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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

६८ कंब रामायण

उन्होंने आज्ञा दी कि हाथियों पर बैठकर नगाड़े बजाये जायें और इस बात की घोषणा की जाय कि सूर्यवंशी मेरे पूर्वजों के पुण्य-फल से उत्पन्न मन्मथ जैसेश्रीरामचन्द्रजहाँ हैं, उस मिथिला नगरी की ओर हमारी सेनाएँ तथा राजसमूह पहले प्रस्थान करें ।

‘वल्लुवन’$^१$ ने अति वेगवान् अश्व-रूपी तरंग-युक्त (सेना-रूपी) समुद्र में घूम-घूमकर उपर्युक्त घोषणा सुनाई, (ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार) पूर्वकाल में जब मधुस्रावी तुलसी-पुष्पमाला से विभूषित शिरवाले विष्णु भगवान् ने (बलि का) दान स्वीकार करते हुए समस्त लोकों को नापा था, और जाम्बवान् ने उसकी घोषणा घूम-घूमकर प्रकाशित की थी।

नगाड़े का तुमुल शब्द कानों में पड़ने के पहले ही, मनोहर कंकण पहने हुई नारियाँ, सुन्दर पुरुष, भाले के (प्रयोग में) निपुण राजकुमार, विजयी नरेश, सभी आनन्द से यों उमंगित हो उठे, जैसे प्रभंजन से आहत समुद्र हों।

वृषभ-समान गंभीर पदगतिवाले (दशरथ) की सेनावाहिनी, जिसकी विशालता से ऐसा जान पड़ता था कि धरती पर थोड़ा भी खाली स्थान नहीं है, इस प्रकार चली, जैसे कल्पान्त के समय प्रलय-मारुत से विताड़ित होकर समुद्र सभी वस्तुओं को मिटाकर उमड़ता हुआ आगे बढ़ रहा हो।

(उस सेना के मध्य) डंडे के ऊपर फैले हुए ऊँचे श्वेतच्छत्र यत्र-तत्र ऐसे लगते थे, मानो असंख्य हंस दुग्ध-समान श्वेत कांति बिखेरते हुए उड़ रहे हों। नभ में छाई हुई ऊँची पताकाओं का समूह ऐसा लगता था मानो सारा आकाश (सर्प के समान) अपनी केंचुली उतारकर गिरा रहा हो।

हस्तिसेना के ऊपर उड़नेवाली श्वेत वस्त्रों की ध्वजाएँ उन मेघों की तरह लगती थीं, जो अपनी सूँड से मदजल बहानेवाले हाथियों की सेना को भ्रांति से समुद्र समझकर अंतराल को ढकते हुए उमड़ आये हों और जल पीने के लिए नीचे उतर रहे हों।

(नर-नारियों के) आभरणों से बालातप छिटक रहा था। वह बालातप मयूर-पक्षों से बने छत्रों की छाया को हटाता हुआ फैल रहा था। वे मयूर-छत्र मेघ की शोभा को मिटाते हुए विकसित हो रहे थे। उन मेघों को परास्त करते हुए पुंजीभूत नगाड़े बज उठते थे।

वे किंकिणीधारी अश्व, जिनपर रमणियाँ सवार होकर जा रही थीं, हंसों को लेकर चलनेवाली तरंग-युक्त नदी के प्रवाह-जैसे लगते थे। स्वर्णाभरण-भूषित, परस्पर संघट्ट-मान स्तनोंवाली, घुँघराली अलकों से युक्त रमणियाँ बिजली की जैसी थीं और उनके वाहन—छोटी-छोटी हथिनियाँ मेघों की जैसी थीं।

एक दूसरे को धक्का देते हुए, बड़ी भीड़ लगाकर चलने के कारण रमणियों के सटे हुए कुचों पर के कुंकुम-लेप तथा पुरुषों की सुंदर पर्वत-जैसी भुजाओं पर के चंदन-लेप, मार्ग


१ तमिल-देश में, प्राचीनकाल में 'वल्लुव' नामक जातिवाले राजघोषणा का ढिंढोरा पीटने का कार्य करते थे। —अनु०

बालकाण्ड ६६

में स्थान-स्थान पर गिर रहे थे, जिससे उस सेना-समुद्र का मार्ग कोमल पर्यंक के सदृश शोभित हो रहा था।

चाशनी से भी अधिक मीठी बोलीवाले लाल अधरों से शोभित रमणियों के आँचल में छिपे हुए यम (अर्थात्, काल की तरह मरण-पीडा उत्पन्न करनेवाले स्तन) मुक्ताओं से विभूषित होने से राका की चंद्रिका फैलाते थे ओर बहुल रत्नहारों से विभूषित होने से प्रातःकालिक बालातप फैलाते थे।

उस सेना के पुरुष सुरभित कुंतलवाले थे, पर्वतों को लजानेवाले थे, सोने के आभूषणों से विभूषित थे तथा धनुष और खड्ग धारण किये थे। वे अपनी लता जैसी कटिवाली प्रेयसियों के सग ऐसे चले, जैसे सुन्दर हथिनियों का अनुमरण करते हुए मत्तगज चलते हैं।

कुछ रमणियाँ पालकियों में बैठकर जा रही थी। सुरभित, मनोहर तथा नव-विकसित पुष्पों से भरे हुए मेघों का दृश्य उपस्थित करनेवाले केशों से विभूषित उन रमणियों के मुखमात्र (उन पालकियों में से) दिखाई पड़ने थे, जिससे ऐसा लगता था, मानो अनेक पूर्ण-चन्द्र विमानों पर चढ़कर जा रहे हों।

प्रवहमाण मदजल की वर्षा थमती नहीं थी। उससे जो कीचड़ उत्पन्न हो जाता था, उसमें मुखपट्टधारी हाथी फँस जाते थे और पागल हो जाते थे, वे (उस कीचड़ से) बाहर न निकल सकने के कारण घनी तरंगोंवाले समुद्र के समान शब्दायमान नथनोंवाली अपनी सूँड़ों को उठा-उठाकर टटोलते थे, मानो दिग्गजों को खोज रहे हों।

घोड़ों की पंक्तियाँ किंकिणियों के कलरव तथा टापों के ताल के साथ फाँदती हुई जा रही थी। देवों के समान ही उनके पैर धरती को छू नहीं रहे थे। उनकी चाल वार-नारियों के मन के समान थी, जो (बाहर से अधिक प्रेम दिखाने पर भी) अंतर से प्रेम-रहित होती हैं। (भाव यह है कि जिस प्रकार वारनारियों का मन बाहर से कुछ ओर, भीतर से कुछ और होता है, उसी प्रकार घोड़ों के पैर पृथ्वी को छूते हुए भी न छूते-से लगते थे।)

कुछ मानवती स्त्रियाँ (जो अपने पतियों से रूठी हुई थीं) अपनी दृष्टि अपने पति पर नहीं डालती थीं, वे निःश्वास भरती थीं, उनकी भौंहें तनी हुई थी, पल्लव-सयुक्त पुष्प भी नहीं पहने थीं। वे अपने पतियों के सग ऐसे चल रही थीं, मानो उन (पतियों) के प्राण ही जा रहे हों।

झरने के समान मद-धारा प्रवाहित करनेवाले गडस्थलयुक्त, अंकुश का नाम सुनते ही कोपाग्नि उगलनेवाले निर्भीक हस्तिगण, पर्वतों को अपना प्रतिद्वन्द्वी समझकर, उनसे टकरा जाते थे। बड़े-बड़े वृक्षों को तोड़कर नीचे गिरा देते थे और कभी उनको रगड़ते हुए निकल जाते थे। वे ऐसे चलते थे, जैसे कोई नदी-प्रवाह हों।

सभी दुःख-मग्न प्राणियों के आलंबन-भूत, करुणाद्र वे (दशरथ) अभी प्रस्थान के लिए उठे भी नहीं (क्योंकि वे इसी प्रतीक्षा में थे कि अयोध्या की सारी सेना पहले प्रस्थान कर जाये, तो उनके पीछे चलें) कि उधर धरती में कोई खाली स्थान नहीं है, ऐसा भाव

१०० कम्ब रामायण

उत्पन्न करती हुई, जो सेना अयोध्या से निकलकर मिथिला के मार्ग में चली, उसका अग्र-भाग ध्वजाङ्कित प्राचीर से आवृत मिथिला नगर के पास जा पहुँचा (अर्थात्, वह सेना एक-दम अयोध्या से मिथिला तक के मार्ग में फैल गई)।

दर्शकों का मन मुग्ध करनेवाले जुते हुए रथ, भ्रमर-कुल-सङ्कुल कुन्तलोंवाली रमणियों के वदन-समूह के कारण ऐसे लगते थे, मानो कमल-पुष्पों से सुशोभित सरोवर ही जा रहे हों।

रथ में बैठी हुई एक सुन्दरी, अति प्रेम के कारण अपने रथ के साथ-साथ डग भरते हुए आनेवाले युवक की ओर देखने लगी, तो उस सुन्दरी की आँखों में लगा हुआ (काला) अञ्जन, उस युवक के लिए मधुर अमृत बन गया।

बाल-हरिण की जैसी दृष्टिवाली (अपनी प्रेयसी) से बिछुड़कर जानेवाले एक पुरुष ने पानी और कीचड़ से भरे 'मरुद' प्रदेश में हंसों तथा कोमल कमलों को देखा, तो (अपनी प्रेमिका की पदगति एवं पैरों का स्मरण करके) उसका मन अकेलेपन का अनुभव करके अत्यन्त व्याकुल हो उठा।

उस सेना में शंख तथा भेरियाँ मेघ-जैसी बज रही थीं, वे उज्ज्वल श्वेतच्छत्रों तथा चामरों की बहुलता के कारण गगानदी की समानता कर रही थीं। ओह ! इस सुन्दर पृथ्वी पर कैसे-कैसे राजचिह्न सर्वत्र दिखाई देते ।

वहाँ की मिष्टभाषिणी तथा श्रेष्ठ देव-रमणियों जैसी लावण्यवती स्त्रियाँ, प्राण पीने-(हरने) वाले अतितीक्ष्णनेत्र नामक यम के योग्य शूलायुधों को युवकों के हृदयो पर फेंक रही थीं, जिससे वह सेना ऐसी दीखती थी, मानो वह युद्ध-क्षेत्र में ही हो।

