कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 110, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ कंब रामायण
उन्होंने आज्ञा दी कि हाथियों पर बैठकर नगाड़े बजाये जायें और इस बात की घोषणा की जाय कि सूर्यवंशी मेरे पूर्वजों के पुण्य-फल से उत्पन्न मन्मथ जैसेश्रीरामचन्द्रजहाँ हैं, उस मिथिला नगरी की ओर हमारी सेनाएँ तथा राजसमूह पहले प्रस्थान करें ।
‘वल्लुवन’$^१$ ने अति वेगवान् अश्व-रूपी तरंग-युक्त (सेना-रूपी) समुद्र में घूम-घूमकर उपर्युक्त घोषणा सुनाई, (ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार) पूर्वकाल में जब मधुस्रावी तुलसी-पुष्पमाला से विभूषित शिरवाले विष्णु भगवान् ने (बलि का) दान स्वीकार करते हुए समस्त लोकों को नापा था, और जाम्बवान् ने उसकी घोषणा घूम-घूमकर प्रकाशित की थी।
नगाड़े का तुमुल शब्द कानों में पड़ने के पहले ही, मनोहर कंकण पहने हुई नारियाँ, सुन्दर पुरुष, भाले के (प्रयोग में) निपुण राजकुमार, विजयी नरेश, सभी आनन्द से यों उमंगित हो उठे, जैसे प्रभंजन से आहत समुद्र हों।
वृषभ-समान गंभीर पदगतिवाले (दशरथ) की सेनावाहिनी, जिसकी विशालता से ऐसा जान पड़ता था कि धरती पर थोड़ा भी खाली स्थान नहीं है, इस प्रकार चली, जैसे कल्पान्त के समय प्रलय-मारुत से विताड़ित होकर समुद्र सभी वस्तुओं को मिटाकर उमड़ता हुआ आगे बढ़ रहा हो।
(उस सेना के मध्य) डंडे के ऊपर फैले हुए ऊँचे श्वेतच्छत्र यत्र-तत्र ऐसे लगते थे, मानो असंख्य हंस दुग्ध-समान श्वेत कांति बिखेरते हुए उड़ रहे हों। नभ में छाई हुई ऊँची पताकाओं का समूह ऐसा लगता था मानो सारा आकाश (सर्प के समान) अपनी केंचुली उतारकर गिरा रहा हो।
हस्तिसेना के ऊपर उड़नेवाली श्वेत वस्त्रों की ध्वजाएँ उन मेघों की तरह लगती थीं, जो अपनी सूँड से मदजल बहानेवाले हाथियों की सेना को भ्रांति से समुद्र समझकर अंतराल को ढकते हुए उमड़ आये हों और जल पीने के लिए नीचे उतर रहे हों।
(नर-नारियों के) आभरणों से बालातप छिटक रहा था। वह बालातप मयूर-पक्षों से बने छत्रों की छाया को हटाता हुआ फैल रहा था। वे मयूर-छत्र मेघ की शोभा को मिटाते हुए विकसित हो रहे थे। उन मेघों को परास्त करते हुए पुंजीभूत नगाड़े बज उठते थे।
वे किंकिणीधारी अश्व, जिनपर रमणियाँ सवार होकर जा रही थीं, हंसों को लेकर चलनेवाली तरंग-युक्त नदी के प्रवाह-जैसे लगते थे। स्वर्णाभरण-भूषित, परस्पर संघट्ट-मान स्तनोंवाली, घुँघराली अलकों से युक्त रमणियाँ बिजली की जैसी थीं और उनके वाहन—छोटी-छोटी हथिनियाँ मेघों की जैसी थीं।
एक दूसरे को धक्का देते हुए, बड़ी भीड़ लगाकर चलने के कारण रमणियों के सटे हुए कुचों पर के कुंकुम-लेप तथा पुरुषों की सुंदर पर्वत-जैसी भुजाओं पर के चंदन-लेप, मार्ग
१ तमिल-देश में, प्राचीनकाल में 'वल्लुव' नामक जातिवाले राजघोषणा का ढिंढोरा पीटने का कार्य करते थे। —अनु०