कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें१०२ | कम्ब रामायण
मधुर समाचार पुरुषों ने सुनाया, त्योंही अत्यंत आनन्द में विभोर होकर वहाँ की नारियाँ (विवाह को देखने के लिए) ऐसे दौड़ीं कि अपने दीर्घ तथा मनोहर केशपाशों के खुल जाने पर भी उन्हें बाँधने की या मेखला की मणियों के टूटकर गिर जाने पर भी उन्हें उठाने की सुध नहीं रही।
मत्त हस्तियों तथा कामिनियों से शंकित रहनेवाले विप्रजन हाथों में छाता और कमंडल लिये हुए, (प्राणायाम के समय) नासिका पर लगे रहनेवाले अपने हाथ को (चलते समय भी) नीचे की ओर नहीं गिराकर उचक-उचककर डग भरते हुए (अर्थात्, ऐंड़ी को पृथ्वी पर न लगाकर सावधानी से अशुद्ध स्थानों से बचकर प्रयत्नपूर्वक डग रखते हुए) आगे-आगे निकले जा रहे हैं।
सुगन्धित पुष्पधारी कुंतलों से सुशोभित कुछ नारियाँ अपने नयनों में (श्रीरामचन्द्र का) प्रतिबिंब देखकर समझती हैं कि स्वयं श्रीराम ही आ गये हैं और कहती हैं कि 'हमारा स्वागत करने के लिए तुम्हीं आ गये हो आओ हमारे रथ में बैठ जाओ', यों कहकर रथ की ओर अपना हाथ झुकाकर संकेत करती हैं।
शब्दायमान रथ, हाथी, घोड़े बड़े-बड़े नगाड़े—सर्वत्र भरे हुए हैं। उनके कोलाहल से एक का कहना दूसरा सुन नहीं पाता, अतः सब गूँगे के जैसे चल रहे हैं।
अत्यंत झीने मकड़े के जाल-जैसे वस्त्र पहने हुई, भ्रमर से गुंजरित पुष्पों से अलंकृत केशोंवाली रमणियों का समूह अपने पैरों की पायलों की रुनझुनाहट के कारण पक्षियों के कलरव से भरे तालाब की समानता करता है।
स्वच्छ तरंगों से शोभित समुद्र से अद्भुत लक्ष्मी की समता करनेवाली कुछ नारियाँ झीने वस्त्र से जब देखती हैं तब उनकी आँखों को देखकर पुरुषों के नयन कोलाहल कर उठते हैं, मानों मत्तगजों के मद को देखकर मोद-भरे भ्रमर कोलाहल भर रहे हों।*
(पुरुषों के) प्राणों को भेदकर चलनेवाली तीक्ष्ण नील नयनोंवाली नारियों के नूपुर 'उल्लै' (नामक) वाद्य के समान बज रहे हैं। उसके लिए सहायक वाद्य बनकर घोड़े हिनहिनाने लगते हैं जैसे (आकाश में) उठनेवाले मेघ गर्जन कर रहे हों।
पृथ्वी देवी के हृदय को पुलकित करती हुई अपना मृदुपद रखनेवाली रमणियों के उज्ज्वल मुख को देखकर कुछ युवकों के नयन, यह समझकर आनंदित हो रहे हैं कि विकसित कमल-पुष्पों से मंडमान भ्रमर विहरण कर रहे हैं, उन युवकों की भावना से मन्मथ भी आनंदित हो रहा है।
मन के लिए भी अगोचर (अतिसूक्ष्म) कटि, मनोहर श्रेष्ठ प्रवाल जैसे अधर तथा किन्नर** के जैसे मधुर कण्ठवाली तरुणियों के रूपरूपी काँचे हुए लाल नारियल-जैसे कुचों से
* नूपुर के कलरव एवं कमलों से और कलहंस एवं मणिमय वस्त्र पहने हुई नारियों से समानता दिखाई गई है।—अनु०
** किन्नर-जातियों के सम्बन्ध में ऐसा कहने का रिवाज कहते हैं। ये मानों पक्षी होनेके कारण पक्षी होने...—अनु०