(वीरों की) भुजाएँ परस्पर सटी हुई थीं, जैसे पत्थर के खमे एक दूसरे के साथ खडे हों। करवाल सटे हुए थे, जैसे गगन में बिजलियाँ सटी हुई हों। (उनके) पद सटे हुए थे, जैसे कमल सटे हुए हों। पदाति सेना सटी हुई थी, जैसे सिंहों की पंक्तियाँ सटी हुई हों।

(किसी रमणी की अँगिया में) कसे हुए स्तनों में गड़े हुए अपने नयनों को हटाने में असमर्थ, चमकता चेहरावाला एक युवक अपने आगे के मार्ग पर दृष्टि नहीं रख पाता है और अंधे की तरह बड़े बलिष्ठ हाथी से जाकर टकरा जाता है।

झँरियोवाले ओग फाँदकर दौड़नेवाले एक घोड़े के उछलने से, उसपर आसीन कोई मयूरी-जैसी छटावाली सुन्दरी, अपना संतुलन खोकर नीचे गिरने लगी। इतने में एक उदारहृदय (युवक) ने लोहस्तंभ जैसी अपनी लंबी बाँहों से उसे सँभाल लिया और उस सुन्दरी को धरती पर उतारे बिना वैसे ही अपने अंक में भरकर जड़वत् खड़ा रह गया।

(अपने) युगल कमलों को दुखाती हुई चलनेवाली तथा (युवकों के) मन को दुखानेवाली शर-सदृश काले नयनों से युक्त रमणी को देखकर एक (युवक) कह उठा—'देखो, इस सुन्दरी के पीन और मनोहर उरोज-रूपी मदजलस्त्रावी हाथी को बाँधने के लिए पर्याप्त विशाल स्थान (वक्ष) कहीं है क्या?'

बालकाण्ड १०१

अपने घुँघराले बालों पर बैठे हुए भ्रमरों को उड़ाकर, उन्हें गुञ्जारित करते हुए, मदजल बहानेवाले गज के समान एक युवक एक सुन्दरी के काले और नुकीले नयनों को देखता है और फिर अपने हाथ के भाले की ओर देखता है। १

तरग-समान काली और लम्बी घुँघराली अलकों, कमल-समान छोटे पदों तथा करवाल-समान काले नयनों से शोभित एक रमणी को देखकर कोई युवक पूछता है—परस्पर सटे हुए, आभरण-भूषित स्तनों तथा कंकण-भूषित दीर्घ बाहुओं से शोभायमान हे सुन्दरी, तुम अपनी कटि को कहाँ भूल आई ?

एक तरुणी ऐसी है, जो अपने नयनों से ही—जो यम के जैसे ही (दर्शकों के) प्राण हरनेवाले थे—बाते करती है. लेकिन अपना मुँह खोलकर कोई बात नहीं कहती है। उससे एक युवक पूछता है—हे सुन्दरी, जब तुम किसी नदी की धार में खड़ी (फँसी) रह जाओगी, तब तुम्हारे सुन्दर करों को पकड़कर किनारे पर पहुँचानेवाला कौन होगा ? (अर्थात् यदि तुम बात नहीं करोगी, तो तुम्हें बचाने की चेष्टा भी कौन करेगा ?)

(उस सेना के) ऊँट, जो इतना भारी बोझ ले जा रहे थे, जिसे उठाना भी कठिन था, स्वच्छ तथा मीठे पल्लवों को कभी नहीं खाते थे. किन्तु कडुवे (नीम आदि पेड़ों के) पत्ते ही खोजते हुए, मद्य पीने में निरत नशे के जैसे ही (लड़खड़ाते हुए) चल रहे थे। उनके मुख उनके हृदय के जैसे ही सूखे थे।

लाल नेत्र और गाढ़े अंधकार-जैसे शरीरवाले वर्बर (जाति के लोग) भारी बाँसों को उठाये हुए ऐसे चल रहे थे, जैसे मत्तगज अपने कंधे पर अंकुश और अपने को बाँधने के लिए उपयुक्त बड़े आलान भी उठाकर लिये जा रहे हों।

(एक) मत्तगज मस्त होकर अड़ गया और किसी हथनी पर सूँड़ बढ़ाने लगा। तब उस हथनी पर बैठी हुई कुछ स्त्रियाँ भयभीत होकर अपनी आँखों को हथेलियों से मूँदने लगीं। किन्तु, उनकी विशाल आँखें उन हथेलियों में समा नहीं पाईं; तो वे बहुत खिन्न होकर रह गईं।

ऐसी हथिनियों के ऊपर, जिनकी पूँछ पृथ्वी को छूती है, बैठे हुए मेखला-भूषित रमणियों के मध्य बौने भी जा रहे हैं, जैसे सद्योविकसित मनोहर पुष्प-समूह के मध्य कलुषों पर बैठकर मेढ़क जा रहे हों।

एक अश्व, पुष्पलता-सदृश एक सुन्दरी को अपनी पीठ पर लेकर अपने पैरों को झुका-झुकाकर फाँद रहा है। बड़े आलान से बँधा रहनेवाला एक हाथी उसके पीछे दौड़ता है, तो भी वह अश्व उसके काबू में नहीं आता। वह दृश्य ऐसा है, मानो वह अश्व यह सोचकर कि यह सुन्दरी इस धरती पर रहने योग्य नहीं है, किन्तु देवेंद्र के योग्य है, उसे उड़ाकर स्वर्ग की ओर ले जाना चाहता हो।

(कवि कहते हैं) मेरे पितृसमान श्रीराम ने शिव-धनुष को तोड़ा, ज्योंही यह


१ यह संकेत है—वह युवक यह देखना चाहता है कि उसका भाला भी इस सुन्दरी के नयन-जैसा पैना है या नहीं।

१०२ | कम्ब रामायण

मधुर समाचार पुरुषों ने सुनाया, त्योंही अत्यंत आनन्द में विभोर होकर वहाँ की नारियाँ (विवाह को देखने के लिए) ऐसे दौड़ीं कि अपने दीर्घ तथा मनोहर केशपाशों के खुल जाने पर भी उन्हें बाँधने की या मेखला की मणियों के टूटकर गिर जाने पर भी उन्हें उठाने की सुध नहीं रही।

मत्त हस्तियों तथा कामिनियों से शंकित रहनेवाले विप्रजन हाथों में छाता और कमंडल लिये हुए, (प्राणायाम के समय) नासिका पर लगे रहनेवाले अपने हाथ को (चलते समय भी) नीचे की ओर नहीं गिराकर उचक-उचककर डग भरते हुए (अर्थात्, ऐंड़ी को पृथ्वी पर न लगाकर सावधानी से अशुद्ध स्थानों से बचकर प्रयत्नपूर्वक डग रखते हुए) आगे-आगे निकले जा रहे हैं।

सुगन्धित पुष्पधारी कुंतलों से सुशोभित कुछ नारियाँ अपने नयनों में (श्रीरामचन्द्र का) प्रतिबिंब देखकर समझती हैं कि स्वयं श्रीराम ही आ गये हैं और कहती हैं कि 'हमारा स्वागत करने के लिए तुम्हीं आ गये हो आओ हमारे रथ में बैठ जाओ', यों कहकर रथ की ओर अपना हाथ झुकाकर संकेत करती हैं।

शब्दायमान रथ, हाथी, घोड़े बड़े-बड़े नगाड़े—सर्वत्र भरे हुए हैं। उनके कोलाहल से एक का कहना दूसरा सुन नहीं पाता, अतः सब गूँगे के जैसे चल रहे हैं।

अत्यंत झीने मकड़े के जाल-जैसे वस्त्र पहने हुई, भ्रमर से गुंजरित पुष्पों से अलंकृत केशोंवाली रमणियों का समूह अपने पैरों की पायलों की रुनझुनाहट के कारण पक्षियों के कलरव से भरे तालाब की समानता करता है।

स्वच्छ तरंगों से शोभित समुद्र से अद्भुत लक्ष्मी की समता करनेवाली कुछ नारियाँ झीने वस्त्र से जब देखती हैं तब उनकी आँखों को देखकर पुरुषों के नयन कोलाहल कर उठते हैं, मानों मत्तगजों के मद को देखकर मोद-भरे भ्रमर कोलाहल भर रहे हों।*

(पुरुषों के) प्राणों को भेदकर चलनेवाली तीक्ष्ण नील नयनोंवाली नारियों के नूपुर 'उल्लै' (नामक) वाद्य के समान बज रहे हैं। उसके लिए सहायक वाद्य बनकर घोड़े हिनहिनाने लगते हैं जैसे (आकाश में) उठनेवाले मेघ गर्जन कर रहे हों।

पृथ्वी देवी के हृदय को पुलकित करती हुई अपना मृदुपद रखनेवाली रमणियों के उज्ज्वल मुख को देखकर कुछ युवकों के नयन, यह समझकर आनंदित हो रहे हैं कि विकसित कमल-पुष्पों से मंडमान भ्रमर विहरण कर रहे हैं, उन युवकों की भावना से मन्मथ भी आनंदित हो रहा है।

मन के लिए भी अगोचर (अतिसूक्ष्म) कटि, मनोहर श्रेष्ठ प्रवाल जैसे अधर तथा किन्नर** के जैसे मधुर कण्ठवाली तरुणियों के रूपरूपी काँचे हुए लाल नारियल-जैसे कुचों से


* नूपुर के कलरव एवं कमलों से और कलहंस एवं मणिमय वस्त्र पहने हुई नारियों से समानता दिखाई गई है।—अनु०
** किन्नर-जातियों के सम्बन्ध में ऐसा कहने का रिवाज कहते हैं। ये मानों पक्षी होनेके कारण पक्षी होने...—अनु०

बालकाण्ड १०३

गिरा हुआ सुगन्ध-लेप और (सेना के पैरों से उठी) धूल—दोनों मिलकर (आकाश में) भर गये।

बड़े-बड़े चित्रमय रथों पर सवार हो उपयुक्त प्रकार के असंख्य नर और नारियाँ बड़ा शोर मचाते हुए अपने मार्ग में आगे बढ़ते जा रहे हैं।

