कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड १०१
अपने घुँघराले बालों पर बैठे हुए भ्रमरों को उड़ाकर, उन्हें गुञ्जारित करते हुए, मदजल बहानेवाले गज के समान एक युवक एक सुन्दरी के काले और नुकीले नयनों को देखता है और फिर अपने हाथ के भाले की ओर देखता है। १
तरग-समान काली और लम्बी घुँघराली अलकों, कमल-समान छोटे पदों तथा करवाल-समान काले नयनों से शोभित एक रमणी को देखकर कोई युवक पूछता है—परस्पर सटे हुए, आभरण-भूषित स्तनों तथा कंकण-भूषित दीर्घ बाहुओं से शोभायमान हे सुन्दरी, तुम अपनी कटि को कहाँ भूल आई ?
एक तरुणी ऐसी है, जो अपने नयनों से ही—जो यम के जैसे ही (दर्शकों के) प्राण हरनेवाले थे—बाते करती है. लेकिन अपना मुँह खोलकर कोई बात नहीं कहती है। उससे एक युवक पूछता है—हे सुन्दरी, जब तुम किसी नदी की धार में खड़ी (फँसी) रह जाओगी, तब तुम्हारे सुन्दर करों को पकड़कर किनारे पर पहुँचानेवाला कौन होगा ? (अर्थात् यदि तुम बात नहीं करोगी, तो तुम्हें बचाने की चेष्टा भी कौन करेगा ?)
(उस सेना के) ऊँट, जो इतना भारी बोझ ले जा रहे थे, जिसे उठाना भी कठिन था, स्वच्छ तथा मीठे पल्लवों को कभी नहीं खाते थे. किन्तु कडुवे (नीम आदि पेड़ों के) पत्ते ही खोजते हुए, मद्य पीने में निरत नशे के जैसे ही (लड़खड़ाते हुए) चल रहे थे। उनके मुख उनके हृदय के जैसे ही सूखे थे।
लाल नेत्र और गाढ़े अंधकार-जैसे शरीरवाले वर्बर (जाति के लोग) भारी बाँसों को उठाये हुए ऐसे चल रहे थे, जैसे मत्तगज अपने कंधे पर अंकुश और अपने को बाँधने के लिए उपयुक्त बड़े आलान भी उठाकर लिये जा रहे हों।
(एक) मत्तगज मस्त होकर अड़ गया और किसी हथनी पर सूँड़ बढ़ाने लगा। तब उस हथनी पर बैठी हुई कुछ स्त्रियाँ भयभीत होकर अपनी आँखों को हथेलियों से मूँदने लगीं। किन्तु, उनकी विशाल आँखें उन हथेलियों में समा नहीं पाईं; तो वे बहुत खिन्न होकर रह गईं।
ऐसी हथिनियों के ऊपर, जिनकी पूँछ पृथ्वी को छूती है, बैठे हुए मेखला-भूषित रमणियों के मध्य बौने भी जा रहे हैं, जैसे सद्योविकसित मनोहर पुष्प-समूह के मध्य कलुषों पर बैठकर मेढ़क जा रहे हों।
एक अश्व, पुष्पलता-सदृश एक सुन्दरी को अपनी पीठ पर लेकर अपने पैरों को झुका-झुकाकर फाँद रहा है। बड़े आलान से बँधा रहनेवाला एक हाथी उसके पीछे दौड़ता है, तो भी वह अश्व उसके काबू में नहीं आता। वह दृश्य ऐसा है, मानो वह अश्व यह सोचकर कि यह सुन्दरी इस धरती पर रहने योग्य नहीं है, किन्तु देवेंद्र के योग्य है, उसे उड़ाकर स्वर्ग की ओर ले जाना चाहता हो।
(कवि कहते हैं) मेरे पितृसमान श्रीराम ने शिव-धनुष को तोड़ा, ज्योंही यह
१ यह संकेत है—वह युवक यह देखना चाहता है कि उसका भाला भी इस सुन्दरी के नयन-जैसा पैना है या नहीं।