भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 117

बालकाण्ड १०५

पार्श्व मे जा रही थी ? उनको देखने से ऐसा लगता था कि सप्त समुद्रो से घिरी इस पृथ्वी पर अब अन्यत्र कही स्त्री ही नही रह गई है (अर्थात्, सब यही आ एकत्र हो गई है।)

महाभाग (रामचन्द्र) को जन्म देनेवाली (कौशल्या देवी) (एक रत्नमय) शिविका पर सवार होकर चलीं, तो ऐसा लगा, मानो उज्ज्वल श्वेत दत तथा सेमल के फूल-जैसे अधरवाले (कौशल्या के) वदन को देखकर, धवल चन्द्रमा की भ्रांति से असंख्य नक्षत्र आ एकत्र हुए हो। निपुण गायक भ्रमर गुजार-सदृश 'पाडि' (नामक) राग अलाप रहे थे और देवगण (कौशल्या को) नमस्कार कर रहे थे।

कुबड़े, बौने, ठिगने तथा दासियाँ इनको लेकर दूध-जैसे सफेद घोड़े हंस-पक्षियो के समान धरती पर चल रहे थे। भ्रमर, मधुमक्खी आदि से भरे पुष्पो से अलंकृत केशवाली रमणियों उनके पाश्र्वों मे चल रही थी।

कली-जैसे स्तनो और अवर्णनीय लक्ष्मी से भी अधिक सौंदर्य से विशिष्ट साठ सहस्र नारियाँ, प्रवाल, रत्न, स्वर्ण, उज्ज्वल मरकत, मुक्ता तथा अन्य अनुपम अलंकरणो से युक्त, चित्रस्थ प्रतिमाओ के समान, गाड़ियों मे सवार हो (कौशल्या देवी को) घेरकर चली।

पातिव्रत्य से श्रेष्ठ अरुन्धती के पति (वसिष्ठ) छत्र की छाया में, मुक्ता-खचित शिविका में बैठकर, हंसवाहन ब्रह्मदेव के सदृश चले। कर्णो के द्वारा अमृत-सदृश शास्त्रो को अघाकर पीये हुए तथा अपने हाथो से देवताओ को हवि देने का सामर्थ्य रखनेवाले दो सहस्र ब्राह्मण उन्हे घेरकर चले।

युद्ध मे समर्थ हाथी, घोड़े, सुन्दर रथ, स्वर्णमय वीर-वलयधारी पदाति, उन (वसिष्ठ) के आगे-पीछे ऐसे जा रहे थे, मानो महान् पर्वत को घेरकर समुद्र जा रहा हो। जयलक्ष्मी से सुशोभित वक्षवाले, देवसेना को भी वेधने मे चतुर तीरन्दाज अतिरथी, दोनो वीर (भरत और शत्रुघ्न) वसिष्ठ के आगे-पीछे इस प्रकार जा रहे थे, जैसे विश्वामित्र के आगे और पीछे राम और लक्ष्मण जा रहे हो।

मुक्ता तथा मनोहर हीरे से खचित आभरण धारण किये हुए (दशरथ) चक्रवर्ती ने अपने नित्य कर्म पूरे किये। चक्रायुध धारण करनेवाले विष्णु के पद अपने शिर पर रखे। ब्राह्मणो को अनन्त रत्न, स्वर्ण, गायो की पक्तियाँ, भूमि आदि आदर के साथ दान कर एक अच्छे मुहूर्त्त में प्रस्थान किया।

आठ सहस्र ब्राह्मण रत्न-कलश हाथ मे लिये हुए, अर्थगंभीर वेद-मंत्रों का पाठ करते हुए, दुर्वा से मंत्रपूत जल का प्रोक्षण करते हुए, आशीष दे रहे थे। मंगल-वचन कहने-वाली, मधुर अरुण मुखवाली, भारी रत्न-खचित मेखला धारण करनेवाली, वंदीजन की परंपरा मे उत्पन्न, अनेक रमणियाँ प्रस्तुति गा रही थी।

(उस समय) कुछ लोग कहते थे कि यह शख क्यो बज रहा है? कुछ कहते थे कि कदाचित् राजा प्रस्थान कर चुके हैं। यो कहते हुए बड़ी भीड़ लगाकर राजा लोग आये ? (उनमे से) कुछ कहते कि चक्रवर्ती ने मेरा अवलोकन किया और कुछ कहते कि हाय! मुझपर चक्रवर्ती का कटाक्ष नही पड़ा। कोई कहता, हाय। मेरा कुण्डल गिर पड़ा। कुछ

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 117, कुल 549 में से · BharatKosha