लगाम-लगे घोड़े, रथ तथा वीर, सर्वत्र दल बाँधकर तेजी के साथ चल रहे हैं; उससे अति शीघ्रता से ऊपर उठी हुई धूल सर्वत्र फैल गई है और बादलों के जलबहाग करने-वाले सजल रन्ध्रों में भी जाकर भर गई है, तथा दिशाओं में स्थित गजों के मदजलप्रवाही रन्ध्रों में भी घुस गई है।

(उस सेना के वीरों ने) ढाल पकड़े हुए अपने बाँये हाथ में (दाहिने हाथ में रहनेवाले) चमकते हुए करवाल को भी पकड़ रखा है, और रुचिर रत्नमय सोने के कड़ों से भूषित (अपने) दायें हाथ में, 'कटक' (नामक पदभूषण) से शोभित अपनी पत्नियों की चूड़ियों से अलंकृत कर-पल्लव को पकड़कर स्वर्ण-मुखपट्टों में विभूषित हाथियों के मण्डल के कारण सिलौए (बने) रास्ते पर धीरे-धीरे पैर रखते हुए जा रहे थे।

खेतों में, सरोवरों में तथा छोटे-छोटे जलाशयों में बहुलता से खिले हुए कुमुद-उत्पल, रक्तकमल आदि (सुन्दरियों के) हाथ, चेहरे, मुख तथा नयन की छवि उपस्थित करते हैं; जिन्हें देखकर वे रमणियाँ अपने पतियों से प्रार्थना करती हैं कि ये पुष्प तोड़कर हमें ला दो।

पंक्तियों में बाँधे गये घोड़ों पर से कुछ सुन्दरीयाँ पृथ्वी पर उतर गईं। इतने में मत्तगज को निकट आते देखकर, डर गईं। (उनके) सुग्रथित केशभाग शिथिल हो खिसक पड़े। श्रेष्ठ रत्नाभरण टूटकर गिर गये और मनोहर कटि-वस्त्र भी ढीले पड़कर शरीर से खिसकने लगे; तो अपने पल्लव-करों से अपने ढीले वस्त्रों को पकड़कर, मयूरों के समान लड़खड़ाती हुईं, मार्ग में हट गईं।

छत्र, हाथी, मयूर-पंखों के बने पंखे और ध्वजाओं के समूह ने मिल-जुलकर समस्त खाली स्थानों को आवृत कर लिया है और अंधकार उत्पन्न कर दिया है। हथियार, किरीट और आभूषण अपनी आभा से धूप फैला रहे हैं। अतः, उस सेना के मार्ग पर एक साथ ही रात्रि तथा दिन भी वर्त्तमान हो रहे हैं।

'पलाश पुष्प-सदृश अधर, मुक्ता-सदृश दाँत, तथा मंदहास से सुशोभित सुन्दरियों के रमणीय मुख (नामक) कमल पर के तीक्ष्ण खड्ग (नयन) भीड़ को चीरकर निकल जायेंगे। अतः तुमलोग मार्ग छोड़कर हट जाओ' - इस प्रकार कहते हुए सूर्य-समान उज्ज्वल शरीरवाले पुरुष मार्ग छोड़ देते हैं।

दुस्तर भीड़ के कारण मार्ग में, मुक्ताहार और रत्नहार टूटकर बिखरे हुए हैं। कलाप नामक सोलह लड़ियोंवाली मेखला से आवृत तथा सर्पफण-सदृश जघनवाली रमणियाँ, (मार्ग पर बिखरे हुए मोतियों और रत्नों के पैरों में चुभने से) लड़खड़ाती हैं, तो उनके स्वर्णमय नूपुर भी रो उठते हैं; 'हमसे इस मार्ग पर चला नहीं जायगा'-यो कहकर वे मार्ग के मध्य में रुकी रह जाती हैं।

१०४ | कंब रामायण

उत्तम वाद्य जब मेघ के जैसे घोर गर्जन कर उठते हैं, तब गाड़ियों में जुते हुए बड़े-बड़े बैल भड़क उठते हैं, हंस पक्षियों के सदृश रमणियाँ इधर-उधर भाग जाती हैं, बैल रस्सियों से बँधे हुए सामानों को इधर-उधर बिखेरकर बंधन-मुक्त हो जाते हैं, जैसे योगी संसार के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।

पर्वत-जैसे हाथी कहीं-कहीं जलाशयों को देखते ही उनमें उतर पड़ते थे, तब उनके महावत हवा के जैसे तेज चलनेवाले कमान के गोलों से उन्हें मारते थे, फिर भी वे हाथी उन चोटों की परवाह किये बिना (किसी रमणी के) कसे हुए स्तन-समान कुंभों और दाँतों को बाहर किये हुए खड़े रह जाते थे, मानो क्षीरसागर में तालवृक्ष-सदृश शुंडवाला ऐरावत खड़ा हो।

काली मिट्टी-जैसे केशों, शूल-तुल्य नेत्रों, अमृतवर्षी कुमुद-तुल्य रक्ताधरों से विभूषित गायिकाओं के साथ, उत्कृष्ट वीणा-वादन में चतुर 'बाण' (कहलानेवाले गायक), किन्नरी के समान, घोड़ों पर सवार होकर 'नैवल्य' (नामक) राग का विशुद्ध आलाप करते हुए जा रहे थे, मानो श्रोताओं के कानों में मधु की वर्षा कर रहे हों।

महावत के अंकुश उठाते ही, निर्झर-युक्त पर्वत-समान हाथी बिगड़ उठता था और लोग तितर-बितर हो जाते थे। मद-भरे छोटी आँखोंवाले बाल-हाथियों पर के भ्रमर, जिनके पंख फूले हुए थे, दूसरे हाथी पर जा बैठते थे और फिर किसी हथिनों के पीछे-पीछे उड़कर उसपर बैठी हुई किसी रमणी की बिखरी अलकों से टकरा जाते थे।

चक्रवर्ती की प्रेयसियाँ रवाना हुईं, तो पूर्णचंद्र के दर्शन से उमड़े हुए नील समुद्र के समान भेरियाँ बज उठीं। हाथी, रथ, नाट्यशील अश्व, रक्तरंजित शूल समान नयन-युक्त नारियाँ और नर पंक्ति बाँधकर रमणीय ढंग से शीघ्रगति के साथ चलने लगे।

तालाबों में विकसित मनोहर कमल-वन के मध्य शोभायमान किसी हंसिनी के समान केकयराज-पुत्री, सहस्रों गणिकाओं के झुंड से घिरी हुई, अति सावधानी के साथ, रत्नों से अलंकृत शिविका में आसीन हो चली, तब मधु-मधुर संगीत होने लगे, (उनके रूप को देखकर) देवलोक की सुन्दर्याँ भी लज्जित हो गईं।

अकारण ही अग्नि-ज्वाला उगलनेवाली क्रोधी आँखोंवाले, वेत्रदंडधारी तथा (आपाद) लटकनेवाले अँगरखा पहने हुए कंचुकी, उन मधुरभाषिणी तथा अपूर्व सौंदर्य-विशिष्ट स्त्रियों के पद-मार्ग की यथाक्रम रखवाली करते हुए जा रहे थे, जो किंकिणी-भूषित घोड़ों पर या पैदल ही जा रही थीं।

रुचिर नूपुर पहने हुई, खच्चरों पर सवार, लाल रेखाओं से युक्त कमल-सदृश विशाल नेत्रवाली दो सहस्र नारियों से घिरी हुई, युगल (लक्ष्मण और शत्रुघ्न) बच्चों को जन्म देनेवाली (सुमित्रा) देवी, नीलरत्न-खचित शिविका में बैठकर ऐसी चलीं कि दर्शक समझने लगे कि जल-भरे बादल पर चमकनेवाली विद्युल्लता ही जा रही हैं, उस समय वीणागान भी हो रहे थे।

अपने मनोहर करों में मयूर, हंस, छोटे शुक, सारिकाएँ, प्रतिमाएँ, सद्यः आवरण से निकले हुए शंख-समान चामर आदि वस्तुओं को लिये हुए असंख्य नारियाँ (सुमित्रा के)

बालकाण्ड १०५

पार्श्व मे जा रही थी ? उनको देखने से ऐसा लगता था कि सप्त समुद्रो से घिरी इस पृथ्वी पर अब अन्यत्र कही स्त्री ही नही रह गई है (अर्थात्, सब यही आ एकत्र हो गई है।)

महाभाग (रामचन्द्र) को जन्म देनेवाली (कौशल्या देवी) (एक रत्नमय) शिविका पर सवार होकर चलीं, तो ऐसा लगा, मानो उज्ज्वल श्वेत दत तथा सेमल के फूल-जैसे अधरवाले (कौशल्या के) वदन को देखकर, धवल चन्द्रमा की भ्रांति से असंख्य नक्षत्र आ एकत्र हुए हो। निपुण गायक भ्रमर गुजार-सदृश 'पाडि' (नामक) राग अलाप रहे थे और देवगण (कौशल्या को) नमस्कार कर रहे थे।

कुबड़े, बौने, ठिगने तथा दासियाँ इनको लेकर दूध-जैसे सफेद घोड़े हंस-पक्षियो के समान धरती पर चल रहे थे। भ्रमर, मधुमक्खी आदि से भरे पुष्पो से अलंकृत केशवाली रमणियों उनके पाश्र्वों मे चल रही थी।

कली-जैसे स्तनो और अवर्णनीय लक्ष्मी से भी अधिक सौंदर्य से विशिष्ट साठ सहस्र नारियाँ, प्रवाल, रत्न, स्वर्ण, उज्ज्वल मरकत, मुक्ता तथा अन्य अनुपम अलंकरणो से युक्त, चित्रस्थ प्रतिमाओ के समान, गाड़ियों मे सवार हो (कौशल्या देवी को) घेरकर चली।

पातिव्रत्य से श्रेष्ठ अरुन्धती के पति (वसिष्ठ) छत्र की छाया में, मुक्ता-खचित शिविका में बैठकर, हंसवाहन ब्रह्मदेव के सदृश चले। कर्णो के द्वारा अमृत-सदृश शास्त्रो को अघाकर पीये हुए तथा अपने हाथो से देवताओ को हवि देने का सामर्थ्य रखनेवाले दो सहस्र ब्राह्मण उन्हे घेरकर चले।

