कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ६७
मल्लयुद्ध मे निपुण उस जनक के यों कहने पर महातपस्वी (विश्वामित्र) ने अपना मत प्रकट किया कि दशरथ का भी यहाँ आना अच्छा होगा। अति आनन्द-भरित राजा ने वहाँ का सारा वृत्तांत दशरथ से कहने का आदेश देकर, विवाहोत्सव के लिए निमन्त्रण-पत्र-सहित, दूतों को अयोध्या रवाना किया। (१-६६)
अध्याय १३
दशरथ-प्रस्थान पटल
जनक के द्वारा प्रेषित वे दूत अतिवेग से, पवन के जैसे चलकर वज्र-ध्वनि करने-वाले नगाड़ों से प्रतिध्वनित अयोध्यापुरी में आ पहुँचे और दशरथ चक्रवर्त्ती के उस प्रासाद के द्वार पर गये, जहाँ चक्रवर्त्ती के चरणों की वन्दना करने के लिए आये हुए राजा लोग अति भीड़ के कारण भीतर जाने का मार्ग न पाकर वही (द्वार पर ही) एकत्र हो गये थे और (भीड़ के कारण) उनके किरीट एक दूसरे से रगड़ खा रहे थे।
(अत मे) दूतों को चक्रवर्त्ती की कृपा प्राप्त हुई और वे यथाविधि राजा के सम्मुख जाकर उनके अति उज्ज्वल चरण-युगल को नमस्कार किया तथा उनकी स्तुति की। फिर बोले—हे महाराज ! आपके पुत्र जबसे विश्वामित्र के साथ चले, तबसे जो घटनाएँ घटित हुईं, उन्हे हम आपको सुनाते हैं। यह कहकर (उन्होंने) समस्त वृत्तांत कह सुनाया।
सारा वृत्तांत सुनाने के पश्चात् उन्होने अपने साथ लाये हुए पत्र को दशरथ के हाथ में दिया और कहा कि हे अनतगुणसंपन्न ! यह उस जनक महाराज द्वारा प्रेषित पत्र हैं। दरबार मे स्थित एक पडित ने उस पत्र को आनंद के साथ ले लिया। तब मुखरित वीर-वलय पहने हुए (दशरथ) चक्रवर्त्ती ने उस पत्र को पढ़ने की आज्ञा दी।
जनक ने ताल-पत्र पर उनके (दशरथ के) ज्येष्ठ पुत्र की धनुर्विद्या-चातुरी का जो चित्र अंकित करके भेजा था, उसके अपने श्रुति-पट पर अंकित होते ही दशरथ की वज्र-सम भुजाएँ पर्वत के जैसे फूल उठी और (भुजा के) वलय अपना मुँह बाये अपने स्थानों से खिसक गये।
जयप्रद शूलधारी (दशरथ) चक्रवर्त्ती ने कहा—उस दिन यहाँ एक बड़ी ध्वनि प्रतिध्वनित हुई थी, वह क्या उसी धनुष के टूटने की थी, जिसका प्रयोग घनी दीर्घ जटा-धारी, विशाल गण-सहित (शिवजी ने) दक्ष-यज्ञ के समय सातो लोको को पराजित करते हुए किया था ?
पर्वत-सदृश पुष्ट भुजावाले (दशरथ) ने उपर्युक्त वचन सभी दरबारियो से कहा. फिर अनुरूप नादविशिष्ट वीर-वलयधारी दूतों को स्वर्णमय आभरण, वस्त्र आदि निरंतर और अधिकाधिक मात्रा में दिलाते रहे।