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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 549 में से

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पृष्ठ 119

अध्याय १४

चंद्रशैल पटल

(हाथियों पर बैठी सुन्दरियाँ अपने पतियों के सहारे नीचे उतर पड़ीं) तब मुक्ताहार-विभूषित, मेरु को भी अपने गुरुत्व से पराजित करनेवाले (अपने प्रियतम के) प्राणों को हरने के इच्छुक सारिका-तुल्य मधुर बोलीवाली कुछ रमणियो ने, दृढ धनुर्धारी मन्मथ के आश्रयभूत अपने स्तनो को, अपने पतियो की भुजाओ के साथ (आलिंगन मे) बाँध दिया; इधर उँचे और गगन-चुम्बी वटवृक्ष को भी तोड़नेवाले, सरोवर को जाने के इच्छुक, दृढ धनुर्धारी मन्मथ-समान वीरो को ले चलनेवाले कुछ हाथी$^१$ भी देवदारु तथा चंदन के वृक्षो से बाँध दिये गये ।

जो शत्रु सम्मुख होकर युद्ध करने से नही दबता, उसे कोई चतुर नरेश असावधानी-रहित विवेक के साथ राजतन्त्र से उखाड़ देता है । उसी प्रकार (उँचे पेड़ से बँधे हुए) एक हाथी ने मेघ-मंडल को अपनी शाखाओ से छूनेवाले सुन्दर वृक्ष के तने को, समूल उखाड़ दिया और चलने लगा ।

कृष्ण (अपनी माता यशोदा द्वारा ऊखल से बाँध जाने पर) अपने पीछे ऊखल को भी लुढकाते हुए, अति पुष्ट तनावाले युगल अर्जुनवृक्षो के मध्य से होकर निकल गये थे और दोनो वृक्षो को बीच से तोड़कर गिरा दिया था, उसी प्रकार एक हाथी अपनी (पिछली) टाँग से बँधे आलान-स्तंभ को भी खींचता हुआ, वहाँ खड़े दो आम्रवृक्षो के मध्य से होकर निकल गया और एक साथ दोनो पेड़ो को गिराता हुआ चला गया ।

(हाथी के मन मे) वैर उत्पन्न कर देनेवाले कोप को दूर करने के लिए, मीठी बोली बोलकर निपुणता के साथ उसको वश मे लानेवाला कोई महावत, किसी (राजा के) मंत्री जैसा था, और वह हाथी, विविध शास्त्रो के अनुकूल हित-वचन धीरे-धीरे कहने पर भी उसे न सुननेवाले किसी (उद्धत) राजा के जैसा था ।

(कोई हाथी किसी जंगली हाथी की गंध पाकर क्रुद्ध हो उठता है और उसकी खोज में निकल पड़ता है ।) अंकुश से आहत कोई मत्त गज, अपने शत्रु हाथी को न देखकर मेघ के जैसे गरजता हुआ, वनगज के मार्ग का अनुसरण करता हुआ वायुवेग से चल पड़ा (क्रोध के आवेश में वह अपने मार्ग मे आये विविध प्राणियो को मारता हुआ चला), तो बाज, चील आदि पक्षी झुण्ड बाँधकर उसके पीछे-पीछे उड़े । वह दृश्य ऐसा था, जैसे किसी नदी के मार्ग मे दूसरी नदी की धारा वह चली हो ।

बहुत-से हाथियो की पंक्तियाँ जहाँ बँधी हुई थी, उस स्थान मे कही से (सप्तपर्णी वृक्षो की) मदजल की-सी गंध आई, तो एक हाथी पागल हो उठा और अपने को दबाने-वाले अंकुश को झटके से दूर हटाकर मदगंध की दिशा मे दौड़ चला और पुष्पो से लदे (सप्तपर्णी) वृक्ष को उखाड़, अपने अगले दोनो पैरो से रौंदकर चूर-चूर कर दिया ।


१. मूल में स्तन और हाथी दोनो के लिए एक ही विशेषण का प्रयोग किया गया है और श्लेष के आधार पर दो अलग-अलग अर्थ निकाले गये है ।