन की छवि उपस्थित करते हैं; जिन्हें देखकर वे रमणियाँ अपने पतियों से प्रार्थना करती हैं कि ये पुष्प तोड़कर हमें ला दो।

पंक्तियों में बाँधे गये घोड़ों पर से कुछ सुन्दरीयाँ पृथ्वी पर उतर गईं। इतने में मत्तगज को निकट आते देखकर, डर गईं। (उनके) सुग्रथित केशभाग शिथिल हो खिसक पड़े। श्रेष्ठ रत्नाभरण टूटकर गिर गये और मनोहर कटि-वस्त्र भी ढीले पड़कर शरीर से खिसकने लगे; तो अपने पल्लव-करों से अपने ढीले वस्त्रों को पकड़कर, मयूरों के समान लड़खड़ाती हुईं, मार्ग में हट गईं।

छत्र, हाथी, मयूर-पंखों के बने पंखे और ध्वजाओं के समूह ने मिल-जुलकर समस्त खाली स्थानों को आवृत कर लिया है और अंधकार उत्पन्न कर दिया है। हथियार, किरीट और आभूषण अपनी आभा से धूप फैला रहे हैं। अतः, उस सेना के मार्ग पर एक साथ ही रात्रि तथा दिन भी वर्त्तमान हो रहे हैं।

'पलाश पुष्प-सदृश अधर, मुक्ता-सदृश दाँत, तथा मंदहास से सुशोभित सुन्दरियों के रमणीय मुख (नामक) कमल पर के तीक्ष्ण खड्ग (नयन) भीड़ को चीरकर निकल जायेंगे। अतः तुमलोग मार्ग छोड़कर हट जाओ' - इस प्रकार कहते हुए सूर्य-समान उज्ज्वल शरीरवाले पुरुष मार्ग छोड़ देते हैं।

दुस्तर भीड़ के कारण मार्ग में, मुक्ताहार और रत्नहार टूटकर बिखरे हुए हैं। कलाप नामक सोलह लड़ियोंवाली मेखला से आवृत तथा सर्पफण-सदृश जघनवाली रमणियाँ, (मार्ग पर बिखरे हुए मोतियों और रत्नों के पैरों में चुभने से) लड़खड़ाती हैं, तो उनके स्वर्णमय नूपुर भी रो उठते हैं; 'हमसे इस मार्ग पर चला नहीं जायगा'-यो कहकर वे मार्ग के मध्य में रुकी रह जाती हैं।

१०४ | कंब रामायण

उत्तम वाद्य जब मेघ के जैसे घोर गर्जन कर उठते हैं, तब गाड़ियों में जुते हुए बड़े-बड़े बैल भड़क उठते हैं, हंस पक्षियों के सदृश रमणियाँ इधर-उधर भाग जाती हैं, बैल रस्सियों से बँधे हुए सामानों को इधर-उधर बिखेरकर बंधन-मुक्त हो जाते हैं, जैसे योगी संसार के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।

पर्वत-जैसे हाथी कहीं-कहीं जलाशयों को देखते ही उनमें उतर पड़ते थे, तब उनके महावत हवा के जैसे तेज चलनेवाले कमान के गोलों से उन्हें मारते थे, फिर भी वे हाथी उन चोटों की परवाह किये बिना (किसी रमणी के) कसे हुए स्तन-समान कुंभों और दाँतों को बाहर किये हुए खड़े रह जाते थे, मानो क्षीरसागर में तालवृक्ष-सदृश शुंडवाला ऐरावत खड़ा हो।

काली मिट्टी-जैसे केशों, शूल-तुल्य नेत्रों, अमृतवर्षी कुमुद-तुल्य रक्ताधरों से विभूषित गायिकाओं के साथ, उत्कृष्ट वीणा-वादन में चतुर 'बाण' (कहलानेवाले गायक), किन्नरी के समान, घोड़ों पर सवार होकर 'नैवल्य' (नामक) राग का विशुद्ध आलाप करते हुए जा रहे थे, मानो श्रोताओं के कानों में मधु की वर्षा कर रहे हों।