युद्ध मे समर्थ हाथी, घोड़े, सुन्दर रथ, स्वर्णमय वीर-वलयधारी पदाति, उन (वसिष्ठ) के आगे-पीछे ऐसे जा रहे थे, मानो महान् पर्वत को घेरकर समुद्र जा रहा हो। जयलक्ष्मी से सुशोभित वक्षवाले, देवसेना को भी वेधने मे चतुर तीरन्दाज अतिरथी, दोनो वीर (भरत और शत्रुघ्न) वसिष्ठ के आगे-पीछे इस प्रकार जा रहे थे, जैसे विश्वामित्र के आगे और पीछे राम और लक्ष्मण जा रहे हो।

मुक्ता तथा मनोहर हीरे से खचित आभरण धारण किये हुए (दशरथ) चक्रवर्ती ने अपने नित्य कर्म पूरे किये। चक्रायुध धारण करनेवाले विष्णु के पद अपने शिर पर रखे। ब्राह्मणो को अनन्त रत्न, स्वर्ण, गायो की पक्तियाँ, भूमि आदि आदर के साथ दान कर एक अच्छे मुहूर्त्त में प्रस्थान किया।

आठ सहस्र ब्राह्मण रत्न-कलश हाथ मे लिये हुए, अर्थगंभीर वेद-मंत्रों का पाठ करते हुए, दुर्वा से मंत्रपूत जल का प्रोक्षण करते हुए, आशीष दे रहे थे। मंगल-वचन कहने-वाली, मधुर अरुण मुखवाली, भारी रत्न-खचित मेखला धारण करनेवाली, वंदीजन की परंपरा मे उत्पन्न, अनेक रमणियाँ प्रस्तुति गा रही थी।

(उस समय) कुछ लोग कहते थे कि यह शख क्यो बज रहा है? कुछ कहते थे कि कदाचित् राजा प्रस्थान कर चुके हैं। यो कहते हुए बड़ी भीड़ लगाकर राजा लोग आये ? (उनमे से) कुछ कहते कि चक्रवर्ती ने मेरा अवलोकन किया और कुछ कहते कि हाय! मुझपर चक्रवर्ती का कटाक्ष नही पड़ा। कोई कहता, हाय। मेरा कुण्डल गिर पड़ा। कुछ

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कहते, अब उस चक्रवर्ती के समीप पहुँचना दुष्कर है। यों, चक्रवर्ती के चारो ओर राजा लोगो की भीड एकत्र हो गई।

स्वर्ण-कंकणधारिणी रमणियो को लेकर स्वर्ण-किंकिणीधारी अश्व-समूह (चक्रवर्ती के) चारो ओर ऐसे जा रहा था, मानो कमल-पुष्पो से भरा समुद्र हो। विजयी शूलधारी राजाओ के अरुणहस्त-रूपी कमल मुकुलित हो (नमस्कार की मुद्रा मे) खडे थे। इनसे घिरे हुए चक्रवर्ती, अपर सूर्य के सदृश रथ पर चढकर चले।

उस समय (दशरथ की सेना से) उठी हुई धूलि-राशि ने अंतराल को भर दिया और गगन मे जा लगी और फिर वहाँ से लौटकर सभी विशाल दिशाओ को यों आवृत्त कर लिया कि लोगो को एक दूसरे को पहचानना भी कठिन हो गया। फिर, वह सगर-पुत्रो से वैर-सा करती हुई जाकर (उनके द्वारा खोदे गये) तरंगायित समुद्र को भी भरने लगी।

शंखवाद्य, मधुर बाँसुरी, शृंग-वाद्य, ताल, काहल, मंगल-भेरी--इनसे उत्पन्न ध्वनियो ने मेघ-गर्जन को भी दवा दिया। मोर-पंखो के झालर, छत्र आदि ने सूर्य की किरणो को वहाँ आने से रोक दिया। चंद्रमा वहाँ के श्वेतच्छत्रो को देखकर लज्जा से हट गया। यों, दशरथ देवताओ को भी चकित करनेवाले वैभव के साथ चले।

इन्द्र के समान दशरथ चक्रवर्ती जब जा रहे थे, तब मंत्रगान के शब्द दक्षिणावर्त्त शंख १ के शब्द, ब्राह्मणो के आशीर्वाद के शब्द, गर्जन करनेवाले नगाडो के शब्द, आलान-स्तंभ को तोड देनेवाले बलवान् हाथियो के शब्द, समय की माप रखनेवाले 'घटिक' (नामक लोगो) के वेला-सूचक शब्द--सभी दिशाओ मे सर्वत्र गूंज उठे।

जिस किसी भी दिशा मे दृष्टि जाती, वहाँ वीर-वलयधारी नरेश अपने कमल-जैसे हाथ जोडे चक्रवर्ती की दिशा मे ही (इस विचार से) देखते हुए खडे रहते थे कि चक्रवर्ती का कटाक्ष उनपर पडे। एक दूसरे को धक्का देते हुए चलनेवाले अनेक हाथी, रथ, घोडे पदाति सैनिक--इनके कारण उठी हुई धूल गगन और धरती को भरती चली।

पदाति सैनिक, हाथी, रथ, अश्व इन चारो से खूब भरी हुई सेना यदि अपने स्थान से आगे बढ भी जाना चाहे, तो उसके जाने के लिए मार्ग नही था, समुद्र जल-रूपी वस्त्र से आवृत्त धरती भी (उस सेना के भार से) अपनी पीठ लचकाने लगी। अब कहो, इस चक्रवर्ती को (अपने धर्मपूर्ण शासन से) भूमि-भार हरनेवाला कैसे कहा जाय ?

वे चक्रवर्ती इस प्रकार दो योजन दूर चलकर, स्वर्णमय (मेरु) पर्वत-सदृश चंद्र-शैल की तराई मे जाकर ठहरे। चतुरंगिनी सेना भी वही ठहर गई। उस (सेना) में रहनेवाली रमणियो के केश मन्मथ के वाहन २ बने हुए हाथी (अर्थात्, अंधकार) के जैसे थे, तथा उनके दोनो स्तन, (क्रमशः) मन्मथ के बाण बने हुए पुष्पो और मलयपर्वत पर के चंदन के लेप से सुगन्धित हो उठे थे। (१-८२)


१ शंख प्राय वामावर्त्त होते हैं, दक्षिणावर्त्त शंख अधिक मंगलप्रद माना जाता है।
२. तमिल-साहित्य मे कहीं-कही अन्धकार को मन्मथ का वाहन कहा गया है।

अध्याय १४

चंद्रशैल पटल

(हाथियों पर बैठी सुन्दरियाँ अपने पतियों के सहारे नीचे उतर पड़ीं) तब मुक्ताहार-विभूषित, मेरु को भी अपने गुरुत्व से पराजित करनेवाले (अपने प्रियतम के) प्राणों को हरने के इच्छुक सारिका-तुल्य मधुर बोलीवाली कुछ रमणियो ने, दृढ धनुर्धारी मन्मथ के आश्रयभूत अपने स्तनो को, अपने पतियो की भुजाओ के साथ (आलिंगन मे) बाँध दिया; इधर उँचे और गगन-चुम्बी वटवृक्ष को भी तोड़नेवाले, सरोवर को जाने के इच्छुक, दृढ धनुर्धारी मन्मथ-समान वीरो को ले चलनेवाले कुछ हाथी$^१$ भी देवदारु तथा चंदन के वृक्षो से बाँध दिये गये ।

जो शत्रु सम्मुख होकर युद्ध करने से नही दबता, उसे कोई चतुर नरेश असावधानी-रहित विवेक के साथ राजतन्त्र से उखाड़ देता है । उसी प्रकार (उँचे पेड़ से बँधे हुए) एक हाथी ने मेघ-मंडल को अपनी शाखाओ से छूनेवाले सुन्दर वृक्ष के तने को, समूल उखाड़ दिया और चलने लगा ।

कृष्ण (अपनी माता यशोदा द्वारा ऊखल से बाँध जाने पर) अपने पीछे ऊखल को भी लुढकाते हुए, अति पुष्ट तनावाले युगल अर्जुनवृक्षो के मध्य से होकर निकल गये थे और दोनो वृक्षो को बीच से तोड़कर गिरा दिया था, उसी प्रकार एक हाथी अपनी (पिछली) टाँग से बँधे आलान-स्तंभ को भी खींचता हुआ, वहाँ खड़े दो आम्रवृक्षो के मध्य से होकर निकल गया और एक साथ दोनो पेड़ो को गिराता हुआ चला गया ।

(हाथी के मन मे) वैर उत्पन्न कर देनेवाले कोप को दूर करने के लिए, मीठी बोली बोलकर निपुणता के साथ उसको वश मे लानेवाला कोई महावत, किसी (राजा के) मंत्री जैसा था, और वह हाथी, विविध शास्त्रो के अनुकूल हित-वचन धीरे-धीरे कहने पर भी उसे न सुननेवाले किसी (उद्धत) राजा के जैसा था ।

(कोई हाथी किसी जंगली हाथी की गंध पाकर क्रुद्ध हो उठता है और उसकी खोज में निकल पड़ता है ।) अंकुश से आहत कोई मत्त गज, अपने शत्रु हाथी को न देखकर मेघ के जैसे गरजता हुआ, वनगज के मार्ग का अनुसरण करता हुआ वायुवेग से चल पड़ा (क्रोध के आवेश में वह अपने मार्ग मे आये विविध प्राणियो को मारता हुआ चला), तो बाज, चील आदि पक्षी झुण्ड बाँधकर उसके पीछे-पीछे उड़े । वह दृश्य ऐसा था, जैसे किसी नदी के मार्ग मे दूसरी नदी की धारा वह चली हो ।

बहुत-से हाथियो की पंक्तियाँ जहाँ बँधी हुई थी, उस स्थान मे कही से (सप्तपर्णी वृक्षो की) मदजल की-सी गंध आई, तो एक हाथी पागल हो उठा और अपने को दबाने-वाले अंकुश को झटके से दूर हटाकर मदगंध की दिशा मे दौड़ चला और पुष्पो से लदे (सप्तपर्णी) वृक्ष को उखाड़, अपने अगले दोनो पैरो से रौंदकर चूर-चूर कर दिया ।


१. मूल में स्तन और हाथी दोनो के लिए एक ही विशेषण का प्रयोग किया गया है और श्लेष के आधार पर दो अलग-अलग अर्थ निकाले गये है ।

