कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ६६
में स्थान-स्थान पर गिर रहे थे, जिससे उस सेना-समुद्र का मार्ग कोमल पर्यंक के सदृश शोभित हो रहा था।
चाशनी से भी अधिक मीठी बोलीवाले लाल अधरों से शोभित रमणियों के आँचल में छिपे हुए यम (अर्थात्, काल की तरह मरण-पीडा उत्पन्न करनेवाले स्तन) मुक्ताओं से विभूषित होने से राका की चंद्रिका फैलाते थे ओर बहुल रत्नहारों से विभूषित होने से प्रातःकालिक बालातप फैलाते थे।
उस सेना के पुरुष सुरभित कुंतलवाले थे, पर्वतों को लजानेवाले थे, सोने के आभूषणों से विभूषित थे तथा धनुष और खड्ग धारण किये थे। वे अपनी लता जैसी कटिवाली प्रेयसियों के सग ऐसे चले, जैसे सुन्दर हथिनियों का अनुमरण करते हुए मत्तगज चलते हैं।
कुछ रमणियाँ पालकियों में बैठकर जा रही थी। सुरभित, मनोहर तथा नव-विकसित पुष्पों से भरे हुए मेघों का दृश्य उपस्थित करनेवाले केशों से विभूषित उन रमणियों के मुखमात्र (उन पालकियों में से) दिखाई पड़ने थे, जिससे ऐसा लगता था, मानो अनेक पूर्ण-चन्द्र विमानों पर चढ़कर जा रहे हों।
प्रवहमाण मदजल की वर्षा थमती नहीं थी। उससे जो कीचड़ उत्पन्न हो जाता था, उसमें मुखपट्टधारी हाथी फँस जाते थे और पागल हो जाते थे, वे (उस कीचड़ से) बाहर न निकल सकने के कारण घनी तरंगोंवाले समुद्र के समान शब्दायमान नथनोंवाली अपनी सूँड़ों को उठा-उठाकर टटोलते थे, मानो दिग्गजों को खोज रहे हों।
घोड़ों की पंक्तियाँ किंकिणियों के कलरव तथा टापों के ताल के साथ फाँदती हुई जा रही थी। देवों के समान ही उनके पैर धरती को छू नहीं रहे थे। उनकी चाल वार-नारियों के मन के समान थी, जो (बाहर से अधिक प्रेम दिखाने पर भी) अंतर से प्रेम-रहित होती हैं। (भाव यह है कि जिस प्रकार वारनारियों का मन बाहर से कुछ ओर, भीतर से कुछ और होता है, उसी प्रकार घोड़ों के पैर पृथ्वी को छूते हुए भी न छूते-से लगते थे।)
कुछ मानवती स्त्रियाँ (जो अपने पतियों से रूठी हुई थीं) अपनी दृष्टि अपने पति पर नहीं डालती थीं, वे निःश्वास भरती थीं, उनकी भौंहें तनी हुई थी, पल्लव-सयुक्त पुष्प भी नहीं पहने थीं। वे अपने पतियों के सग ऐसे चल रही थीं, मानो उन (पतियों) के प्राण ही जा रहे हों।
झरने के समान मद-धारा प्रवाहित करनेवाले गडस्थलयुक्त, अंकुश का नाम सुनते ही कोपाग्नि उगलनेवाले निर्भीक हस्तिगण, पर्वतों को अपना प्रतिद्वन्द्वी समझकर, उनसे टकरा जाते थे। बड़े-बड़े वृक्षों को तोड़कर नीचे गिरा देते थे और कभी उनको रगड़ते हुए निकल जाते थे। वे ऐसे चलते थे, जैसे कोई नदी-प्रवाह हों।
सभी दुःख-मग्न प्राणियों के आलंबन-भूत, करुणाद्र वे (दशरथ) अभी प्रस्थान के लिए उठे भी नहीं (क्योंकि वे इसी प्रतीक्षा में थे कि अयोध्या की सारी सेना पहले प्रस्थान कर जाये, तो उनके पीछे चलें) कि उधर धरती में कोई खाली स्थान नहीं है, ऐसा भाव