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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

बालकाण्ड १०३

गिरा हुआ सुगन्ध-लेप और (सेना के पैरों से उठी) धूल—दोनों मिलकर (आकाश में) भर गये।

बड़े-बड़े चित्रमय रथों पर सवार हो उपयुक्त प्रकार के असंख्य नर और नारियाँ बड़ा शोर मचाते हुए अपने मार्ग में आगे बढ़ते जा रहे हैं।

लगाम-लगे घोड़े, रथ तथा वीर, सर्वत्र दल बाँधकर तेजी के साथ चल रहे हैं; उससे अति शीघ्रता से ऊपर उठी हुई धूल सर्वत्र फैल गई है और बादलों के जलबहाग करने-वाले सजल रन्ध्रों में भी जाकर भर गई है, तथा दिशाओं में स्थित गजों के मदजलप्रवाही रन्ध्रों में भी घुस गई है।

(उस सेना के वीरों ने) ढाल पकड़े हुए अपने बाँये हाथ में (दाहिने हाथ में रहनेवाले) चमकते हुए करवाल को भी पकड़ रखा है, और रुचिर रत्नमय सोने के कड़ों से भूषित (अपने) दायें हाथ में, 'कटक' (नामक पदभूषण) से शोभित अपनी पत्नियों की चूड़ियों से अलंकृत कर-पल्लव को पकड़कर स्वर्ण-मुखपट्टों में विभूषित हाथियों के मण्डल के कारण सिलौए (बने) रास्ते पर धीरे-धीरे पैर रखते हुए जा रहे थे।

खेतों में, सरोवरों में तथा छोटे-छोटे जलाशयों में बहुलता से खिले हुए कुमुद-उत्पल, रक्तकमल आदि (सुन्दरियों के) हाथ, चेहरे, मुख तथा नयन की छवि उपस्थित करते हैं; जिन्हें देखकर वे रमणियाँ अपने पतियों से प्रार्थना करती हैं कि ये पुष्प तोड़कर हमें ला दो।

पंक्तियों में बाँधे गये घोड़ों पर से कुछ सुन्दरीयाँ पृथ्वी पर उतर गईं। इतने में मत्तगज को निकट आते देखकर, डर गईं। (उनके) सुग्रथित केशभाग शिथिल हो खिसक पड़े। श्रेष्ठ रत्नाभरण टूटकर गिर गये और मनोहर कटि-वस्त्र भी ढीले पड़कर शरीर से खिसकने लगे; तो अपने पल्लव-करों से अपने ढीले वस्त्रों को पकड़कर, मयूरों के समान लड़खड़ाती हुईं, मार्ग में हट गईं।

छत्र, हाथी, मयूर-पंखों के बने पंखे और ध्वजाओं के समूह ने मिल-जुलकर समस्त खाली स्थानों को आवृत कर लिया है और अंधकार उत्पन्न कर दिया है। हथियार, किरीट और आभूषण अपनी आभा से धूप फैला रहे हैं। अतः, उस सेना के मार्ग पर एक साथ ही रात्रि तथा दिन भी वर्त्तमान हो रहे हैं।

'पलाश पुष्प-सदृश अधर, मुक्ता-सदृश दाँत, तथा मंदहास से सुशोभित सुन्दरियों के रमणीय मुख (नामक) कमल पर के तीक्ष्ण खड्ग (नयन) भीड़ को चीरकर निकल जायेंगे। अतः तुमलोग मार्ग छोड़कर हट जाओ' - इस प्रकार कहते हुए सूर्य-समान उज्ज्वल शरीरवाले पुरुष मार्ग छोड़ देते हैं।

दुस्तर भीड़ के कारण मार्ग में, मुक्ताहार और रत्नहार टूटकर बिखरे हुए हैं। कलाप नामक सोलह लड़ियोंवाली मेखला से आवृत तथा सर्पफण-सदृश जघनवाली रमणियाँ, (मार्ग पर बिखरे हुए मोतियों और रत्नों के पैरों में चुभने से) लड़खड़ाती हैं, तो उनके स्वर्णमय नूपुर भी रो उठते हैं; 'हमसे इस मार्ग पर चला नहीं जायगा'-यो कहकर वे मार्ग के मध्य में रुकी रह जाती हैं।