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कंब रामायण

अमरूप गज, उनके मध्य निद्राराकित संकीर्ण ललाटवाली हथिनियों और हाथी के बच्चे झुण्ड बाँधकर खड़े थे । वृक्षों से भरा हुआ वह अरण्य ( हाथियों के ) एक यूथ-जैसा खड़ा था और वह चन्द्रशैल उस यूथ का पति जैसा खड़ा था ।

'विशद ज्ञानवाले उत्तम जन, नीच जनों की संगति करने पर, उन नीच जनों के बुद्धि-विकारजनक दुर्गुणों को दल देते हैं'—यह कथन ठीक ही है क्योंकि ( सोने के चक्रवाले रथ ) अपने स्वर्णमय चक्रों के मार्ग में पड़नेवाले काले पत्थरों को भी रगड़-रगड़कर अपने ( सुनहले ) रंग से युक्त कर देते थे ।

जंगली मयूर, ( उस सेना की ) सुन्दरियों के बिंब-समान अरुण अधरों को देखकर यह समझते थे कि ये वीरबहूटी* को मुख में उठाये हुए हैं । कदाचित् इसी भ्रांति से रमणीय मेखलाधारिणी, हरिणनयनोंवाली उन रमणियों के सुनहले लावण्य को देखते हुए वे घूम रहे थे ।

गतिशील घोड़ों से उतरकर, हंस-गति से चलकर, घनी वृक्षों की छाया में जाकर ठहरनेवाली स्त्रियाँ, अपने शरीर पर के कलाप, ( सोलह लड़ियोंवाली ) मेखलाओं, कर्णाभरण तथा अन्य आभूषणों की चमक के कारण पुष्पित लताओं जैसी सुशोभित हों रही थीं ।

यात्रा करने से थकी हुई स्त्रियाँ स्फटिक-प्रस्तरों पर लेटकर सो गईं, तो भ्रमरों के झुण्ड उनके कोमल चरणों तथा मुखों पर, उन्हें सघन दलवाला कमल समझकर, मँडराने लगे । ( दूसरे ) स्फटिक-शिलाओं में उनके प्रतिबिंबों को देखकर सखियाँ इस भ्रम में पड़ गईं कि यही वास्तविक स्त्रियाँ तो नहीं हैं ।

( जिस प्रकार ) विद्युत् से शोभित मेघ उस चन्द्रशैल से लगे रहते हैं, उसी प्रकार जब हथिनियाँ धरती से लगकर बैठ गईं, तब लता-समान नारियाँ उनपर से उतरीं । शब्द करनेवाले अपने नूपुरों के साथ वे अपने निवास-गृहों ( खेमों ) में ऐसे चलीं, मानों वे लक्ष्मी हों, जिनकी कटि की समानता डमरू भी नहीं कर सकता—अपना निवास कमल-पुष्प छोड़कर उन गृहों में जा रही हों ।

पुष्टिवर्धक दाना खाने से खूब पुष्ट, तुरुष्कों के द्वारा कई नगरों से लाये गये, घोर शब्द करनेवाले अति सुन्दर और बलिष्ठ अश्व, भूमि-देवी के हृदय को अलंकृत करने-वाले रत्नहार के समान, अश्व-शालाओं में बाँधे गये ।

जहाँ-तहाँ लंबे परदे लगाये गये, मानों जल की वीचियाँ खड़ी कर दी गई हों । बाट लगाई गई, मानों समुद्रों को ही सँवारकर रख दिया गया हो । वृक्षों के मध्य हाथियों को बाँधा गया, मानों बादलों को ही लाकर खड़ा कर दिया गया हो । घोड़ों को पंक्तियों में बाँधा गया, मानों पवनों को ही बाँध रखा गया हो ।

नर्तनशील मयूर की जैसी गतिवाली और हरिण की आँखों के जैसी नेत्रवाली ( रमणियों ) तथा पैदल जन भरी यात्रा ( अपना-अपना स्थान न पहचान लेने के कारण )

बालकाण्ड १०६

भटक रहे थे । (फिर) भेरी के नाद और दूर तक सुनाई पड़नेवाले शङ्ख के रव सुनकर तथा ध्वजाओं को देखकर पहचान सके कि दशरथ चक्रवर्ती का आवास कौन-सा है, फिर वहाँ पहुँच गये ।

(सेना के) पैरों से उठी हुई धूलि (रमणियां के) मनोहर और उज्ज्वल शरीर पर छा गई । युवक कुमार दूध के झाग के समान वस्त्रों से (अपनी प्रियतमाओं के शरीर पर से) धूलि पोंछने लगे, उससे वे तरुणियाँ ऐसी चमकीं, जैसे चित्रकार ने अपने घर के चित्रों को पोंछकर नया बना दिया हो।

हाथी पर सवार हो आनेवाले गजकुमार, ऊँचे पर्वतों पर से (समतल) भूमि पर उतर आनेवाले सिंहों के जैसे ही नीचे उतरे तथा विशाल तालवृक्ष-जैसे बने हुए चामरों-सहित चलकर, अति सुन्दर ढंग से बनाये गये डेरे में प्रविष्ट हुए ।

श्वेत वस्त्रों की बनी पताकाओं से युक्त उन आवासों में मदहास और सुगंधि से भरी सुन्दरियों के वदन ऐसे लगते थे, जैसे मेघों से भरे आकाश में रहनेवाले चन्द्रमा के उज्ज्वल प्रतिबिम्ब, चारों तरफ उठी हुई तरंगोंवाले समुद्र के धवल जल के भीतर से दिखाई दे रहे हों ।

कोई मत्तगज धूल में लोट जाता और उठकर आकाश को छूता हुआ-सा ऊँचा खड़ा हो जाता । फिर, अपने काले रंग को ढकनेवाली सफेद धूलि को शरीर के एक पार्श्व में से पोछ देता । किंतु दूसरे पार्श्व में उस धूलि से लिप्त वह ऐसा चला आता, मानो शिवजी को अपने पार्श्व में लेकर विष्णु भगवान् ही आ रहे हों ।

दुर्गुण व्यक्तियों के साथ (अविचार के कारण) मिलकर रहने पर भी बहुत सज्जन उनके स्वभाव को पहचानने पर जिस प्रकार उन्हें एक दम छोड़कर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार वेगवान् अश्व अति सूक्ष्म धूलि पर लोट जाते और झट उठकर, उस धूलि को झाड़कर, दूर हट जाते ।

(भूमि, नारी और धन—इनकी कामना-रूपी) तीन प्रकार के पाश को तोड़-कर, उत्तम गुणवान् योगी, अपने योग-बल से, अपने स्वरूप को पहचानते हैं, इहलोक तथा परलोक के फल को पहचानते हैं तथा अपने लक्ष्य-स्थान 'मोक्ष' के स्वरूप को भी पहचान-कर उसकी ओर तेजी से बढ़ते हुए सन्मार्ग से चलते हैं। उन योगियों के समान ही, घोड़े भी, तीन गुणवाली रस्सियों के बंधन को तोड़कर, अश्वपाल की दक्षता के कारण, अपने कार्य को पहचानते हुए अपने (लक्ष्य) स्थान को जानकर उनकी ओर दौड़ चलते थे, पर (अश्वारोही की) आज्ञा से दबकर वापस लौट आते थे ।

जब कलकल करती हुई वीचियाँ इस प्रकार ऊँची उठती हैं कि उनसे छिटककर जल किनारे के भीलों में जा गिरता है, तब उनके साथ ऊपर फेंके गये पुष्ट मीन भी उछलकर चमक उठते हैं, उसी प्रकार जब आकाश से गिरते हुए कुहासे के जैसे (डेरों के) परदे हवा के झोंके खाकर उड़ते थे, तब परदों के भीतर गोंटी खेलनेवाली स्त्रियों के काले नेत्र उन मीनों के समान ही चमक उठते थे ।

स्वच्छ जलवाली नदियाँ, अपने प्रवाह के सूख जाने पर भी खोदने से थोड़ा-थोड़ा

११० कंब रामायण

जलदान करती रहती है। वे उस दाता के समान ह, जो (दान में सारी संपत्ति देकर निर्धन बनने के पश्चात् भी) याचको को अपना बधु समझकर, 'नाही' नहीं कहता है; किंतु अपने पास बची हुई संपत्ति मे से ही कुछ दान देता ही रहता है।

वीर योद्धा, जिनके वक्ष पर रत्नखचित (स्वर्ण) हार ऐसे लगते थे, जैसे अग्नि के सग बिजली संचरण कर रही हो, जब अपने घने बाँधे गये केशो को हिलाते हुए, मद्यःसुवासित डेरो में प्रवेश करते थे, तब पर्वत की कंदराओं मे प्रविष्ट होनेवाले सिंहो के समान लगते थे।

शूल और वराह-दंत के जैसे (तीक्ष्ण) दाँतोवाले, रक्त-केशो से भरे अपने माथे पर, अनुपम (अतिरक्त वर्ण) इगुलिक धारण किये हुए बडे-बडे हाथी, (अपने शरीर पर बँधी) विविध घंटियो को ध्वनित करते हुए जब तरंग-भरे प्रवाह को हिलोेरने लगते थे, तब वे ऐसे लगते थे, जैसे मधु और कैटभ मनोहर नीलसमुद्र का आलोडन कर रहे हो।

काले-काले मत्तगज, उन्हे ठीक-ठीक मार्ग पर चलानेवालो (महावतो) के सकेतो को नही मानते थे और (अपने) दोनो ओर खडे अपनी जातिवालो (हाथियो) के द्वारा बाहर निकलने के लिए प्रेरित किये जाने पर भी, बे-परवाही के साथ, जलाशयो मे ही पडे रहते थे। वे (हाथी) वेश्याओ के मेखलाचित जघन-तटो मे ही मग्न उन (कामुक) जनो के जैसे थे, जो ठीक मार्ग पर चलनेवाले (गुरुजनो) के उपदेशो को नही मानते और समवयस्क साथियो के द्वारा (वेश्या-गृहो से) बाहर निकलने को प्रेरित किये जाने पर भी उसकी परवाह नही करते।