महावत के अंकुश उठाते ही, निर्झर-युक्त पर्वत-समान हाथी बिगड़ उठता था और लोग तितर-बितर हो जाते थे। मद-भरे छोटी आँखोंवाले बाल-हाथियों पर के भ्रमर, जिनके पंख फूले हुए थे, दूसरे हाथी पर जा बैठते थे और फिर किसी हथिनों के पीछे-पीछे उड़कर उसपर बैठी हुई किसी रमणी की बिखरी अलकों से टकरा जाते थे।

चक्रवर्ती की प्रेयसियाँ रवाना हुईं, तो पूर्णचंद्र के दर्शन से उमड़े हुए नील समुद्र के समान भेरियाँ बज उठीं। हाथी, रथ, नाट्यशील अश्व, रक्तरंजित शूल समान नयन-युक्त नारियाँ और नर पंक्ति बाँधकर रमणीय ढंग से शीघ्रगति के साथ चलने लगे।

तालाबों में विकसित मनोहर कमल-वन के मध्य शोभायमान किसी हंसिनी के समान केकयराज-पुत्री, सहस्रों गणिकाओं के झुंड से घिरी हुई, अति सावधानी के साथ, रत्नों से अलंकृत शिविका में आसीन हो चली, तब मधु-मधुर संगीत होने लगे, (उनके रूप को देखकर) देवलोक की सुन्दर्याँ भी लज्जित हो गईं।

अकारण ही अग्नि-ज्वाला उगलनेवाली क्रोधी आँखोंवाले, वेत्रदंडधारी तथा (आपाद) लटकनेवाले अँगरखा पहने हुए कंचुकी, उन मधुरभाषिणी तथा अपूर्व सौंदर्य-विशिष्ट स्त्रियों के पद-मार्ग की यथाक्रम रखवाली करते हुए जा रहे थे, जो किंकिणी-भूषित घोड़ों पर या पैदल ही जा रही थीं।

रुचिर नूपुर पहने हुई, खच्चरों पर सवार, लाल रेखाओं से युक्त कमल-सदृश विशाल नेत्रवाली दो सहस्र नारियों से घिरी हुई, युगल (लक्ष्मण और शत्रुघ्न) बच्चों को जन्म देनेवाली (सुमित्रा) देवी, नीलरत्न-खचित शिविका में बैठकर ऐसी चलीं कि दर्शक समझने लगे कि जल-भरे बादल पर चमकनेवाली विद्युल्लता ही जा रही हैं, उस समय वीणागान भी हो रहे थे।

अपने मनोहर करों में मयूर, हंस, छोटे शुक, सारिकाएँ, प्रतिमाएँ, सद्यः आवरण से निकले हुए शंख-समान चामर आदि वस्तुओं को लिये हुए असंख्य नारियाँ (सुमित्रा के)

बालकाण्ड १०५

पार्श्व मे जा रही थी ? उनको देखने से ऐसा लगता था कि सप्त समुद्रो से घिरी इस पृथ्वी पर अब अन्यत्र कही स्त्री ही नही रह गई है (अर्थात्, सब यही आ एकत्र हो गई है।)

महाभाग (रामचन्द्र) को जन्म देनेवाली (कौशल्या देवी) (एक रत्नमय) शिविका पर सवार होकर चलीं, तो ऐसा लगा, मानो उज्ज्वल श्वेत दत तथा सेमल के फूल-जैसे अधरवाले (कौशल्या के) वदन को देखकर, धवल चन्द्रमा की भ्रांति से असंख्य नक्षत्र आ एकत्र हुए हो। निपुण गायक भ्रमर गुजार-सदृश 'पाडि' (नामक) राग अलाप रहे थे और देवगण (कौशल्या को) नमस्कार कर रहे थे।

