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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

१०४ | कंब रामायण

उत्तम वाद्य जब मेघ के जैसे घोर गर्जन कर उठते हैं, तब गाड़ियों में जुते हुए बड़े-बड़े बैल भड़क उठते हैं, हंस पक्षियों के सदृश रमणियाँ इधर-उधर भाग जाती हैं, बैल रस्सियों से बँधे हुए सामानों को इधर-उधर बिखेरकर बंधन-मुक्त हो जाते हैं, जैसे योगी संसार के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।

पर्वत-जैसे हाथी कहीं-कहीं जलाशयों को देखते ही उनमें उतर पड़ते थे, तब उनके महावत हवा के जैसे तेज चलनेवाले कमान के गोलों से उन्हें मारते थे, फिर भी वे हाथी उन चोटों की परवाह किये बिना (किसी रमणी के) कसे हुए स्तन-समान कुंभों और दाँतों को बाहर किये हुए खड़े रह जाते थे, मानो क्षीरसागर में तालवृक्ष-सदृश शुंडवाला ऐरावत खड़ा हो।

काली मिट्टी-जैसे केशों, शूल-तुल्य नेत्रों, अमृतवर्षी कुमुद-तुल्य रक्ताधरों से विभूषित गायिकाओं के साथ, उत्कृष्ट वीणा-वादन में चतुर 'बाण' (कहलानेवाले गायक), किन्नरी के समान, घोड़ों पर सवार होकर 'नैवल्य' (नामक) राग का विशुद्ध आलाप करते हुए जा रहे थे, मानो श्रोताओं के कानों में मधु की वर्षा कर रहे हों।

महावत के अंकुश उठाते ही, निर्झर-युक्त पर्वत-समान हाथी बिगड़ उठता था और लोग तितर-बितर हो जाते थे। मद-भरे छोटी आँखोंवाले बाल-हाथियों पर के भ्रमर, जिनके पंख फूले हुए थे, दूसरे हाथी पर जा बैठते थे और फिर किसी हथिनों के पीछे-पीछे उड़कर उसपर बैठी हुई किसी रमणी की बिखरी अलकों से टकरा जाते थे।

चक्रवर्ती की प्रेयसियाँ रवाना हुईं, तो पूर्णचंद्र के दर्शन से उमड़े हुए नील समुद्र के समान भेरियाँ बज उठीं। हाथी, रथ, नाट्यशील अश्व, रक्तरंजित शूल समान नयन-युक्त नारियाँ और नर पंक्ति बाँधकर रमणीय ढंग से शीघ्रगति के साथ चलने लगे।

तालाबों में विकसित मनोहर कमल-वन के मध्य शोभायमान किसी हंसिनी के समान केकयराज-पुत्री, सहस्रों गणिकाओं के झुंड से घिरी हुई, अति सावधानी के साथ, रत्नों से अलंकृत शिविका में आसीन हो चली, तब मधु-मधुर संगीत होने लगे, (उनके रूप को देखकर) देवलोक की सुन्दर्याँ भी लज्जित हो गईं।

अकारण ही अग्नि-ज्वाला उगलनेवाली क्रोधी आँखोंवाले, वेत्रदंडधारी तथा (आपाद) लटकनेवाले अँगरखा पहने हुए कंचुकी, उन मधुरभाषिणी तथा अपूर्व सौंदर्य-विशिष्ट स्त्रियों के पद-मार्ग की यथाक्रम रखवाली करते हुए जा रहे थे, जो किंकिणी-भूषित घोड़ों पर या पैदल ही जा रही थीं।

रुचिर नूपुर पहने हुई, खच्चरों पर सवार, लाल रेखाओं से युक्त कमल-सदृश विशाल नेत्रवाली दो सहस्र नारियों से घिरी हुई, युगल (लक्ष्मण और शत्रुघ्न) बच्चों को जन्म देनेवाली (सुमित्रा) देवी, नीलरत्न-खचित शिविका में बैठकर ऐसी चलीं कि दर्शक समझने लगे कि जल-भरे बादल पर चमकनेवाली विद्युल्लता ही जा रही हैं, उस समय वीणागान भी हो रहे थे।

अपने मनोहर करों में मयूर, हंस, छोटे शुक, सारिकाएँ, प्रतिमाएँ, सद्यः आवरण से निकले हुए शंख-समान चामर आदि वस्तुओं को लिये हुए असंख्य नारियाँ (सुमित्रा के)