श्रेष्ठ वस्त्रो से भूषित कटिवाली रमणियो के साथ, पुरुष, पाकशालाओ से जलती हुई अगरु की लकडियाँ ले आते थे और आग जलाकर धुआँ उठाते थे, जिससे वे सूर्य के आतप को भी मद कर देते थे, इस कारण से उनके ठहरने का वह पुरातन स्थान, गर्जन न करने-वाले मेघो से आवृत, विशाल समुद्र के जेमा ही था।

कंदरा-युक्त पर्वतो में निवास करनेवाले विद्याधर (उस सेना के नर-नारियो को) देखने के लिए आते और उनके सौंदर्य को देखकर यो आश्चर्य में पड जाते थे कि अपने साथी-संगियो को भी भूल जाते थे। इस प्रकार सुन्दर राजकुमारो और तरुणियो के जम-घट से वह सेना ऐसी लगती थी, मानो अमरलोक ही भूल से धरती पर उतर आया हो।

तरुणियाँ अपने स्थान पर आने के पूर्व ही (मार्ग की थकावट के कारण) लेटे हुए पुरुषो से रूठ जाती थी। वह मान उनके सौंदर्य को बढा देता था। तब वे कभी तोते से मधुर भाषण करने लगती, कभी अपने नूपुरो से मधुर नाद उत्पन्न करती हुई, धूप को भी लजानेवाली अपनी स्वर्णिम काति को आगे-आगे फैलाती हुई चलने लगती, मानो मयूरो का झुड ही विहार कर रहा हो।

कुछ वीर पुरुष जब अपनी भुजाओ के जैसे ही उन्नत उस (चन्द्रशैल) पर्वत के पश्मिरो को निहारते हुए भयकर सिंहो के समान घूमते थे, तब उनके उभय पदो के वीर-वलय बज उठते थे उनके पुष्पहारो पर के भ्रमर शब्द करते हुए उड जाते थे. उनके पार्श्व

बालकाण्ड १११

में खड्ग् चमक उठते थे और लाल रत्न जड़े हुए उनके अंगद रह-रहकर दीप्तिमान् हो उठते थे।

(धरती को चारो ओर से) घेरकर पड़े हुए समुद्र जैसे उज्ज्वल रत्न-भरित स्वर्णिम (मेरु) पर्वत को पकड़ने के लिए आ पहुँचे हो, उसी प्रकार वह सेना उमड़कर आई और उस पर्वत-प्रांत मे ठहर गई। अब हम उस चन्द्रशैल के रूप का वर्णन करेंगे, जिसे राजागण, उनकी पत्नियाँ, राजकुमार और लता-समान कुमारियाँ-सब मिलकर देखनेलगे थे।

दीर्घ दंतवाले गज, अपनी तालवृन्त-सदृश सूँड़ो को बढाकर, स्वर्गलोक मे स्थित कांतिपूर्ण कल्पवृक्ष की ऊँची शाखाओ को, जिनपर अनेक भ्रमर संगीत गाते हुए नृत्य करते रहते थे, पत्तो सहित तोड़कर अपने प्राण-समान हथिनियो को दे देते थे।

प्रवाल-सम लाल मुँह, जिनसे राग विकसित होते थे, तथा शीतल कुवलय-पुष्प-समान नयनो से युक्त कुरिंजि-प्रदेश (पार्वत्य-प्रदेश) की सुन्दरियो को ऋतु-परिवर्त्तन की सूचना देनेवाले भ्रमर ‘वेंगे’ (नामक) वृक्ष के पुष्पो से अघाकर गगन के नक्षत्रो पर यह सोचकर लपक पड़ते थे कि ये भी नवमधु देनेवाले ‘सुरपुन्ना’ के फूल हैं।

‘नक्षत्र’ नामक हथिनी-सहित ‘श्वेत चन्द्र’ नामक हाथी अपनी दोनो कोटियो (धनुष की नोक) रूपी सुन्दर वक्र दंतो से मधु-धाराएँ बहा देता था (अर्थात्, उस पर्वत के शहद के छत्तो में चन्द्र अपनी कोटियो को गड़ाकर उनसे मधु-धाराओ को बहा देता था)। वे धाराएँ नालो के रूप मे बह चलती थी। खेती करनेवाले किसान उन धाराओ का मार्ग बदलकर उनमें आकाशगंगा के जल को बहा देते और उससे धान के अपने खेतो को सींचते थे।

उस पर्वत को लाँघ न सकने के कारण उसकी तलहटी मे ही अटककर रह जाने-वाले चन्द्रमा-रूपी मुकुर में एक ओर से (धरती पर रहनेवाली) पर्वत की स्त्रियाँ अपने शृङ्गार को प्रतिबिंबित देखती थी, तो दूसरी ओर से (स्वर्गलोक मे रहनेवाली) अप्सराएँ अपना सौंदर्य देखती थी।

वहाँ के पर्वतीय पुरुष, अपनी उन सुन्दरियो के ललाट के साथ चन्द्रमा की तुलना करके देखते थे जिन (रमणियो) के नेत्र उस शूलायुध के समान थे, जो हवा निकालने-वाली भाथियो की धधकती आग मे तपाये बिना तथा धार पर विष और तेल चढ़ाये बिना भी प्राण हर लेनेवाले थे।

(वहाँ के झोपड़ों के) आँगन मे भयंकर सिंह-शावक सुन्दर हथिनियो के जाये हुए बच्चो के साथ खेलते रहते थे। वक्र बालचन्द्र भी उज्ज्वल ललाट-युक्त पर्वत-जाति की नारियो के बच्चो के साथ खेलता रहता था।

उस पर्वत के इन्द्रनील से भरे तटो पर तथा वहाँ के विद्याधरो के केश-भूषित सुन्दर शिरो पर, क्रमशः अंजन-पर्वततुल्य गजो को मारनेवाले कठोर सिंह के दृढ चरणों के (लाल) चिह्न तथा (विद्याधर) स्त्रियो के महावर-लगे कमल-चरणो के लगने से उत्पन्न आर्द्र चिह्न दिखाई दे रहे थे।

यहाँ की रमणियों इस प्रकार गाती थी कि सुन्दर मीन जैसे उनके नयन कानो

११२कंब रामायण

को न छूकर स्थिर रह जाने थे। उनके दाँतो की चमक बाहर नही दिखाई देती थी। उनके दीर्घ केश बघन से मुक्त होकर खिसक नही पडते थे। उनकी भौंहे टेढी होकर नही मिलती थी। अपनी पुष्प-कोमल हथेली ओर अपने स्वर को सँवारकर ( वीणा के ) तारो को मेडती हुई वे अमृत वर्षा-सी करती थी। उनके उस सगीत को सुनकर किन्नर भी विस्मय-विमुग्ध हो जाते थे।

मधु बहानेवाले पुष्प-हारो से भूषित तथा कानो के साथ संबंध जोडनेवाले करवाल-तुल्य नयन से युक्त तरुणियाँ जब स्फटिक-वेदिकाओ पर आसीन होती थी, तब उन धवल शिलाओ से उत्पन्न जलधाराएँ उन तरुणियो के कुकुम-लेप से मिलकर ऐसी लगती थी, मानो असंख्य रत्नों के बने चषको मे मद्य भरा गया हो।

अपने पतियो के प्राणो को व्याकुल करती हुई, अजन-युक्त अश्रु बहाती हुई, रूठ-कर आँखें लाल करती हुई देवस्त्रियों ने अपने केशो से मदार-पुष्पमालाओ को निकालकर फेंक दिया था। वे अम्लान ओर मधु भरी मालाएँ उस पर्वत पर यत्र-तत्र शोभायमान थी।

आम्रपल्लव के रंगवाली पहाड़ी स्त्रियाँ मुकुलित क्रमुक-पत्रो में पुष्पमालाएँ डालकर अपने केशो के साथ उनकी तुलना करके देखती थी। आभरण-भूषित देवांगनाएँ अपने अग्नि-जैसे चमकते रत्न-खचित 'कटक' (नामक आभूषणो) को उतारकर 'कोंदल' (नामक पौधे) के पुष्पों को पहना देती थी और अपने करो के साथ उनकी तुलना करके देखती थी।

तीर चढाये हुए धनुष के जैसी स्पंदित भौहो के साथ ( वीणा ) तत्री से एकस्वर होकर मधुर गान करनेवाली तथा मयूरो के साथ नाचनेवाली देवस्त्रियाँ (अपने प्रियतमो से) मान करती हुई अपने रत्नहारो को उतारकर फेंक देती थी। ( उस पर्वत पर के ) वानर उन हारो को उठाकर पहन लेते थे और वानरियाँ उन्हे देख-देखकर आनदित होती थी।

ऊँचे बढे हुए चदनवृक्षो से युक्त सानु-प्रदेशो मे स्थित गैरिक के लगने के कारण मनोहर दिखाई देनेवाली लोभ-भरी हथिनियाँ महावर लगाये हुए-सी दीखती थी। (उस पर्वत पर के) उज्ज्वल पद्म-रागो की लाल काति (किरणे) फैलने से वहाँ के आकाश पर सदा लाली छाई रहती थी।

पृथ्वी के अलकरण के निमित्त किरण-पुज-विशिष्ट मुक्ताओ को बिखेरती हुई, पार्वती के प्रियतम ( शिवजी ) के शिर पर जो गगा उतरी थी, उसकी समानता करती हुई अनन्त स्वर्ण को बहाती हुई, मोतियो के साथ आ गिरनेवाले निर्झरो की पक्तियों ( उस चन्द्रशैल पर) ऐसी दृष्टिगत होती थी, जैसे त्रिविक्रम के वक्ष पर उत्तरीय वस्त्र लहरा रहे हो।

'सुरपुन्ना' के पुष्पो के साथ लवग-पुष्पो को भी सम्मिलित करके पहननेवाले तथा मत्त भ्रमरो को उड़ाकर शुद्ध मधु का पान करनेवाले ( वहाँ ठहरे हुए ) उन लोगो ने अश्व-मुखी देवताओ को देखा, जो किन्नर-मिथुनो के संगीत सुनकर अपना प्रणय-कलह त्याग देते थे।

उन लोगों ने देखा कि अत्यत मुदित युवको के सुन्दर वक्षो पर आघात करनेवाले स्तन-युगल जैसे अनुपम 'कोङ्गु' वृक्ष की कलियो के निकट ही, रमणियों की ही कटि के समान