कुबड़े, बौने, ठिगने तथा दासियाँ इनको लेकर दूध-जैसे सफेद घोड़े हंस-पक्षियो के समान धरती पर चल रहे थे। भ्रमर, मधुमक्खी आदि से भरे पुष्पो से अलंकृत केशवाली रमणियों उनके पाश्र्वों मे चल रही थी।

कली-जैसे स्तनो और अवर्णनीय लक्ष्मी से भी अधिक सौंदर्य से विशिष्ट साठ सहस्र नारियाँ, प्रवाल, रत्न, स्वर्ण, उज्ज्वल मरकत, मुक्ता तथा अन्य अनुपम अलंकरणो से युक्त, चित्रस्थ प्रतिमाओ के समान, गाड़ियों मे सवार हो (कौशल्या देवी को) घेरकर चली।

पातिव्रत्य से श्रेष्ठ अरुन्धती के पति (वसिष्ठ) छत्र की छाया में, मुक्ता-खचित शिविका में बैठकर, हंसवाहन ब्रह्मदेव के सदृश चले। कर्णो के द्वारा अमृत-सदृश शास्त्रो को अघाकर पीये हुए तथा अपने हाथो से देवताओ को हवि देने का सामर्थ्य रखनेवाले दो सहस्र ब्राह्मण उन्हे घेरकर चले।

युद्ध मे समर्थ हाथी, घोड़े, सुन्दर रथ, स्वर्णमय वीर-वलयधारी पदाति, उन (वसिष्ठ) के आगे-पीछे ऐसे जा रहे थे, मानो महान् पर्वत को घेरकर समुद्र जा रहा हो। जयलक्ष्मी से सुशोभित वक्षवाले, देवसेना को भी वेधने मे चतुर तीरन्दाज अतिरथी, दोनो वीर (भरत और शत्रुघ्न) वसिष्ठ के आगे-पीछे इस प्रकार जा रहे थे, जैसे विश्वामित्र के आगे और पीछे राम और लक्ष्मण जा रहे हो।

मुक्ता तथा मनोहर हीरे से खचित आभरण धारण किये हुए (दशरथ) चक्रवर्ती ने अपने नित्य कर्म पूरे किये। चक्रायुध धारण करनेवाले विष्णु के पद अपने शिर पर रखे। ब्राह्मणो को अनन्त रत्न, स्वर्ण, गायो की पक्तियाँ, भूमि आदि आदर के साथ दान कर एक अच्छे मुहूर्त्त में प्रस्थान किया।

आठ सहस्र ब्राह्मण रत्न-कलश हाथ मे लिये हुए, अर्थगंभीर वेद-मंत्रों का पाठ करते हुए, दुर्वा से मंत्रपूत जल का प्रोक्षण करते हुए, आशीष दे रहे थे। मंगल-वचन कहने-वाली, मधुर अरुण मुखवाली, भारी रत्न-खचित मेखला धारण करनेवाली, वंदीजन की परंपरा मे उत्पन्न, अनेक रमणियाँ प्रस्तुति गा रही थी।

(उस समय) कुछ लोग कहते थे कि यह शख क्यो बज रहा है? कुछ कहते थे कि कदाचित् राजा प्रस्थान कर चुके हैं। यो कहते हुए बड़ी भीड़ लगाकर राजा लोग आये ? (उनमे से) कुछ कहते कि चक्रवर्ती ने मेरा अवलोकन किया और कुछ कहते कि हाय! मुझपर चक्रवर्ती का कटाक्ष नही पड़ा। कोई कहता, हाय। मेरा कुण्डल गिर पड़ा। कुछ

१०६ | कंब रामायण

कहते, अब उस चक्रवर्ती के समीप पहुँचना दुष्कर है। यों, चक्रवर्ती के चारो ओर राजा लोगो की भीड एकत्र हो गई।

