कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ | कंब रामायण
कहते, अब उस चक्रवर्ती के समीप पहुँचना दुष्कर है। यों, चक्रवर्ती के चारो ओर राजा लोगो की भीड एकत्र हो गई।
स्वर्ण-कंकणधारिणी रमणियो को लेकर स्वर्ण-किंकिणीधारी अश्व-समूह (चक्रवर्ती के) चारो ओर ऐसे जा रहा था, मानो कमल-पुष्पो से भरा समुद्र हो। विजयी शूलधारी राजाओ के अरुणहस्त-रूपी कमल मुकुलित हो (नमस्कार की मुद्रा मे) खडे थे। इनसे घिरे हुए चक्रवर्ती, अपर सूर्य के सदृश रथ पर चढकर चले।
उस समय (दशरथ की सेना से) उठी हुई धूलि-राशि ने अंतराल को भर दिया और गगन मे जा लगी और फिर वहाँ से लौटकर सभी विशाल दिशाओ को यों आवृत्त कर लिया कि लोगो को एक दूसरे को पहचानना भी कठिन हो गया। फिर, वह सगर-पुत्रो से वैर-सा करती हुई जाकर (उनके द्वारा खोदे गये) तरंगायित समुद्र को भी भरने लगी।
शंखवाद्य, मधुर बाँसुरी, शृंग-वाद्य, ताल, काहल, मंगल-भेरी--इनसे उत्पन्न ध्वनियो ने मेघ-गर्जन को भी दवा दिया। मोर-पंखो के झालर, छत्र आदि ने सूर्य की किरणो को वहाँ आने से रोक दिया। चंद्रमा वहाँ के श्वेतच्छत्रो को देखकर लज्जा से हट गया। यों, दशरथ देवताओ को भी चकित करनेवाले वैभव के साथ चले।
इन्द्र के समान दशरथ चक्रवर्ती जब जा रहे थे, तब मंत्रगान के शब्द दक्षिणावर्त्त शंख १ के शब्द, ब्राह्मणो के आशीर्वाद के शब्द, गर्जन करनेवाले नगाडो के शब्द, आलान-स्तंभ को तोड देनेवाले बलवान् हाथियो के शब्द, समय की माप रखनेवाले 'घटिक' (नामक लोगो) के वेला-सूचक शब्द--सभी दिशाओ मे सर्वत्र गूंज उठे।
जिस किसी भी दिशा मे दृष्टि जाती, वहाँ वीर-वलयधारी नरेश अपने कमल-जैसे हाथ जोडे चक्रवर्ती की दिशा मे ही (इस विचार से) देखते हुए खडे रहते थे कि चक्रवर्ती का कटाक्ष उनपर पडे। एक दूसरे को धक्का देते हुए चलनेवाले अनेक हाथी, रथ, घोडे पदाति सैनिक--इनके कारण उठी हुई धूल गगन और धरती को भरती चली।
पदाति सैनिक, हाथी, रथ, अश्व इन चारो से खूब भरी हुई सेना यदि अपने स्थान से आगे बढ भी जाना चाहे, तो उसके जाने के लिए मार्ग नही था, समुद्र जल-रूपी वस्त्र से आवृत्त धरती भी (उस सेना के भार से) अपनी पीठ लचकाने लगी। अब कहो, इस चक्रवर्ती को (अपने धर्मपूर्ण शासन से) भूमि-भार हरनेवाला कैसे कहा जाय ?
वे चक्रवर्ती इस प्रकार दो योजन दूर चलकर, स्वर्णमय (मेरु) पर्वत-सदृश चंद्र-शैल की तराई मे जाकर ठहरे। चतुरंगिनी सेना भी वही ठहर गई। उस (सेना) में रहनेवाली रमणियो के केश मन्मथ के वाहन २ बने हुए हाथी (अर्थात्, अंधकार) के जैसे थे, तथा उनके दोनो स्तन, (क्रमशः) मन्मथ के बाण बने हुए पुष्पो और मलयपर्वत पर के चंदन के लेप से सुगन्धित हो उठे थे। (१-८२)
१ शंख प्राय वामावर्त्त होते हैं, दक्षिणावर्त्त शंख अधिक मंगलप्रद माना जाता है।
२. तमिल-साहित्य मे कहीं-कही अन्धकार को मन्मथ का वाहन कहा गया है।