बालकाण्ड २९३

के समान (पतली) शाखाएँ लचक रही हैं। उनमें भ्रमरियाँ और (उन लोगों के) केशों पर मंडराने की प्रकृतिवाले चंचरीक नव विवाह का संबंध जोड़ रहे हैं।

(उस पर्वत पर के) जलाशय को स्फटिक-मय स्थल समझकर, चूडामणि से सुशोभित, सुन्दर कण्ठ तथा उज्ज्वल चंद्र जैसे बदनवाली (रमणियाँ) शीघ्रता से वहाँ चली जाती हैं और अपने उत्तरीय तथा कटि-वस्त्र को जल से भिगो लेती हैं। वह दृश्य देखकर वीर-वलयधारी युवक ताली बजाकर हँस पड़ते थे।

(उन लोगों ने) अनेक पुष्प शय्यायें देखीं। (बिखरी हुई) पुष्पमालाएँ देखीं। मनोहर बीरबहूटी-जैसी पान की पीक पड़ी देखीं। प्राणों से भी अधिक प्यारे पतियों के विरह में मूर्च्छित विद्याधर-स्त्रियों के लेटने से झुलसी हुई पल्लवों की सेजें भी देखीं।

(उन्होंने देखा कि) देवांगनाएँ सुगन्ध भरे (पुष्पमय) स्थलों पर मृत नहीं हैं। उन देवांगियों के नीलकमल-जैसे नेत्र अत्यन्त चंचल ही बन रहे हैं। उनके प्रवाल-जैसे मुँह पर मन्द हास बिखर रहे हैं। उनके रभसे हुए पीन स्तनों पर अमूल्य रत्नहार डोल रहे हैं। मधुमत्त भ्रमर उनके केशों के मध्य शब्द करते हुए उड़ रहे हैं और उनके रत्न-खचित कर्णाभरण डोल रहे हैं।

अपनी लज्जा को धन के लिए बेचनेवाली, स्वर्ण-आभरण पहने हुई (वार) नारियाँ, जिस प्रकार किसी पुरुष की सारी संपत्ति अपहरण करने के पश्चात् उसे सारहीन समझकर निराकृत कर दूर कर देती हैं, उसी प्रकार सुन्दरवदना नारियों के प्रवाल-दशनों के दाग; विविध मद्यों का पान किये जाने के उपरान्त, लुढ़काये हुए मधु-पात्रों को (उन लोगों ने) देखा।

रात्रि को दिन बनानेवाले प्रकाश से युक्त स्फटिक की गुफाओं पर, अति विशाल पुष्ट भुजाओंवाले देवगण जब धनुष को परास्त करनेवाली भ्रूकुटि-युक्त अप्सराओं के साथ रति-क्रीड़ा करते थे, तब उपेक्षा से दूर फेंके गये कल्पक-पुष्पहारों और अन्य आभरणों को (उन लोगों ने) यत्र-तत्र पड़े देखा।

उस सेना की रमणियाँ कभी हथेली के-जैसे विकसित होनेवाले उत्पल की कली को देखकर उसे फनवाला सर्प समझ लेतीं और डर से अपनी मृग-जैसी आँखों को मूँद लेती थीं। (कभी) चिकने हीरे-भरे पत्थरों में पुष्पों के प्रतिबिम्बों को देखकर उन्हें वास्तविक पुष्प समझ लेतीं और अपने पतियों से उन पुष्पों (प्रतिबिम्बों) को ला देने की प्रार्थना करती थीं।

कभी वे स्त्रियाँ अशोकवृक्ष के मनोहर पल्लवों को अपने नखों से नोंचकर छोटे-छोटे टुकड़े बना डालतीं और उन्हें अपने स्तन-तटों पर चिपकातीं। कभी वे मधु-युक्त पुष्पों को चुनतीं, कभी कान्तिमय रत्न-भरे उस पर्वत पर हंसों के समान विशाल तालों में गोते लगातीं।

[यहाँ से आगे नौ पद्यों तक मूल में यमक की अति सुन्दर छटा दिखाई गई है, अतः अर्थ की अपेक्षा शब्द-गुंफन पर कवि का अधिक ध्यान रहा है।]

११४ | कंब रामायण

उस पर्वत का मध्य भाग, जो आम के कोमल पल्लव के समान चमकता था, वह (वास्तव में) सोने का पत्र ही था। उसके (पर्वत के) दोनों पार्श्वों में हरिण, हाथी, सर्प आदि जन्तु तथा स्त्रियों के कंधों जैसे बाँस, पुन्नाग आदि के वृक्ष लगे थे।

अंधकार-सदृश वराहों के शरीर पर (वहाँ रहनेवाली रमणियों के द्वारा उत्पादित) जो कुंकुम-पंक लग जाता, उसे वे आम, चंदन आदि के पेड़ों पर रगड़कर हटा देते थे। देवस्त्रियों-जैसी मधुरभाषिणी उन रमणियों के कारण वह विशाल पर्वत-प्रदेश स्वर्ग के ही सदृश था।

वहाँ (चारे की खोज में) बड़े-बड़े सर्प संचरण करते थे, तो बड़े-बड़े बाँस जड़ से उखड़कर गिर पड़ते थे। वन्य-मृगों के भागने से धूलि उड़ने लगती थी। वहाँ के झरने मुक्ताओं को साथ लेकर बड़े शब्द करते हुए बह चलते थे।

प्रशस्त करवाल के-जैसे कठोर सिंहों की समानता करनेवाले (पुरुषों) की सुन्दर भुजाओं पर, उज्ज्वल तथा लाल रेखायुक्त रमणियों के आभरणालंकृत स्तन लगने से तथा उन स्तनों पर के अगरु-चंदन का लेप और मुक्ताहार लगने से (वे भुजाएँ) जिस प्रकार शोभित होती थीं, उसी प्रकार उस पर्वत-प्रदेश पर चंदन, कुंकुम आदि के वृक्ष शोभायमान थे।

घने अरण्य से आवृत्त उस पर्वत पर रहनेवाला केले का वन वहाँ संचरण करती हुई देवनारियों की ऊरुओं के सदृश था, वहाँ की (वन्य) स्त्रियाँ, किन्नरों की-सी मधुरनाद-युक्त वीणा का वादन करती थीं।

मत्तगजों के मदजल का प्रवाह बड़े वनस्पतियों को गिराता हुआ बह रहा था, जिसमें यत्र-तत्र स्थिर पड़े हुए वृक्ष दिखाई देते थे, दूसरी ओर पहाड़ी नदियों में जल पीने के लिए पहाड़ी बकरे तथा अन्य मृग चलते हुए दिखाई पड़ते थे।

बाघों के निवासभूत पर्वत-प्रदेशों में बड़े बड़े 'पटह'¹ यह सूचना देते हुए बज रहे थे कि अब पर्वतवासी काले रंग की नारियों के द्वारा कंद-मूल खोदकर निकालने का समय आ गया है।

बलिष्ठ गज जब उस पर्वत के जलाशय में डुबकी लगाते थे, तब (तट पर के) शीतल वटवृक्ष और सरोवर की कमललताएँ विध्वस्त हो जाती थीं, उग्र सिंह जहाँ टहलते रहते थे, ऐसे घने जंगलों से आवृत्त उस पर्वत पर देवबालाएँ आराम करती थीं तो भ्रमर उनके केशों में आनंद से बैठे रहते थे।

उस पर्वत के ऊपर मेघ-पंक्तियाँ आकर ठहरती थीं, निचले भाग में पुष्प-श्रेणियाँ भरी रहती थीं। वह पर्वत ऐसा था, जैसे विष्णु अपने हृदय पर लक्ष्मी को धारण किये हुए विराजमान हों।

पुष्पों पर मँडराते हुए मधु का पान करनेवाले भ्रमरों के समान ही, तरुण और तरुणियाँ घुल-मिलकर उस ऊँचे पर्वत के तट-प्रदेशों में क्रीड़ाएँ करते थे।

(वहाँ रहनेवाले नर-नारी) उस पर्वत से उतरकर नीचे आने का विचार भी इस-


¹ पहाड़ी जाति के लोग कंद निकालने का मौसम आने पर चमड़े के विविध बाजों को बजाने लगते थे।

बालकाण्ड ११५

लिए नही करते थे कि उस विचार-मात्र से उन्हें अत्यन्त पीडा होती थी। जिस प्रकार अपवर्ग-लोक में पहुँचे हुए मुक्तजन उस लोक के सुखानुभव के अतिरिक्त अन्य कोई विचार नही रखते; उसी प्रकार वे लोग उस पर्वत के ही वैभव मे लीन रहते थे।

मेघों का विश्राम-स्थान बना हुआ वह पर्वत हाथी के सदृश था। गगन पर संचरण करता हुआ उष्ण किरणोंवाला सूर्य उस हाथी पर आक्रमण करनेवाले सिंह के सदृश था। नभ, जो सूर्यास्त के समय की लालिमा से भर गया था, सिंह के आघात से बहनेवाले रक्त के सदृश था।

बड़ी-बड़ी शाखाओ से युक्त वहाँ के वृक्ष नभ-लालिमा के प्रकाश मे ऐसे लगते थे, मानों वे नये पल्लवों के भार से लद गये हों। अपने ऊपर सर्वत्र उस लालिमा के पड़ने से वह पर्वत रत्नों के पहाड़ जैसा लगता था।

नेत्रों को रमणीय दीखनेवाले दृश्यों तथा असंख्य शिंगों के कारण वह सुन्दर पर्वत मनोहर चन्दन-रस से लिप्त वक्षवाले श्यामल (विष्णु) भगवान् के सदृश था।

प्राण एवं शरीर के तुल्य परस्पर (प्रेम से भरे वे नर-नारी) गुंजार भरते हुए मँडरानेवाले मधुपायी भ्रमर कुल के साथ, उस उन्नत पर्वत के प्रात मे आ ठहरे, जैसे के हाथी और हथिनी, सिंह और सिंहिनी, या हरिण और हरिणी ही हों।

गगन में संचरण करनेवाला, एकचक्रविशिष्ट रथवाला सूर्य-रूपी सिंह, जो तीक्ष्ण ताप-जनक हथियाला है जिसके किरण-रूपी केसर हैं, जिनमें दूसरों के फेंके हुए तीर भी (छिपकर) खो जाते हैं तथा जो क्रोध से दूसरों का विनाश करनेवाला है—अब अस्ताचल में प्रविष्ट हुआ। उसके अस्त होने पर घना अन्धकार, जो सिंह के डर से कहीं दूर छिपा हुआ था, हाथियों के झुण्ड के समान बाहर निकला और सर्वत्र फैल गया।

