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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 549 में से

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पृष्ठ 112

१०० कम्ब रामायण

उत्पन्न करती हुई, जो सेना अयोध्या से निकलकर मिथिला के मार्ग में चली, उसका अग्र-भाग ध्वजाङ्कित प्राचीर से आवृत मिथिला नगर के पास जा पहुँचा (अर्थात्, वह सेना एक-दम अयोध्या से मिथिला तक के मार्ग में फैल गई)।

दर्शकों का मन मुग्ध करनेवाले जुते हुए रथ, भ्रमर-कुल-सङ्कुल कुन्तलोंवाली रमणियों के वदन-समूह के कारण ऐसे लगते थे, मानो कमल-पुष्पों से सुशोभित सरोवर ही जा रहे हों।

रथ में बैठी हुई एक सुन्दरी, अति प्रेम के कारण अपने रथ के साथ-साथ डग भरते हुए आनेवाले युवक की ओर देखने लगी, तो उस सुन्दरी की आँखों में लगा हुआ (काला) अञ्जन, उस युवक के लिए मधुर अमृत बन गया।

बाल-हरिण की जैसी दृष्टिवाली (अपनी प्रेयसी) से बिछुड़कर जानेवाले एक पुरुष ने पानी और कीचड़ से भरे 'मरुद' प्रदेश में हंसों तथा कोमल कमलों को देखा, तो (अपनी प्रेमिका की पदगति एवं पैरों का स्मरण करके) उसका मन अकेलेपन का अनुभव करके अत्यन्त व्याकुल हो उठा।

उस सेना में शंख तथा भेरियाँ मेघ-जैसी बज रही थीं, वे उज्ज्वल श्वेतच्छत्रों तथा चामरों की बहुलता के कारण गगानदी की समानता कर रही थीं। ओह ! इस सुन्दर पृथ्वी पर कैसे-कैसे राजचिह्न सर्वत्र दिखाई देते ।

वहाँ की मिष्टभाषिणी तथा श्रेष्ठ देव-रमणियों जैसी लावण्यवती स्त्रियाँ, प्राण पीने-(हरने) वाले अतितीक्ष्णनेत्र नामक यम के योग्य शूलायुधों को युवकों के हृदयो पर फेंक रही थीं, जिससे वह सेना ऐसी दीखती थी, मानो वह युद्ध-क्षेत्र में ही हो।

(वीरों की) भुजाएँ परस्पर सटी हुई थीं, जैसे पत्थर के खमे एक दूसरे के साथ खडे हों। करवाल सटे हुए थे, जैसे गगन में बिजलियाँ सटी हुई हों। (उनके) पद सटे हुए थे, जैसे कमल सटे हुए हों। पदाति सेना सटी हुई थी, जैसे सिंहों की पंक्तियाँ सटी हुई हों।

(किसी रमणी की अँगिया में) कसे हुए स्तनों में गड़े हुए अपने नयनों को हटाने में असमर्थ, चमकता चेहरावाला एक युवक अपने आगे के मार्ग पर दृष्टि नहीं रख पाता है और अंधे की तरह बड़े बलिष्ठ हाथी से जाकर टकरा जाता है।

झँरियोवाले ओग फाँदकर दौड़नेवाले एक घोड़े के उछलने से, उसपर आसीन कोई मयूरी-जैसी छटावाली सुन्दरी, अपना संतुलन खोकर नीचे गिरने लगी। इतने में एक उदारहृदय (युवक) ने लोहस्तंभ जैसी अपनी लंबी बाँहों से उसे सँभाल लिया और उस सुन्दरी को धरती पर उतारे बिना वैसे ही अपने अंक में भरकर जड़वत् खड़ा रह गया।

(अपने) युगल कमलों को दुखाती हुई चलनेवाली तथा (युवकों के) मन को दुखानेवाली शर-सदृश काले नयनों से युक्त रमणी को देखकर एक (युवक) कह उठा—'देखो, इस सुन्दरी के पीन और मनोहर उरोज-रूपी मदजलस्त्रावी हाथी को बाँधने के लिए पर्याप्त विशाल स्थान (वक्ष) कहीं है क्या?'