स्वर्ण-कंकणधारिणी रमणियो को लेकर स्वर्ण-किंकिणीधारी अश्व-समूह (चक्रवर्ती के) चारो ओर ऐसे जा रहा था, मानो कमल-पुष्पो से भरा समुद्र हो। विजयी शूलधारी राजाओ के अरुणहस्त-रूपी कमल मुकुलित हो (नमस्कार की मुद्रा मे) खडे थे। इनसे घिरे हुए चक्रवर्ती, अपर सूर्य के सदृश रथ पर चढकर चले।

उस समय (दशरथ की सेना से) उठी हुई धूलि-राशि ने अंतराल को भर दिया और गगन मे जा लगी और फिर वहाँ से लौटकर सभी विशाल दिशाओ को यों आवृत्त कर लिया कि लोगो को एक दूसरे को पहचानना भी कठिन हो गया। फिर, वह सगर-पुत्रो से वैर-सा करती हुई जाकर (उनके द्वारा खोदे गये) तरंगायित समुद्र को भी भरने लगी।

शंखवाद्य, मधुर बाँसुरी, शृंग-वाद्य, ताल, काहल, मंगल-भेरी--इनसे उत्पन्न ध्वनियो ने मेघ-गर्जन को भी दवा दिया। मोर-पंखो के झालर, छत्र आदि ने सूर्य की किरणो को वहाँ आने से रोक दिया। चंद्रमा वहाँ के श्वेतच्छत्रो को देखकर लज्जा से हट गया। यों, दशरथ देवताओ को भी चकित करनेवाले वैभव के साथ चले।

इन्द्र के समान दशरथ चक्रवर्ती जब जा रहे थे, तब मंत्रगान के शब्द दक्षिणावर्त्त शंख १ के शब्द, ब्राह्मणो के आशीर्वाद के शब्द, गर्जन करनेवाले नगाडो के शब्द, आलान-स्तंभ को तोड देनेवाले बलवान् हाथियो के शब्द, समय की माप रखनेवाले 'घटिक' (नामक लोगो) के वेला-सूचक शब्द--सभी दिशाओ मे सर्वत्र गूंज उठे।

जिस किसी भी दिशा मे दृष्टि जाती, वहाँ वीर-वलयधारी नरेश अपने कमल-जैसे हाथ जोडे चक्रवर्ती की दिशा मे ही (इस विचार से) देखते हुए खडे रहते थे कि चक्रवर्ती का कटाक्ष उनपर पडे। एक दूसरे को धक्का देते हुए चलनेवाले अनेक हाथी, रथ, घोडे पदाति सैनिक--इनके कारण उठी हुई धूल गगन और धरती को भरती चली।

पदाति सैनिक, हाथी, रथ, अश्व इन चारो से खूब भरी हुई सेना यदि अपने स्थान से आगे बढ भी जाना चाहे, तो उसके जाने के लिए मार्ग नही था, समुद्र जल-रूपी वस्त्र से आवृत्त धरती भी (उस सेना के भार से) अपनी पीठ लचकाने लगी। अब कहो, इस चक्रवर्ती को (अपने धर्मपूर्ण शासन से) भूमि-भार हरनेवाला कैसे कहा जाय ?

वे चक्रवर्ती इस प्रकार दो योजन दूर चलकर, स्वर्णमय (मेरु) पर्वत-सदृश चंद्र-शैल की तराई मे जाकर ठहरे। चतुरंगिनी सेना भी वही ठहर गई। उस (सेना) में रहनेवाली रमणियो के केश मन्मथ के वाहन २ बने हुए हाथी (अर्थात्, अंधकार) के जैसे थे, तथा उनके दोनो स्तन, (क्रमशः) मन्मथ के बाण बने हुए पुष्पो और मलयपर्वत पर के चंदन के लेप से सुगन्धित हो उठे थे। (१-८२)


१ शंख प्राय वामावर्त्त होते हैं, दक्षिणावर्त्त शंख अधिक मंगलप्रद माना जाता है।
२. तमिल-साहित्य मे कहीं-कही अन्धकार को मन्मथ का वाहन कहा गया है।