मन्दार-पुष्प की सुगन्ध एवं मधु-भरी मालाओं से अलंकृत चक्रवर्ती (दशरथ) की सेना-वाहिनी रूपी गरजते हुए समुद्र मे सर्वत्र दीपमालाएँ जल उठीं; मानों लाल कमल खिल उठे हों।

शीतलता-युक्त रमणीय समुद्र की झाग-भरी वीचियों में से निकला हुआ उज्ज्वल चन्द्रमा, नक्षत्रों से घिरा हुआ गगन में आकर चमकने लगा; मानों रुचिर चन्द्रिका के सदृश (उज्ज्वल) बालुका पर, कान्तिमय मुक्ताओं के साथ धवल शंख संचरण कर रहा हो।

मत्स्यों की दुर्गन्धि से पूर्ण समुद्र ने एक धवल चन्द्रमा को पा लिया था, जिसे देखकर, ईर्ष्यावश, उस सेना-समुद्र ने भी देवनारी-सदृश अपनी तरुणियों के मुख-रूपी असंख्य चन्द्रमाओं से अपने को प्रकाशित कर लिया।

जहाँ-जहाँ नर्तकियाँ नर्त्तन कर रही थीं, वहाँ-वहाँ 'मार्जन' करने के कारण मृदुंग हुए मृद्वल (वाद्यों) का नाद, गायिकाओं का संगीत-नाद, संगीत के आलाप के अनुकूल बजनेवाली तत्रियों का नाद, हाथों से ताल देने से उत्पन्न नाद, गाँठदार बाँसुरी का नाद—ये सभी नाद इस प्रकार उमड़ उठे कि स्वर्ग के निवासी भी आश्चर्य से चकित हो गये।

ठंडक के लिए रत्नाभरणों को हटाकर अपनी सखियों से प्रकाशमान मुक्ताहारों को लेकर अपने वक्ष पर पहननेवाली तथा अगरु-धूम से (पत्रभंगों को) सुखानेवाली (वहाँ

११६ कम्ब रामायण

की रमणियाँ) शीतल मधु-भरी मल्लिका-मालाओ को हटाकर सुगन्ध-युक्त तथा घने दलोवाले 'करुमुहै' (वृक्ष) के पुष्पहारो को पहनने लगी।

(उस पर्वत मे) नये-नये (पकड़कर) लाये गये हाथियो को बाँधनेवाले लोग जो गीत रचकर गाते थे, उनका शब्द कही सुनाई पड़ता था, कही मद्य पीकर मत्त हुए पुरुष अपनी प्रेयसियों के साथ जो प्रलाप कर रहे थे, उसका शब्द था, कही वेश्याओं की मेखला का शब्द था और कही मदोन्मत्त गजो के बेसुध हो चिंघाड़ने का शब्द हो रहा था।

रसना के द्वारा अपेय, अमृत-समान रतिशास्त्र के विषय का अनुभव करने, दुर्लभ अमृत-जैसी रमणियो के हृदय मे उत्पन्न मान को दूर करने, राग-युक्त गीतो को श्रवण कर उनके भाव को नयनो के नृत्याभिनय मे देखने आदि कार्यों मे ही (उनलोगों की) वह रात्रि व्यतीत हुई। (१-७७)

अध्याय १५

पुष्प-चयन पटल

नक्षत्रो से पूर्ण रात्रि-रूपी खड्ग-दतवाले हिरण्यकशिपु पर क्रोध करके, पुञ्जीभूत उष्ण किरण-रूपी सहस्र करों को बाहर निकाले हुए, अपने उदयस्थान भूतपर्वत-रूपी सोने के स्तम्भ से, उज्ज्वल सूर्य-रूपी नरसिंह¹ निकले।

नित्य कर्मो को पूरा करने के उपरात, (दशरथ) चक्रवर्ती ने जब प्रस्थान किया, तब सभी राजा लोगो ने खडे होकर नमस्कार किया। फिर, उनकी सेना-वाहिनी चलकर उस शोण नदी के निकट पहुँची, जिसके तटो के ऊँचे टीलो पर लहलहाते वन थे, टीलो के नीचे तलैयो मे 'ककुनीर' (नामक लताएँ) फैली हुई थी और जिसके घाटो मे कमललताएँ फैली हुई थी।

उस (शोण नदी के) स्थान पर पहुँचकर सारी सेना विश्राम करने को ठहर गई, (उधर) सूर्य भी गगन-मडल के मध्य जा पहुँचा, राजा और राजकुमार अपनी-अपनी स्त्रियो के साथ, स्वच्छ जलाशयों से शोभायमान शीतल तथा सुगंधित उद्यान में, भ्रमरो के विश्राम भूत कोमल पुष्पो का चयन तथा जलविहार करने के लिए गये।

(उस उद्यान में, उन सुन्दरियो को देखकर) मयूर वहाँ से कदाचित् यह सोचकर दूर हट गये कि (वे सुन्दरियाँ) भ्रू-रूपी सुदृढ धनुष के द्वारा अरुण रेखाओं से युक्त काली आँखे-रूपी बाण चलाकर कही उन्हे आहत न कर दें। वे तरुणियाँ जब मञ्जुल नूपुरों को बजाती हुई डग भरती थी, तब हस (पुष्पो के मध्य) छिप जाते और गानेवाले भ्रमर (उन पुष्पो से) गुजन करते हुए बाहर-उड़ जाते थे। ऐसा लगता था, मानो वे हस (उन तरुणियो की पदगति से) लज्जित हो पलायन कर रहे हो।


१. इस पद्य में रात्रि को हिरण्यकशिपु और सूर्य को नरसिंह-रूप बतलाया गया है।

बालकाण्ड ११७

वे रमणियां अपनी सखियो के साथ मिलकर, अपने अग लचकाकर नाचने लगीं; तो पीले सोने के बने 'शुक्ल' (नामक कर्णाभरण) तथा भव्य 'कुलैं' (नामक कर्णाभरण) एक साथ चमक उठे और (उनकी पुष्प-मालाओ में) बैठे हुए भ्रमर उड़कर गुंजार भरने लगे ।

उन (नाचनेवाली स्त्रियों) को देखकर सुगन्धित पुष्प-मालाओं से शोभित वक्ष-वाले पुरुष उन लता-सदृश नारियों को पुष्पित लताओं से पृथक् नहीं पहचान पाते थे और भ्रांत होकर खड़े रह जाते थे ।

रत्नों से खचित पीले स्वर्ण के आभरणों में अलंकृत विशाल जघन, संगीतमय भाषण, शीतल पुष्प-मधु से युक्त केश—इनके साथ जब वे रमणियां झुण्ड बाँधकर समीप आतीं, तो उनकी आहट सुनकर ही कोयलें अपना मुँह बंद कर लेतीं। वह उनके डर के कारण नहीं, किंतु लज्जा के कारण ही था। पारखी व्यक्तियों के सामने कौन मुँह खोल सकता है ?

वे सुन्दरियाँ अपने उन नेत्रों से, जो विष से अधिक कठोर होने पर भी अमृत जैसे लगते थे, प्रेम के साथ देखकर और कमल-सदृश अपने करों से पकड़कर ऊँचे चढ़े हुए फूल के पौधों को जब झुकाने लगीं, तब वे पौधे उनके नूपुर-भूषित चरणों पर सुकुमार पुष्पों को बरसाते हुए झट झुक गये। यदि जड़ वृक्षों की यह दशा हो, तो अब कौन ऐसा (चेतन) व्यक्ति होगा, जो लतातुल्य सूक्ष्मकटिवाली (स्त्रियां) के निकट झुके बिना रह सके ?

कमल-पुष्प पर आसीन (लक्ष्मी) देवी-जैसी उन (सुन्दरियों) के मनोहर कमल-सदृश करों से छुए जाने पर सुरभित पुष्पालंकृत केशवाले पुरुषों की पर्वत-समान भुजाएँ भी, जिनके बल से भयंकर सिंह भी डर जाते हैं, झुककर रह जाती हैं, तो क्या यह भी कहने योग्य कोई विशेष बात है कि विकसित सुमनवाले पौधे (उन सुन्दरियों के स्पर्श से) झुक जाते हैं ?

मधुर नाद करनेवाले भ्रमरों ने देखा कि पुष्पलताएँ, नदियों या तालाबों से उत्पन्न न होनेवाले (उन रमणियों के) चन्द्रमुख-रूपी कमल-पुष्पों को कुवलय-पुष्पों के साथ खिलाये हुए खड़ी हैं, (अर्थात् वे स्त्रियाँ लतातुल्य हैं, उनके वदन कमल और नेत्र कुवलय हैं)। आश्चर्य में डूबे वे भ्रमर (उन मुख, कमलों पर) ऐसे मँडराने लगे कि उड़ाने पर भी नहीं उड़ते थे। जो नवीनता के प्रेमी होते हैं, वे नई वस्तु को देखने पर क्या, उन्हें छोड़ देंगे ?

कुछ लताएँ झुक-झुक जाती थीं; तो कुछ पुष्पित वृक्ष हाथ की पहुँच से भी ऊँचे होकर ऐसे खड़े रहते थे, जैसे रूठे हुए हों और झुकना नहीं चाहते हो। वह दृश्य ऐसा था, जैसे दृढ़ पर्वत-सदृश पुष्ट भुजाओंवाले उज्ज्वल शरीरवाले, विकसित पुष्पहार धारण करनेवाले पुरुषों के मध्य मयूर-सदृश कुछ (नारियाँ) खड़ी हों।

पुष्पों के चुन लिये जाने पर शोभाहीन होकर म्लान दिखाई पड़नेवाली (शाखाओं को) देखकर चित्र की प्रतिमा (जैसी वे रमणियाँ) सोचती थीं कि ये (शाखाएँ) हमारे पतियों की दृष्टि में सौंदर्यहीन लगेंगी; इसलिए वे अपने रत्नहार, मुक्तामाला, मेखला, कर्णाभरण आदि उतारकर उनको पहना देती थीं और उन शीतल तथा सुकुमार शाखाओं को प्यार-भरी दृष्टि से देखती रहती थीं।